जाल
जब से दयालजी के भाई रमई ने मकान का सौदा किया है, दयालजी की नींद हराम हो गई है। हमेशा चिढ़े-चिढ़े रहते हैं। किसी भी काम में मन नहीं लगता। इस मकान ने उनके दिलो-दिमाग को कुछ ऐसे जकड़ लिया है कि उन्हें हर-हमेश ईंट-ही-ईंट नजर आती है। बिखरी-बिखरी। टूटी-फूटी। ईंट ऐसी है कहाँ? अब तो दीवाल बन गई है। नहीं, दीवाल कैसे रहेगी? उचककर उन्होंने झाँपे की ओर ताका।
ससुरा अभी तक नहीं आया। क्या किया-धिया सब अकारथ जाएगा? नहीं, नहीं। ऐसा कैसे हो सकता है? आएगा। जरूर आएगा। सूचना गलत नहीं हो सकती। देखो न, मकान-मालिक कैसे पेश आ रहा है। करो, खूब करो। कौन रोकता है? सोचे थे कि दयालू को किनारे कर मकान कर लेंगे। अरे भइया, दयालू को दू-चार हजार ही मिलता न! लेकिन तुम्हें कितना फायदा होता। एक तो सौदा सस्ते में पटता दूसरे मुहलत भी मिल जाती। लो कूटो। दयालू की बराबरी करने चले थे। ई कहाँ हो सकता है कि दयालू के बिना कोई काम पूरा पाड़ लो। अगर दयालू का थोड़ा एहसान ले लेते हो, दयालू से थोड़ा दबकर रहते हो, तो तुम्हारा जाता ही क्या है?...हम तो कहते हैं भइया, कलट्टर बनो न! पर ई नहीं हो सकता कि दयालू की मदद के बिना बनो। दयालू, दयालू है। वह यह नहीं सह सकता कि कोई उसे भूल जाए।
उन्होंने फिर से झाँपे की ओर झाँका। कहीं कोई नजर नहीं आया। वे अखबार देखने लगे।...यह वही कमरा है, जहाँ कभी लोगों की भीड़ लगी रहती थी। लोग आजिजी करते न थकते थे। करते तो अब भी हैं, पर पहले जितना नहीं। तब यह कमरा कितना चमचमाता था। कितना गमकता था। कितना बजता था।
दो-चार करवट बदलने के बाद वे अचानक उठ बैठे। आँखों पर ऐनक लगाया और खिड़की के कोने को एकटक देखने लगे। उन्हें लगा कि कुछ हिल रहा है। पर क्या है, वे न जान सके। आँख पर बहुत जोर डाला, फिर भी कुछ समझ में न आया।...ससुरी आँख भी जवाब देती जा रही है। अभी चश्मा बनवाए कितने दिन हुए? देखो न, फिर भी नहीं सूझता। इधर-उधर नजर दौड़ाने के बाद उन्हें खयाल आया कि बत्ती तो बुझी है। उठे और बत्ती जलाकर फिर देखने लगे। अरे, यह तो मकड़ी है। यह, यहाँ क्या कर रही है?...अब यह कमरा मकड़ियों के लिए हो गया। लोगों का आना क्या जरा कम हुआ, घर की सफाई भी बंद हो गई? अभी लेता हूँ खबर। ई मेहरारू भी क्या जात है? कसके रक्खो तो ही काबू में रहती है। जरा सी भी ढील दी कि लगीं कपारे चढ़ने।
वे पत्नी को बुलाने ही जा रहे थे कि आँखों ने जबान को रोका। आँख मकड़ी की हर गतिविधि को निरख रही थी। मकड़ी एक छोर से दूसरे छोर को जोड़ने का यत्न करती किन्तु असफल हो जाती। एक बार...दो बार...तीन बार...हंऽ, यह हुई न बात। आखिर जोड़ ही दिया न। देखते-देखते उनकी गरदन दुखने लगी। गरदन को हाथ से मला, पर गरदन का दुखना कम न हुआ। क्यों न गरदन को हिला-डुलाकर ठीक किया जाए।...क्या कहते हो, दयाल! सोचो तो, देखने भर से तुम्हारी गरदन दुखने लगी, तो उस मकड़ी की क्या दशा होगी? फिर भी किस लगन से अपने काम में जुटी है। अब तो जाला बनकर तैयार होने को भी आया।
वे अपनी निगाह हटाना ही चाहते थे कि एक भनभनाता कीड़ा जाले में आपो-आप फँस गया।
दयालजी चौंके। क्योंकि जैसे यह भनभनाहट उनके कान में हुई हो। मकड़ी की तरह ही उनके जिस्म में हरकत हुई। खिड़की से देखा, तो पाया कि बदरी झाँपा खोले खड़े हैं और केशव अपनी लूना अंदर ला रहे हैं।
उनकी सारी ज्ञानेंद्रियाँ चौकन्नी हो गईं। सभी अपनी-अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद। जैसे उन्हें बेतार-यंत्र से हिदायत दे दी गई हो कि आज किसी भी तरह की बेदरकारी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
ऊ तो नहीं आया।...ई दूनों उसी की परछाईं तो हैं। उसको सर्दी होती है, तो छींक इन ससुरों को आती है। अच्छा हुआ। आज इन सबों की दोस्ती का इम्तहान हो जाएगा। नहीं तो...
अब कमरे की दूसरी खिड़की भी खुल चुकी थी। पंखा चलने लगा था, जिससे तिपाई पर रखा अखबार फड़फड़ाने लगा था। बरबस दयालजी की निगाह खिड़की के कोने पर गई। कीड़ा निकल भागने के लिए हाथ-पैर मार रहा था। जाला हिलता था, पर न तो टूटता था और न ही कीड़े के पैर से छूटता था। कौन जाने मकड़ी एक किनारे बैठी सुस्ता रही थी या कीड़े के असफल यत्न पर हँस रही थी या उसकी पीड़ा से प्रसन्न हो रही थी।
वे अखबार लेकर दीवान पर पसर गए। अभी पसरे भी न थे कि दरवाजे के चरमराने की आवाज के साथ बदरी और केशव कमरे में दाखिल हुए।
दयालजी आँख से ऐनक उतारते, अखबार एक ओर सरकाते उठ बैठे और बोले, “आओ। आओ केसो। इस तरफ कैसे भुला पड़े, भइया?”
केशव के कुछ कहने से पहले बदरी की ओर मुखातिब हुए, “और हो, सार राम! तुहऊँ चनरमा हो गए। बहिनिए देने भर का मतलब था का?”
“नहीं सुकुलजी। तबियत कुछ खराब थी। नहीं तो मेहरारू बिना भला रहा जा सकता है? और आप ठहरीं हमरी मेहरारू। इससे भी बड़ी। उसे का कहते हैं?... हंऽ, महबुबा। आप हमरी बड़की महबुबा हैं और ई केसो छोटकी। लेकिन आप ई न समझिहें कि नवकी में रमा रहा। पुराने में अभी बहुत दम-खम है।”
बदरी बोल तो रहे थे, पर सहमते-सहमते। वैसे तो दयालजी से जब भी मिलते थे, मजाक करते थे। पर आज वे रह-रहकर डर जाते थे। मजाक-मजाक में कहीं ऐसा कुछ न कह जाएँ जिससे दयालजी के मन में गाँठ बने।
“ई तो सही बात है। केसो अभी लरिका हैं। पुराने में जो दम-खम है, ऊ अबहिन इनमें कहाँ?” अपनी बाँह दिखाते हुए दयालजी बोले, “देखऽ, अबहीं तो अपनी जवानी फूटी है।”
और अंटक-अँटककर ‘हो-हो’ कर हँसने लगे।
केशव को न तो हँसते ही बनता था, न तो चुप रहते। वे रह-रहकर यही सोच रहे थे कि कहीं भइया ने ‘ना’ कह दिया, तो!...फिर रमई को कौन-सा मुँह दिखाएँगे।
दयालजी का ‘हो-हो’ एक झटके से रुका जैसे तेज भागती मोटर की ब्रेक पर अचानक पाँव आ गया हो और मुसाफिरों के आगे लुढ़कने पर ड्राइवर खुश हो रहा हो।
दयालजी के चेहरे का रंग गहरा गया था जैसे अभी-अभी रंगा गया हो। वे उठे। पंखे को तेज किया फिर अपनी जगह बैठ गए और गम्भीर मुद्रा में खिड़की की ओर ताकने लगे। मकड़ी अब कीड़े पर पिल पड़ी थी।... हंऽ, ठीक है। इस तरह से पहिले उसका मुँह ही दबोचना चाहिए। इससे एक तो अपना बचाव होता है, दूसरे शिकार जल्दी ही दम तोड़ देता है।
पूरे कमरे में पंखे की आवाज के सिवाय पूरी खामोशी थी।
दयालजी केशव से मुखातिब हुए– “का हो, केसो? सुना है, रमई बहुत बड़ा बंगला खरीदे हैं।” उनके इस वाक्य में ‘बहुत बड़ा’ पर ज्यादा जोर था।
“नहीं भइया। आपके बंगले को पाएगा? अरे, हंऽ। रमई के रहने भर को काफी है।” केशव इसी कोशिश में थे कि जैसे भी हो भइया को ही बड़ा बताना है। घी पिघलाने के लिए आँच देना पड़ता है।
“अभी रहने गए कि नहीं?” जानते हुए भी दयालजी ने पूछा। वे केशव के मुँह से सारी हकीकत सुनना चाहते थे।
“क्या कहते हैं, भइया? बिना घरभोज के नए घर में जाएँगे? और घरभोज आपके बिना हो सकता है क्या?...और...”
केशव की बात काट बदरी बोले, “अरे सुकुलजी, पियरिया तो आप ही पहिनेंगे। गोड़वो आपैका रंगा जाएगा और सेनुरवा भी आपैको लगेगा। रमई तो लावा परिछनी के टाइम पानी गिराएँगे। मैंने अंगोछा अभी से खरीद लिया है।”
बदरी को डर था कि कहीं केशव बात को बिगाड़ न दें। इसीलिए बात को मजाक का रूप दे दिया।
बदरी लोट-पोट हुए जा रहे थे जबकि केशव चुपचाप बैठे कभी दयालजी को, कभी बदरी को ताक रहे थे।
दयालजी हँस तो रहे थे, पर अंदर से सोच रहे थे।...कितना शातिर है। इत्ती-सी उमिर में ससुरा कैसे चरा रहा है। समझता है कि दयालू ने अब तक घास काटी है।
उनकी सारी ज्ञानेंद्रियाँ हर हरकत को अपने में समेटती जा रही थीं। सही बात है। ई ससुरे, रमइए के काम से आए हैं। जब और कोई दुआरा नहीं मिला तो इहाँ पहुँच आए। किस तरह दूनो मसकेबाजी में लगे हैं। लगाओ। लगाते जाओ। ई नहीं हो जानते कि दयालू पर मक्खन का कोई असर नहीं पड़ता।
बदरी और केशव दयालजी के मिजाज को अकन रहे थे। परन्तु दयालजी तो दयालजी ठहरे। अगर सामने वाला उनके मिजाज को इतनी आसानी से परख ले, तो फिर दयालजी काहे के!
दयालजी अपने चेहरे को और गहबोरते जा रहे थे।
“ए सरऊ! आजुकल बहुत दुखी हैं, हो। अब तो तुहार बहिनि जवाब दे देती हैं। बुढ़ा जो गई हैं। देखते नहीं? अब ही तो तुहरे बहनोई की जवानी आई है। अपनी छोटकी बहिनिया को बियह दो न! उसकी भी जवानी सँवर जाएगी।”
दयालजी जोर-जोर से ‘हो-हो’ करते जाते और लुंगी को बराबर करते जाते। जैसे उसमें कोई कीड़ा घुस आया हो।
अबकी बार की हँसी में केशव ने भी साथ दिया।
बदरी कुछ जवाब देते कि दयालजी की पत्नी चाय-नाश्ता लेकर आ गईं।
पत्नी को देख दयालजी ने कहा, “अपने भइया की खूब खातिरदारी करो। बरदेखुआ बनि के आए हैं। दूनो बहिनि अब एक्के साथ रहना। तुमको भी अब आराम रहेगा।”
शरमाती हुई पत्नी ने मीठी झिड़की दी, “बुढ़ौती आ गई, लेकिन मजाक करना नहीं गया।”
“मेहरारू के बुढ़ा जाने से मरदो थोड़े बुढ़ा जाता है। अच्छा तूँही बताओ कि मैं बीस पड़ता हूँ कि नहीं।” पत्नी को छेड़ते हुए दयालजी बोले।
ऐसा लगता था जैसे वे सचमुच मजाक में डूबे हैं, पर वे देख रहे थे कि कैसे केशव उथल-पुथल कर रहे थे। कुछ था जो आकार पा रहा था, पर माहौल के अभाव में निकलता न था। केशव की इस दशा पर दयालजी को मजा आ रहा था। इसीलिए माहौल को आगे ठेले जा रहे थे।
“जाइए न। आपको तनिको सरम-हया नहीं।” कह, चेहरे पर ललाई लिए पत्नी दूसरे कमरे में भागी।
अबकी दयालजी अकेले ही लोट-पोट हुए जा रहे थे। जबकि केशव हँस भी रहे थे और नहीं भी हँस रहे थे। कहीं भइया ने ‘ना’ कह दिया तो! यही था जो काँटे की तरह रह-रहकर उनके सीने में कसक उठता था।
आखिर हिम्मत बटोरकर उसने बात शुरू कर ही दी– “भइया...एक...एक ठो काम से आया था।”
“ऊ तो मैं पहिले ही जान गया था। इस दुआरे पर लोग तभी आते हैं, जब कोई काम अटकता है। हमारे कहाँ ऊ भाग कि लोग बिना काम के आवें। ई तो सिरिफ रमई के तकदीर में है। कहो, कहो। सरमाओ जिन। जेतना चाहो, ओतना कहो।”
एक कीड़ा जाले के इर्द-गिर्द मँडरा रहा था। मकड़ी चौकन्नी बैठी थी।
“दस...दस हजार रुपए चाहिए था। रमई का सौदा खतरे में है। अगर परसों तक पंद्रह हजार का बंदोबस्त न हुआ, तो उनका बयाने का दस हजार डूब जाएगा।” केशव पहले तो अचकचाए फिर अपने घोड़े को आँख मूँदकर भगाने लगे। जिस तरह अँधेरी रात में लोग डरावनी जगह पर सरपट भागते हैं, अपने-अपने भगवान को मनाते। गिरते-पड़ते, चोट खाते हुए भी अगर घर तक पहुँच गए तो भगवान की मेहरबानी है।
केशव ने राहत की साँस ली।
दयालजी अंदर-ही-अंदर मुस्करा रहे थे। बस, इतने में ही घबरा गए! चले थे दयालू की बराबरी करने।
दयालजी का कान कुलबुलाने लगा। वे अपनी छोटी अंगुली से कान खोदते हुए बोले– “काहें? दुनिया में देने वाला और कोई नहीं मिला? हग्गे के गाँड़ि नाहीं लीले के बेल। जब पइसा नहीं था, तो मकान का सौदा क्यों किया?...और तुँहन लोगन को समझाना नहीं चाहिए था?”
केशव-बदरी तो सोचकर ही आए थे कि थोड़ा-बहुत गम खाना पड़ेगा।
दोनों को चुप देख दयालजी ने अपनी बात चालू रखी, “अच्छा, तुहईं लोग बताओ। मैं का करूँ? सौदा करते समय तो रमई ने हमसे पूछा नहीं। तूँहीं दोस्तों ने खरिदवाया है। तो पइसवा की भी मदद करो। अरे भइया, जिसका हाथ पकड़ो अंत तक निबाहो। साथी बनना तो आसान है, पर निबाहना बड़ा मुश्किल है।”
दयालजी मौके से भला कब चूकने वाले थे। इसीलिए रत्ती-रत्ती वसूलने लगे।
“जिसके खुद के रहने का ठिकाना न हो, वह दूसरे का क्या खरिदवाएगा? ऊ तो रमई ने मकान दिखाया। मकान अच्छा था। ठीक-ठाक था। और सस्ता भी था। सो कह दिया कि खरीद लो। मेरे कहने से तो ऊ खरीदने से रहे। हमने देखा कि वे खरीदने का मन बना चुके हैं। फिर हम कौन होते हैं, मना करने वाले?...रही बात मदद करने की। तो भइया, हम लोगों की क्या बिसात। हद-से-हद दू-चार हजार। और ओतना तो कर ही दिए। हंऽ, हमें क्या पता? हम लोग तो यही जानते थे कि यह सौदा
आप ही के जरिए हो रहा है।”
केशव हर हाल में दयालजी को पिघलाने में लगे थे। इसके लिए तो झूठ से बड़ा और कोई ईंधन हो ही नहीं सकता। लिहाजा, उसका बेहिचक इस्तेमाल करने लगे।
पूरा कमरा एक अजीब प्रकार की दमघोंटू गैस से भर गया था। दयालजी के बदन में चुनचुनाहट होने लगी। अपनी जाँघ खुजलाते वे कमरे से बाहर निकल गए बदरी को इशारे से बैठने को कह। केशव भी उनके पीछे-पीछे हो लिए।
“कुछ सोचा, भइया?” झिझकते-सहमते केशव ने पूछा।
“सोचना का है, भाई? तुम माँगो तो दस का बीस दे दूँ। लेकिन, तूँ तो रमई के लिए माँग रहे हो। तुम तो जानते हो कि हम रमई के कटे पर पिसाब भी नहीं करने वाले।”
दयालजी हिसाब-किताब लगा चुके थे। उनके हाथ में पौधे का एक कंछा था, जिसका वे छिलका उतार रहे थे। रह-रहकर वह छिलका उनके नाखून में धँस-धँस जाता।
केशव सोच रहे थे कि भइया रमई को तो पैसा देने से रहे। अपने नाम से लेने में क्या हर्ज है? अपने नाम के उपयोग से अगर रमई का काम हो जाता है, तो इसमें बुरा क्या है? पैसा तो रमई लौटा ही देंगे। और नहीं तो जब जानेंगे कि पैसा मैं अपने नाम से लाया हूँ, तो जिंदगीभर एहसान मानेंगे।
“भइया, आप यही समझिए कि यह पैसा मुझे दे रहे हैं। मैं जल्दी ही आपका पूरा पैसा लौटा दूँगा।” केशव ने आजिजी भरे लहजे में कहा।
दयालजी ने कंछे का छिलका उतार लिया था। अब वे उसे तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन कंछा था कि टूटने का नाम ही न ले रहा था। चिम्मर था। लफ जाता था। मुड़ जाता था। मगर, टूटने को? मत पूछिए।
“कैसे भी करिए, भइया।” केशव जैसे दयालजी को जगाने की कोशिश कर रहे थे।
दयालजी अब कंछे को दाँत से काट रहे थे। बोले– “देखना पड़ेगा, हो। अभी तो एतना पइसा नहीं होगा। जानते ही हो कि माँगने वालों का ताँता लगा रहता है। लेना होता है, तब दुआरा खन मारते हैं और लौटाने के दाईं दूइज का चनरमा हो जाते हैं। माँगता हूँ तो बुरा बनता हूँ। बंदोबस्त करने में टाइम लगेगा।”
दयालजी जैसा चाहते थे वैसा होने पर भी उन्हें हैरत हुई, केशव रमई की दोस्ती पर। ‘ससुरा ई तो पूरा घाघ है।’ उन्होंने सोचा।
“जैसे भी हो, भइया। बिहान सबेरे तक तो रुपया चाहिए ही। भइया, मैं जिंदगी भर आपका एहसान मानूँगा।” अब केशव की झिझक दूर हो गई थी, क्योंकि दयालजी ने उन्हें आस की डोर जो पकड़ा दी थी। जैसे-जैसे वे करीब आते जाते, दयालजी उन्हें और आत्मीय लगने लगते।
दयालजी का पूरा जिस्म एक अजीब प्रकार की झनझनाहट से भर गया। जैसे कोई संगीत बज रहा हो। उनके पैरों में, अब अपना ही कोई कुत्ते की तरह दुम हिलाता मिलता, तब उन्हें लगता जैसे जिंदगी सार्थक हो गई। ‘तुम्हीं क्या? तुम्हारी सात पुस्त मानेगी।’ वे मन-ही-मन बड़बड़ाए।
“ठीक है। तुम कहते हो, तो दे दूँगा। लेकिन समझ लो, ई पइसा मैं तुम्हें दे रहा हूँ। रमई-फमई को नहीं। वापिस भी तूँहीं से लूँगा।” दयालजी ने केशव की आँखों में झाँकते हुए कहा।
“हंऽ हंऽ, भइया। आप इसकी चिंता जिन करें।”
केशव का चेहरा खिल उठा, जैसे मुरझाते पौधे को पानी मिल गया हो। वह सपने में भी न सोच सकता था कि दयालजी इतनी आसानी से मान जाएँगे। भइया, जरूर उसे अपना समझते हैं। नहीं तो, इतना रुपया, इतनी जल्दी भला कौन देता है? और कोई देता हो, तो देता हो, दयालजी तो नहीं ही देते। सबसे पहले पुरनोट लिखवाते, नहीं तो गहना-गुरिया माँगते।
केशव की यह खुशी दयालजी से भला कैसे छिपती! लोगों की खुशी में शामिल होना तो वे अपना धर्म समझते हैं, क्योंकि खुशी बाँटने से बढ़ती जो है। इसीलिए केशव को स्कूटर में पेट्रोल भराने भेज दिया यह कहकर– “भइया केसो, दुइए लीटर भराना। टाँकी पूरी भराने से इस्कूटर माँगने वाले पी जाते हैं।”
केशव समझ गए कि आज बुरे फँसे। ई दयालजी का घेलुआ है।...पर उनकी यह समझ दयालजी की आत्मीयता के नीचे दब गई।
एक शिकार पाने के बाद मकड़ी उसी में ऐसे डूबी कि उसे याद ही न रहा कि जाले में दूसरा शिकार फँसा पड़ा है। दयालजी कमरे की ओर भागे। बदरी अपनी बोरियत कम करने के लिए अखबार पढ़ रहे थे।
अंदर आते ही दयालजी बोले– “का हो सार राम! तूहें इस पचड़े में पड़ने की का जरूरत थी। अपनी जवान बहिनि के बारे में सोचते। अच्छा, बताओ, कब करा रहे हो बियहवा? हुड़क रहा हूँ।”
बदरी को दयालजी का यह मजाक अंदर तक बेध गया। उनके मुँह से कुछ जद्द-बद्द निकलने ही जा रहा था। इसके लिए उनके होंठ भी कंपकंपाए थे। तभी रमई का चेहरा उनकी आँखों के आगे घूम गया। जिनका सहारा केशव और उनके सिवाय कोई न था। बड़ी मुश्किल से अपने पर काबू पा बोले– “बहिनचोद, बियाह करिहें? अब आप बिटिहिनी नहीं रहीं। बुढ़ा गई हैं। गाल चिचुक गए हैं। कौन करेगा आपसे बियाह? हंऽ, कहें तो अपने चाचा से बात चलाऊँ। ऊहो बेचारे कब से रँड़ुआ हुए बैठे हैं। आपका जी भर देंगे।”
बदरी ने अपनी तिलमिलाहट को लाख छिपाने की कोशिश की, पर सफल न रहे। हुचुक-हुचुककर हँसने के बाद असल बात पर आए– “का हुआ? पइसवा का बंदोबस्त तो हो जाएगा न।”
असल में, बदरी ने समझा था कि दयालजी ने केशव को कहीं पैसा लेने भेजा है।
“काहे नहीं होगा? बियहवा कराने को राजी हो जाओ, बस! दस हजार का चीज है। अपनी प्रान पियारी के खातिर तो ई जान तक हाजिर है। सिरिफ, तुहरे खातिर। रमई के खातिर नहीं। जो रमई के लिए माँगोगे, तो झाँट भी उखाड़ के नहीं देने वाला।” इसके साथ ही दयालजी का हाथ दोनों पाँवों के बीच गया, जैसे कुछ नोच रहे हों।
“केसो को नहीं दे रहे का? केसो तो कह रहे थे कि भइया से पैसा मैं अपने लिए माँगूँगा।” बदरी बोले।
“केसो, भला काहे माँगने लगे? और जो माँगे भी तो मैं दूँगा का? नहीं भइया, नहीं। जब अपना सगा भाई अपना नहीं हुआ, तो ई तो पटिदार हैं। ई ससुरे, हमसे जलते हैं। हंऽ, तुहँके दे सकता हूँ। अगर कसम खाओ कि किसी से कहोगे नहीं। सच बताओ? मैं सिरिफ तूँहे ही अपना समझता हूँ। एही से तो हँसी-मजाक करता हूँ।” दयालजी ने जाल में दाना तो पहले ही डाल दिया था। अब उसे कसने लगे थे।
बदरी सोच रहे थे कि दयालजी रमई को पैसा देने से तो रहे। केसो को भी नहीं दिए। हमको देने को कह रहे हैं। पर अपने नाम से लेना, क्या ठीक होगा? दूसरे के झमेले में पड़ना ठीक नहीं।...रमई दूसरे हैं? वे रमई, जिन्होंने कितनी ही बार गाढ़े समय में मदद की है। पर...पर, क्या? अपने नाम से यदि उनका काम हो जाता हो, तो अपना जाता ही क्या है? उनके नाम से लेते तब भी हमें ही लौटाने आना पड़ता।
वे अपनी खुशी दबाते हुए बोले– “ठीक है, सुकुलजी। हमहीं को दे दीजिए। आपका पैसा जल्दी से लौटा दूँगा।”
दयालजी ने सोचा, ऐसे सीधे दे देना ठीक नहीं। पैसा तो देना ही है। क्योंकि उसकी लौ ही तो रंग लाएगी। पर, इतनी आसानी से देना भी ठीक नहीं।
वे बोले– “छै महीने में पइसा लौटा देना होगा। जो इससे एक दिन भी ज्यादा हो गया, तो तीन टका ब्याज लूँगा। मैं जानता हूँ कि तुम रमइए के लिए ले रहे हो। अपने लिए ले जाते, तो एक्को पइसा ब्याज नहीं लेता। काहें से तुम हमरी प्यारी हो। जान-दुलारी हो। तुँहसे ब्याज लूँगा तो तुहार बहिनि रहने देंगी? अच्छा, बतावऽ सरऊ, अबकी लगन में बियहवा करा रहे हो कि नहीं?” दयालजी अपनी हँसी हँसे और बोले– “सुनऽ सार राम। ई पइसा तूहें दे रहा हूँ। सिरिफ तूहें। न रमई को न केसो को। एही केसो को परसाल कहा था कि जो हमारे इहाँ आए, तो गोड़ काट लूँगा। देखो न, तब्बो कुकुरे की नाईं चला आता है।”
बदरी का कलेजा फट पड़ना चाहता था। सच, दयालजी उसे इतना मानते हैं। उसे इन दोनों भाइयों के झगड़े में नहीं पड़ना चाहिए। दूनो जने से बना के रखने में बुरा क्या है?
दस-बीस हजार रुपए दयालजी के लिए कोई बड़ी बात नहीं। इतना पैसा तो उनको हमेशा रखना पड़ता है। क्या पता, कब कोई माँगने वाला टपक पड़े? समय से पैसा देने पर फायदा भी अच्छा होता है। सब समय का चक्कर है। हाँ, समय को अपने मन-माफिक बनाना पड़ता है। कइसे बन गया। यहाँ तो वही हो रहा था, जो वे चाहते थे। यह पैसा अपने साथ न जाने कौन-कौन-सी चीज लाएगा। लाभ कमाना है तो पैसा लगाना ही पड़ेगा।
तभी केशव स्कूटर घुड़घुड़ाते आ पहुँचे। केशव के पास आते ही दयालजी बोले– “मकान-मालिक को ही देना है न! कल उसके यहाँ पूरा दस हजार पहुँच जाएगा। तुहँन लोगन निश्चिंत रहो।”
‘नमस्कार’ कर बदरी और केशव चलते बने। रास्तेभर कोई कुछ न बोला। दोनों अंदर-ही-अंदर फूलते रहे। डूबते रहे। उतराते रहे।
दयालजी बहुत खुश थे। नहीं, खुश होने की बात अभी नहीं है। अब तो और चौकन्ना रहना पड़ेगा। यह तो अभी बीज बोया है। इसके बाद खाद-पानी देना होगा। खर-पतवार निकालना होगा। ओला-पाला से बचाना होगा।
दयालजी को उजाला रह-रहकर परेशान कर रहा था। जब भी वे ऐसे कठिन समय में आते, अँधेरा ही उनका एकमात्र साथी बन जाता। दोनों लोग आपस में बतियाते और कोई-न-कोई रास्ता निकालकर रहते।
उन्होंने बत्ती बुझा दी। खिड़कियाँ बंद कर दीं और घुप्प अँधेरे में तकिए के सहारे लेट गए। उन्हें लगा, जैसे उनके कान इस तरह के वाक्य सुनने को मचल रहे हों– “भाई दयाल, तूँ तो अपना जमा लिए। अब अपनों का भी कुछ करो। नहीं तो, दुनिया यही कहेगी कि देखो, यह दयालजी का भतीजा है। यह दयालजी का भाई है।...”
और मुँह व्यग्र हो रहा हो, इस तरह के जवाब देने को– “का जमा लिए? एक ठो टुटहा-फुटहा घर बना लिए, तो जमा लिए?”
और मन ‘बरसहिं जलद भूमि निअराए’ की तरह झुकने को बेताब था, क्योंकि यह झुकना कितनी ऊँचाई पर उठा देता है। समझने वाले ही समझ सकते हैं। बुद्धि वाले नहीं, केवल विशुद्ध भावना वाले। कैसा लगे! जब सामने वाला जामवंत की तरह बार-बार यह ठसाते न अघाए कि दयाल तुम तो समुद्र पार कर सकते हो। यदि तुमने नहीं किया तो हम सभी मारे जाएँगे।
तभी मन उड़कर गाँव पहुँच गया। जहाँ कोई कहता है– “दयालू को देखो। बाप...बाप का चलता तो मिल में कठला सुरुकता, नहीं तो इहाँ बैलों का गोबर काढ़ता। लेकिन देखो...उसने क्या नहीं किया। इसे कहते हैं भइया, पुरुसारथी। आजु है कोई जो उसकी बराबरी कर सके?”
पुरुषार्थी! हाँ, वे पुरुषार्थी ही तो हैं। कोई गलत थोड़े कहता है। देखो न, कैसे अपने आप गोटी बिछ गई। बनने को होता है, तो उल्टी चाल भी दुश्मन पर बीस पड़ती है। केसो और बदरी तो अब इस दुआरे के कुकुर हो गए। जब भी ‘तूऽ-तूऽ’ की आवाज लगाई, दुम दबाए हाजिर। दस हजार रमई। रमई दस हजार। वे तौलने लगे। कभी रमई का पलड़ा भारी लगता, कभी नोटों का। काफी कशमकश के बाद उन्हें रमई का पलड़ा भारी लगा।
रमई का मकान चमचमा रहा है। बंदनवार सजाए गए हैं। लाउडस्पीकर जोर-जोर से चीख रहा है। लोगों की चहल-पहल से पूरा घर गनगना रहा है। एक ओर भण्डारा चढ़ा है। पूरा घर और आस-पास का वायुमण्डल मिठाइयों और पकवानों की सुगंध से भर गया है। रंग-बिरंगे कपड़े पहने बच्चे खेल रहे हैं। कोई किसी को गिरा देता है। कोई रोता है। कुत्ते मारे जाने के बावजूद रह-रहकर अंदर घुस जाते हैं। तभी चिल्लाते-भागते हैं। मकान के अंदर रमई और उनकी पत्नी ‘सत्नरायन’ की कथा सुन रहे हैं। आस-पास बैठी स्त्रियाँ आपस में बतिया रही हैं।
केशव और बदरी आज बहुत व्यस्त नजर आ रहे हैं। कहीं कोई कचास न रह जाए। सभी लोगों की जबान पर इन तीनों की दोस्ती ही जगह जमाए है। आज के जमाने में ऐसे दोस्त दीया लेकर ढूँढने पर भी नहीं मिलते।
दयालजी सपरिवार जल्दी आ गए थे, क्योंकि सगे भाई का घरभोज जो था। सामाजिक...नहीं, नहीं। कुशल सामाजिक होने के नाते उनका फर्ज बनता था कि अपना कुछ योगदान करें। अपना फर्ज, और कोई चूके तो चूके, दयालजी नहीं चूक सकते थे। फर्ज को झंझट समझकर नहीं, नसीब समझकर पूरा करते थे। अपने काम के इंतजार में ही वे सबसे अलग-अलग खड़े सोच रहे थे।
भाग-दौड़ करते बदरी की निगाह अचानक दयालजी पर पड़ी। पहले तो वे अचकचाए, फिर दौड़े आए दयालजी के पास और नमस्कार कर बोले– “कब आए, सुकुलजी? कब से बाट जोह रहा था। मेहरारू बहुत राह तकाती हैं।”
“अबहिने आया।” दयालजी गम्भीर स्वर में बोले, जैसे मजाक का उन पर कोई असर ही न पड़ा हो।
“चलिए, उधर बैठिए न। इहाँ अकेले क्यों खड़े हैं?...आपने सुकुलजी, मेरी नाक रख ली। यह सब आप ही की बदौलत हो रहा है।” बदरी के स्वर में एहसान का दबाव स्पष्ट दिख रहा था।
“नहीं, नहीं। मेरी बदौलत काहें के? ई तो सब तुम्हारी मेहनत का फल है।” दयालजी बदरी को पढ़ने लगे।
बदरी कुछ न बोल सके। वे जल्दी दयालजी से छूटना चाहते थे, क्योंकि अभी बहुत काम देखना था।
“कहो, हम तो समझ ही नहीं पा रहा कि एतना पइसा रमइवा के पास कहाँ से आ गया? बड़ा जबरदस्त घरभोज कर रहा है। और किसी से पइसा लिए है का?” दयालजी टहलते हुए और किनारे जाकर बोले। दयालजी निश्चित जगह पर पहुँच गए थे, लोगों से दूर।
“हम लोग तो नहीं लिए। रमइये इसका इंतजाम किए हैं। हंऽ, पइसा तो बहुत लगा है।” बदरी के लहजे से यह बात साफ थी कि वे इतने बड़े आयोजन के समर्थक न थे।
“एक बात पूछूँ? दूसरे को मकान खरिदवाते फिरते हो, अपने क्यों नहीं ले लेते?” दयालजी ने देखा कि बात को लम्बी खींचने का समय नहीं है।
“नाहीं, सुकुलजी। घर खरीदने का अपना बेंवत नहीं है।”
“काहें, भइया? रमई मदद नहीं करेंगे का?”
“आपो का मजाक करते हैं? बड़ी मुस्किल से तो वे खुदे लिए। मदद कहाँ से करेंगे?”
“तुँहुँके मजाक लग रहा है? इन्साफ तो ईहे कहता है कि करना चाहिए।...अच्छा, कोई मकान तो देखो। मदद हम करेंगे। हम यह नहीं सह सकते कि सबके मकान हो और हमरे प्रानपियारी के न हो।” दयालजी बदरी के चेहरे की बनती-मिटती रेखाओं और आते-जाते रंगों से ताड़ चुके थे कि बदरी भी मकान खरीदना चाहते हैं। उनके अंतर में कहीं-न-कहीं बदरी का यह मकान बनता-बिगड़ता जा रहा था, जो उनके चेहरे पर उतिरा आ रहा था।
दयालजी फुसफुसाकर बोले– “हमें लगता है भइया, रमई के पास पइसा था। तुम लोग कहीं माँग न बइठो एसे पइसा खुटने का बहाना किया था। आखिर, बाबू का सब पइसवा गया कहाँ? तूँहँन लोग भोले हो। कुछ समझते-बूझते नहीं। एही भोलापन के नाते तो तूँहें चाहता हूँ। खैर, कोई बात नहीं। मकान देखो। पइसे की चिन्ता जिन करो। अच्छा, ठीक से व्यवस्था करना। कोई भद्द न होने पावे।”
“अच्छा, सुकुलजी। फिर मिलता हूँ।” कह बदरी व्यवस्था की देख-रेख में चल दिए।
दयालजी खूब उत्साहित थे। अब वे केशव की राह देख रहे थे। धीरे-धीरे सरककर उस जगह पहुँच गए, जहाँ से केशव बार-बार गुजर रहे थे। आखिर में, सामना हो ही गया। दयालजी ने ही पूछा– “का हो, केसो? बहुत ब्यस्त हो।”
“नहीं, भइया। कोई खास नहीं। रमई कथा पर बैठे हैं। इसलिए काम-धाम तो देखना ही पड़ेगा।” केशव ऐसे सफाई दे रहे थे, जैसे चोरी करते रंगे हाथ पकड़ लिए गए हों।
“बहुत खरच किया है, हो। सौदे के दाईं तो पइसा खुट गया था। अब कोई गड़ा धन मिल गया है, का? कि धोकरहा पाले है?” फुसफुसाकर दयालजी बोले और केशव को पढ़ने लगे। दयालजी सुनने की अपेक्षा पढ़ने में ज्यादा विश्वास करते थे।
“का पता भइया? उस टाइम तो नहीं था।” केशव बोले।
“यही तो नहीं जानते। उस टाइम भी था। ईहो बाबुए पर गया है। ऊहो बाबा का सब पइसा हजम कर गए थे। भाइयों को फूटी कौड़ी भी न दिए। आखिर, बाबू का पइसवा इसके पास नहीं है, तो गया कहाँ? साथ में तो ईहे रहता था, न।”
दयालजी ने जान-बूझकर अपने बाप को बेईमान बताया था, क्योंकि दयालजी के बाप और केशव के बाप सगे भाई थे।
केशव कुछ न बोले।
“रमई तुहार दोस्त हैं। ई मत समझना कि मैं उनकी बुराई कर रहा हूँ। आखिर, बुरा चाहता तो पइसा क्यों देता? मैं तो बात कर रहा था...मित्र से लुका-छिपी कौनो अच्छी बात नहीं। अच्छा बताओ। क्या तूँहें मालूम है कि घरभोज के लिए कहाँ से पइसा आया?” दयालजी बार-बार वहीं चोट कर रहे थे, जहाँ केशव के जख्म था।
“नहीं।” केशव का पुराना दर्द टीसने लगा।
“सोचना। अपने-आपे हकीकत जान जाओगे। और कुछ मत सोचना। यह तो हमने इसलिए कहा, जिससे तूँहँन लोग सँभल जाओ। हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि अन्याय होते नहीं देख सकता। एही से तो बाबू से कब्बो पटी नहीं।” दयालजी बोले– “अच्छा, जाओ। काम-धाम देखो। फुरसत में सोचना।”
केशव अनमने-से भण्डारे की ओर चल दिए।
दयालजी अब लोगों के बीच बैठकर हँसी-मजाक करने लगे। दयालजी अपने समाज में खुशदिल इन्सान के रूप में मशहूर थे।
बदरी और केशव के मन में दयालजी द्वारा बोया गया बीज सुरसा के मुँह की तरह विकसित होने लगा। क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ होने लगीं। असल बात यह है कि दयालजी बीज छींटने के पहले जमीन को कोड़ते-खनते थे। देशी के साथ-साथ बिलायती खाद भी डालते थे। वे भले ही नौकरी कर रहे थे, शहर में रह रहे थे, मगर जेहन में का किसान अभी मरा नहीं था।...
बदरी और केशव अपनी जान तो काम में लगे थे, पर हकीकत में वे काम कर नहीं पा रहे थे।
अव्यवस्था को देख रमई तिलमिलाए जा रहे थे। कितनी जद्दोजहद के बाद यह आयोजन किया था, सब उनकी आँखों के सामने ही नष्ट हुआ जा रहा था। खुद भी दौड़-धूप में लग गए। पर किसी को कचौरी नहीं मिली, तो किसी को गुलाबजामुन। किसी को पूरियों के लाले पड़े, तो किसी को सब्जी के। जबकि जूठन इतना बचा कि कुत्ते मित्रभाव से दावत उड़ा रहे थे।
दयालजी को आज के खाने में खूब मजा आया। ऐसे में, रमई से मिलना जरूरी था। पसीने से तर-ब-तर रमई आखिर उन्हें मिल ही गए। छूटते ही दयालजी ने कहा– “भइया रमई, कैसी ब्यवस्था किए थे? जो पइसा खुट गया था, तो मुझसे माँग लेते। जइसे मकान-मालिक को भिजवा दिया, ओइसे तूँहें भी भिजवा देता। जइसे छप्पन वोइसे गप्पन।...ऊ पइसा बदरी और केसो को नहीं, तूँहें दिया था। आखिर जइसे भी हो, हमारे भाई हो। तुहार इज्जत गई, तो हमरी भी गई। एक्के बाप के दूनों जनी हैं।”
रमई कुछ न बोल सके। एक गुनहगार की तरह सिर झुका लिए।
सभी लोग खाना खाकर जा चुके थे। रमई एक कुर्सी पर सिर झुकाए बैठे थे। उनका एक हाथ माथे पर था। आँखें मुदी थीं। काम से निबटकर बदरी और केशव धीरे-धीरे रमई के पास आए। उन दोनों ने भी अभी तक खाना नहीं खाया था। सोचा था कि तीनों साथ बैठकर खा लेंगे। वैसे तो थकावट और चिन्ता के कारण भूख मर गई थी। थोड़ी देर दोनों खड़े रहे, पर रमई ने सिर न उठाया।...बहुत दुखी है। उन दोनों के मन में रमई के प्रति सहानुभूति जग उठी।...दुख तो होगा ही, न। कितनी जहमत उठाकर सारी व्यवस्था की थी। अभी बोलेगा। कुछ पल और गुजर गए। रमई में कोई हलन-चलन न हुआ।...शायद उसे पता ही नहीं कि हम लोग उसके पास खड़े हैं। बदरी ने खँखारकर अपने होने का एहसास कराना चाहा। फिर भी रमई ज्यों-के-त्यों ही रहे।
केशव ने बदरी को इशारा किया। जिसका मतलब था, चलो। धीरे-धीरे दोनों रमई के घर से बाहर हो गए।
दयालजी को रात को ही पता चल गया कि बदरी और केशव बिना खाए चले गए। रमई ने पूछा तक नहीं।
खिड़की के दूसरे कोने में भी मकड़ी जाला बनाने में जुट गई।
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