कामरेड आर.बी. यादव
कैसे भी हो, उसे मैं अपना मित्र कहने की जुर्रत नहीं कर पा रहा। क्योंकि मैं ठहरा एक अदना-सा मास्टर और वह अनगिनत पटरियाँ बदलकर पहुँचा हुआ आदमी। आदमी से भी ऊँचा, जिसे देवता कहते हैं, वह। संयोग कहें या भाग्य कि उसके साथ ही पढ़ा था। साथ-साथ चाय पी थी। साथ-साथ पिक्चर देखी थी। दोस्त तो वह तब भी नहीं था। अक्सर वह कहा करता– “सीनियर कभी भी दोस्त नहीं हो सकता। फ्रेंडशिप तो भैया, बराबरी में हुआ करती है।” मुझसे तो वह पैदाइशी सीनियर था, साथ ही साहित्य के सम्पर्क में वह चड्डी पहनने के समय से ही आ गया था। जब-तब वह कहा भी करता– “राजू, अभी तुम नौसिखुए हो। डू यू नो? मैं इस लाइन में सात साल से झक मार रहा हूँ। मेरी पहली कहानी तब छपी थी, जब मैं नौवीं में पढ़ता था। मैंने पढ़ा ही नहीं, समझा। तुम क्या जानो, मुक्तिबोध को धाँसू विद्वान भी नहीं समझ पाते। जानते हो मुक्तिबोध को? पढ़ना, जरूर पढ़ना। मगर पहले मार्क्सवादी समझ को बढ़ाओ।” मैं कुछ बोलता इसके पहले वह फिर शुरू हो जाता– “और मार्क्स-एंगेल्स, लेनिन, कोडवोल, लूकाच...को बारहवीं करते-करते चाट गया था। देखो, अभी तुम्हें बहुत कुछ पढ़ना है। फर्स्ट रीड एण्ड ट्राय टू अण...