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रेहन पर रग्घू
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रेहन पर रग्घू श्रीराम त्रिपाठी साहित्यकार अपने वातावरण, मतलब कि अपने समय की बात (वात) के आवरण को भेदते हुए अपनी बात का आवरण बुनता है। एक लेखक अपने दीर्घकालीन जीवन के वातावरण को किस तरह भेदते हुए एक नया वातावरण बुनता है, जानना हो तो ‘रेहन पर रग्घू’ पढ़ना चाहिए। काशीनाथ सिंह का लेखन उस साठोत्तर काल से शुरू हुआ, जिसे युवा आक्रोश और विद्रोह का काल कहा जाता है, परंतु इस उपन्यास में आक्रोश और विद्रोह का नामो-निशान तक नहीं है। इसका मतलब है कि काशीनाथ सिंह जीवन में युवा आक्रोश और विद्रोह की भूमिका को स्थायी नहीं, क्षणिक मानते हैं। वास्तविक जीवन तो टूटन-छीजन, समझौते आदि से निर्मित होता है। ज्ञानदत्त चौबे का जीवन आक्रोश और विद्रोह की ही परिणति है। इतिहास साक्षी है कि साठोत्तर कवियों ने या तो आत्महत्याएँ कीं, या आत्महत्या में नाकाम होने पर अपाहिज बनकर लोगों तथा “घर वालों की गालियाँ और दुत्कार” पायीं। “आज वही ज्ञानदत्त–बिना पैरों का ज्ञानदत्त–चौराहे पर पड़ा भीख माँगता है। मरने की ख्वाहिश ने उसे कहीं का न छोड़ा!” उसने मरने की कोशिश एक बार नहीं, दो-दो बार की थी, “जाने क्यों, उसमें जीवन से मोह पैदा हुआ ...
जिसका डर था
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घर में पैर रखते ही केदारनाथ की निगाह खाट पर पड़े तमंचे पर पड़ी और वे पत्नी से पूछ बैठे– “ये तमंचे कौन लाया है?” “राजू लाया है। क्यों?” पत्नी ने जवाब दिया। उसके जवाब में जहाँ बेटे के लिए गर्व था, वहाँ पति के लिए तिरस्कार का भाव था। जैसे वह कह रही हो कि तुमसे ज्यादा समझदार और जिम्मेदार तो अपना राजू है। उसे परिवार के सुख-दुख की कितनी चिन्ता है। वह जानता है कि दीवाली आ रही है। ऐसे में बच्चों को पटाखे आदि तो चाहिए ही।...तुम्हें परिवार के सुख-दुख से क्या काम। तुम्हारे लिए तो नौकरी ही सब कुछ है। जैसे इतना कम हो, उसने आगे जोड़ा– “मिठाई भी लाया है। क्या मिठाई है! देखनेभर से जी भर जाता है।” पत्नी की जीभ मथनी बनी हुई थी और होंठ कड़ाही। मथनी के दबाव से कड़ाही टेढ़ी-मेढ़ी हुई जा रही थी। केदारनाथ तिलमिला गए। जैसे पत्नी ने उनके आदमी को ही ललकारा हो और कई पटखनियाँ दी हों। वह उठने की कोशिश करता कि अबकी बार बदला जरूर लूँगा कि तुरन्त धूल चाटने लगता। अपने घावों को छिपा वे बोले– “कहाँ है? लाओ, जरा देखूँ तो। मैं न ला सका, पर मेरा बेटा तो लाया न।” पत्नी जीत के भाव से भरी थी। उसमें उत्साह-ही-उत्साह था। वह उठ...
जाल
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जब से दयालजी के भाई रमई ने मकान का सौदा किया है, दयालजी की नींद हराम हो गई है। हमेशा चिढ़े-चिढ़े रहते हैं। किसी भी काम में मन नहीं लगता। इस मकान ने उनके दिलो-दिमाग को कुछ ऐसे जकड़ लिया है कि उन्हें हर-हमेश ईंट-ही-ईंट नजर आती है। बिखरी-बिखरी। टूटी-फूटी। ईंट ऐसी है कहाँ? अब तो दीवाल बन गई है। नहीं, दीवाल कैसे रहेगी? उचककर उन्होंने झाँपे की ओर ताका। ससुरा अभी तक नहीं आया। क्या किया-धिया सब अकारथ जाएगा? नहीं, नहीं। ऐसा कैसे हो सकता है? आएगा। जरूर आएगा। सूचना गलत नहीं हो सकती। देखो न, मकान-मालिक कैसे पेश आ रहा है। करो, खूब करो। कौन रोकता है? सोचे थे कि दयालू को किनारे कर मकान कर लेंगे। अरे भइया, दयालू को दू-चार हजार ही मिलता न! लेकिन तुम्हें कितना फायदा होता। एक तो सौदा सस्ते में पटता दूसरे मुहलत भी मिल जाती। लो कूटो। दयालू की बराबरी करने चले थे। ई कहाँ हो सकता है कि दयालू के बिना कोई काम पूरा पाड़ लो। अगर दयालू का थोड़ा एहसान ले लेते हो, दयालू से थोड़ा दबकर रहते हो, तो तुम्हारा जाता ही क्या है?...हम तो कहते हैं भइया, कलट्टर बनो न! पर ई नहीं हो सकता कि दयालू की मदद के बिना बनो। दयालू, दयालू...