जिसका डर था
घर में पैर रखते ही केदारनाथ की निगाह खाट पर पड़े तमंचे पर पड़ी और वे पत्नी से पूछ बैठे– “ये तमंचे कौन लाया है?” “राजू लाया है। क्यों?” पत्नी ने जवाब दिया। उसके जवाब में जहाँ बेटे के लिए गर्व था, वहाँ पति के लिए तिरस्कार का भाव था। जैसे वह कह रही हो कि तुमसे ज्यादा समझदार और जिम्मेदार तो अपना राजू है। उसे परिवार के सुख-दुख की कितनी चिन्ता है। वह जानता है कि दीवाली आ रही है। ऐसे में बच्चों को पटाखे आदि तो चाहिए ही।...तुम्हें परिवार के सुख-दुख से क्या काम। तुम्हारे लिए तो नौकरी ही सब कुछ है। जैसे इतना कम हो, उसने आगे जोड़ा– “मिठाई भी लाया है। क्या मिठाई है! देखनेभर से जी भर जाता है।” पत्नी की जीभ मथनी बनी हुई थी और होंठ कड़ाही। मथनी के दबाव से कड़ाही टेढ़ी-मेढ़ी हुई जा रही थी। केदारनाथ तिलमिला गए। जैसे पत्नी ने उनके आदमी को ही ललकारा हो और कई पटखनियाँ दी हों। वह उठने की कोशिश करता कि अबकी बार बदला जरूर लूँगा कि तुरन्त धूल चाटने लगता। अपने घावों को छिपा वे बोले– “कहाँ है? लाओ, जरा देखूँ तो। मैं न ला सका, पर मेरा बेटा तो लाया न।” पत्नी जीत के भाव से भरी थी। उसमें उत्साह-ही-उत्साह था। वह उठ...