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जनवरी, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जिसका डर था

घर में पैर रखते ही केदारनाथ की निगाह खाट पर पड़े तमंचे पर पड़ी और वे पत्नी से पूछ बैठे– “ये तमंचे कौन लाया है?” “राजू लाया है। क्यों?” पत्नी ने जवाब दिया। उसके जवाब में जहाँ बेटे के लिए गर्व था, वहाँ पति के लिए तिरस्कार का भाव था। जैसे वह कह रही हो कि तुमसे ज्यादा समझदार और जिम्मेदार तो अपना राजू है। उसे परिवार के सुख-दुख की कितनी चिन्ता है। वह जानता है कि दीवाली आ रही है। ऐसे में बच्चों को पटाखे आदि तो चाहिए ही।...तुम्हें परिवार के सुख-दुख से क्या काम। तुम्हारे लिए तो नौकरी ही सब कुछ है। जैसे इतना कम हो, उसने आगे जोड़ा– “मिठाई भी लाया है। क्या मिठाई है! देखनेभर से जी भर जाता है।” पत्नी की जीभ मथनी बनी हुई थी और होंठ कड़ाही। मथनी के दबाव से कड़ाही टेढ़ी-मेढ़ी हुई जा रही थी। केदारनाथ तिलमिला गए। जैसे पत्नी ने उनके आदमी को ही ललकारा हो और कई पटखनियाँ दी हों। वह उठने की कोशिश करता कि अबकी बार बदला जरूर लूँगा कि तुरन्त धूल चाटने लगता। अपने घावों को छिपा वे बोले– “कहाँ है? लाओ, जरा देखूँ तो। मैं न ला सका, पर मेरा बेटा तो लाया न।” पत्नी जीत के भाव से भरी थी। उसमें उत्साह-ही-उत्साह था। वह उठ...

जाल

जब से दयालजी के भाई रमई ने मकान का सौदा किया है, दयालजी की नींद हराम हो गई है। हमेशा चिढ़े-चिढ़े रहते हैं। किसी भी काम में मन नहीं लगता। इस मकान ने उनके दिलो-दिमाग को कुछ ऐसे जकड़ लिया है कि उन्हें हर-हमेश ईंट-ही-ईंट नजर आती है। बिखरी-बिखरी। टूटी-फूटी। ईंट ऐसी है कहाँ? अब तो दीवाल बन गई है। नहीं, दीवाल कैसे रहेगी? उचककर उन्होंने झाँपे की ओर ताका। ससुरा अभी तक नहीं आया। क्या किया-धिया सब अकारथ जाएगा? नहीं, नहीं। ऐसा कैसे हो सकता है? आएगा। जरूर आएगा। सूचना गलत नहीं हो सकती। देखो न, मकान-मालिक कैसे पेश आ रहा है। करो, खूब करो। कौन रोकता है? सोचे थे कि दयालू को किनारे कर मकान कर लेंगे। अरे भइया, दयालू को दू-चार हजार ही मिलता न! लेकिन तुम्हें कितना फायदा होता। एक तो सौदा सस्ते में पटता दूसरे मुहलत भी मिल जाती। लो कूटो। दयालू की बराबरी करने चले थे। ई कहाँ हो सकता है कि दयालू के बिना कोई काम पूरा पाड़ लो। अगर दयालू का थोड़ा एहसान ले लेते हो, दयालू से थोड़ा दबकर रहते हो, तो तुम्हारा जाता ही क्या है?...हम तो कहते हैं भइया, कलट्टर बनो न! पर ई नहीं हो सकता कि दयालू की मदद के बिना बनो। दयालू, दयालू...

छुतिहर

छुतिहर बंगले के लान में चौपाल जमी थी। सभी के चेहरे गंभीर थे। जैसे अभी-अभी मय्यत से लौटे हों। मानो शहर की मिलों और फैक्ट्रियों का सारा धुआँ इसी लान में पसर गया हो। स्ट्रीट लाइट का प्रकाश भी इस धुएँ में बिला जा रहा था। परछाइयाँ ऐसे लग रही थीं जैसे भूत-प्रेत किसी भावी प्रोग्राम में मशगूल हों। लान में लगे फूलों ने जैसे इन लोगों के दुख में खुद को शामिल कर लिया था। मगर एक छिनाल रातरानी थी जो समय-कुसमय का खयाल किए बिना आवारा झोंके के साथ इश्क लड़ा रही थी। बड़ी देर की श्मशानी चुप्पी को देबीदीन ने तोड़ा– “मजबूर हूँ कि आप लोगों को पानी-कानो भी नहीं पूछ पा रहा। कहाँ सोचा करता था कि कोई प्रोग्राम बनाऊँ और आप लोगों को बुलाऊँ। मगर, मन की मुराद मन ही में रह गई। आप लोग आए और मैं आवभगत भी नहीं कर पा रहा।” देबीदीन का गला भर आया। वे रूमाल से अपनी आँखें पोंछने लगे और उसाँस लेते बोले– “सब समय का फेर है। चाचा कितने भले आदमी थे। आज दस बरस हो गए हमसे उनसे पैलगी-आसीर्वाद भी न था। मगर, चाचा की भलमनसाहत को कैसे भुलाया जा सकता है? चाचा अपने कौल के पक्के थे। इसी को कहते हैं कि इन्सान कुछ लेकर नहीं जाता, अपने कर्मो...

भूख

भूख आज कालीप्रसाद बहुत ख़ुश है। पता नहीं, किसका मुँह देखकर उठा है। सबेरे-सबेरे ही किसुनदेव पंडित न्यौता माँग गये हैं। घरजनवाँ एक जन। पर, गाँव में सभी लोग ब्राह्मण के रूप में न्यौता खाने नहीं जाते। वे इस प्रकार के भोजों में शामिल होने वालों को अपने से निम्न समझते हैं। प्रायः इस प्रकार के भोजों में शामिल होने वाले ग़रीब हैं। पर, ये लोग अक्सर कहा करते हैं– “अगर ब्राह्मण ही जज्ञ-प्रयोजन अथवा जनम-मरण पर खाने नहीं जाएगा, तो लोगों का उद्धार कैसे होगा!” काली के पिता कलकत्ता में नौकरी करते हैं। काली और शिवा ही अपने घर के सवाँग हैं। अतः इन दोनों में से ही कोई एक सामाजिक कार्यों में अपने पिता का प्रतिनिधित्व करता है। न्यौता खाने तो दोनों जाना चाहते हैं, पर एक ही जन की ‘अज्ञा’ होने के कारण एक को मन मारना पड़ता है। अतः दोनों में पारी बँधी है। काली, शिवा से दो बरस छोटा है। पिछली बार शिवा गया था, इसलिए अपनी पारी आने के कारण काली बहुत ख़ुश है। काली को लगता है कि आज वह गाँव के दूसरे लड़कों से सयाना हो गया है। इसलिए बड़े-बूढ़ों के साथ उसे भोज में जाना है। ऐसा आज ही नहीं, जब भी उसे किसी भोज में जाना होता...