इनसान होने की जद्दोजहद
अच्छी रचनाएँ द्वन्द्वती-संयोजती हैं। वह ज्ञात और अज्ञात, समझ और असमझ तथा सम्मति और असम्मति की द्वन्द्वात्मक संयोजना करती हैं। इसीलिए प्रभावित करती हैं। तेजिन्दर का बहुचर्चित उपन्यास ‘काला पादरी’ अपने प्रकाशन के सात साल बाद मेरे हाथ आया। पहली बात तो यह कि इसे एक ही बैठक में पढ़ गया। स्पष्ट है कि यह एक रोचक उपन्यास है। मतलब कि पढ़ने को उकसाता है। इसकी प्रवहता (पर की ओर वहने की क्षमता) कहीं ठहरने नहीं देती। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि पढ़ने के दौरान आप कहीं थकते-ऊबते नहीं, जिससे कि सुस्ताने की ज़रूरत पड़ती। किसी भी रचना की यह बड़ी कामियाबी है। ऐसा भी नहीं कि आप पढ़ने के दौरान सोचते-विचारते नहीं, या असहमत नहीं होते, या कुछ खटकता नहीं। बीच-बीच में यह सब होता रहता है, बावजूद इसके आप इसे पढ़कर ही दम लेते हैं। दरअसल, मुझे अपनी छानबीन करनी है, यह उपन्यास तो माध्यम है यह जानने का कि मुझे क्या और कैसे रुचने लगा है तथा क्या और कैसे अरुचने। इस उपन्यास के पठन से पहले मुझे क्या और कैसे रुचता था, तथा क्या और कैसे अरुचता। मेरी रुचि-अरुचि में जो भी तब्दीली आयी, स्पष्ट है कि उसमें इस उपन्यास का प्रमुख योगदान है...