इनसान होने की जद्दोजहद

अच्छी रचनाएँ द्वन्द्वती-संयोजती हैं। वह ज्ञात और अज्ञात, समझ और असमझ तथा सम्मति और असम्मति की द्वन्द्वात्मक संयोजना करती हैं। इसीलिए प्रभावित करती हैं। तेजिन्दर का बहुचर्चित उपन्यास ‘काला पादरी’ अपने प्रकाशन के सात साल बाद मेरे हाथ आया। पहली बात तो यह कि इसे एक ही बैठक में पढ़ गया। स्पष्ट है कि यह एक रोचक उपन्यास है। मतलब कि पढ़ने को उकसाता है। इसकी प्रवहता (पर की ओर वहने की क्षमता) कहीं ठहरने नहीं देती। इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि पढ़ने के दौरान आप कहीं थकते-ऊबते नहीं, जिससे कि सुस्ताने की ज़रूरत पड़ती। किसी भी रचना की यह बड़ी कामियाबी है। ऐसा भी नहीं कि आप पढ़ने के दौरान सोचते-विचारते नहीं, या असहमत नहीं होते, या कुछ खटकता नहीं। बीच-बीच में यह सब होता रहता है, बावजूद इसके आप इसे पढ़कर ही दम लेते हैं। दरअसल, मुझे अपनी छानबीन करनी है, यह उपन्यास तो माध्यम है यह जानने का कि मुझे क्या और कैसे रुचने लगा है तथा क्या और कैसे अरुचने। इस उपन्यास के पठन से पहले मुझे क्या और कैसे रुचता था, तथा क्या और कैसे अरुचता। मेरी रुचि-अरुचि में जो भी तब्दीली आयी, स्पष्ट है कि उसमें इस उपन्यास का प्रमुख योगदान है। वैसे इस तब्दीली को साफ़ तौर पर पकड़ पाना तो बहुत मुश्किल है, क्योंकि हम ख़ुद को जानते ही कितना हैं, जो अपनी रुचि-अरुचि को जाने-बतायेंगे। बावजूद इसके मैं इसे ख़ुद को जानने-समझने के माध्यम के तौर पर ही ले रहा हूँ, न कि एक समीक्ष्य कृति के रूप में। इसी प्रक्रिया में मुझे इसकी भी पड़ताल करनी है कि यह माध्यम जैसा भी बन पड़ा है, क्या इससे बेहतर हो सकता था। अगर हो सकता था, तो कैसे। इस तरह की कोशिश किंचित सफलता और भव्य असफलता का वरण करती है, इसे जानते हुए भी दुस्साहस किया जा रहा है। यह उपन्यास, संस्कृति क्या है और वह कैसे विकसित होती है, को गहराई से चित्रित करता है। संस्कृति किस तरह विकसित होती है और धर्म किस तरह। संस्कृति से कटकर धर्म किस तरह राजनीति का अंग बन जाता है। जब तक वह संस्कृति का अंग रहता है, तब तक ही मानवीय होता है और जब सत्ता का अंग बन जाता है तो अमानवीय। जीवन पराधीनता से मुक्ति का नाम है। वह किसी भी तरह की पराधीनता नहीं चाहता, चाहे वह भारत का जीवन हो, चाहे किसी अन्य देश का। लेखक ने भारत के सबसे पिछड़े जीवन के माध्यम से इसे ही व्यक्त किया है। यहाँ एक बात कहना ज़रूरी है कि लेखक इस समाज का नहीं, बल्कि बाहरी समाज का है। मतलब कि प्रवासी है। जहाँ जा रहा है, उससे वह निहायत अपरिचित है। उपन्यास की शुरुआत अनूपपुर रेलवे स्टेशन के चित्रण से होती है। इस चित्रण में लेखकीय आत्मीयता न के बराबर है। एक तरह की तटस्थता, बावजूद इसके स्टेशन का पूरा चित्र प्रस्तुत हो जाता है। यह तटस्थता इसलिए है कि यह भारतीय रेलवे स्टेशनों की सामान्य विशेषता है। इसीलिए कहीं-कहीं हल्का-सा व्यंग्य झलक आता है। इंतज़ार ऊब पैदा करता है। केवल छह घंटे ही इंतज़ार करना है, मगर यहाँ कोई भी ऐसी चीज़ नहीं, जो अपने से इस क़दर जोड़ ले कि ऊब न जनमे। स्पष्ट है कि जहाँ जाना है वह तो और भी उबाऊ जगह होगी, मगर जाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं, क्योंकि नौकरी है। नौकरी, जो जीने का प्रमुख साधन है, के मिलने की ख़ुशी जगह की ऊब को भुला देती है। इन्हीं सामान्यताओं के बीच एक व्यक्ति ऐसा भी है, जो ध्यान खींचता है। मतलब कि सामान्यों का और सामान्यों में विशेष है। इसका बाहरी रूप तो सामान्य है, मगर भीतर का विशेष है, जो लेखक को आकर्षता और आभासता है। जिसके कारण लेखक उसके पूरे और स्पष्ट रूप को देखने-दिखाने में जुट जाता है। इस कोशिश में वो जो-जो करता है, स्मृति के आधार पर उसे भी दर्ज करता जाता है। इससे जो रूप बनता है, वही है ‘काला पादरी’ उपन्यास। देखिये, “मेरे सामने की कुर्सी पर तीस-बत्तीस वर्ष की उम्र का एक युवक बैठा था। उसका चेहरा पारदर्शी था। दुबला-पतला, नाटा-सा। लगभग मेरी ही उम्र का या शायद दो-तीन साल छोटा। मैं क़रीब तीस का था। वह मुझसे कुछ अधिक भी हो सकता था। उसका भोला-सा चेहरा देख कर लग रहा था कि यह दृश्य वह अपने भीतर कहीं समेट नहीं पा रहा था। एक हलकी मुस्कराहट उसके चेहरे पर थी लेकिन उसमें कहीं उस आदमी के प्रति मज़ाक़ उड़ाने का भाव नहीं था।”(03) इस वर्णन में देखा जा सकता है कि दूसरी अन्य चीज़ों की अपेक्षा यहाँ लेखक का लगाव स्पष्ट है। इसमें किन्हीं विशेष मानवीय तत्त्वों की अभी भी जीवंतताएँ हैं, जो लेखक के लिए विशिष्ट हैं। मतलब कि युवक में जो विशेषतायें हैं वो लेखक को बेहद पसंद हैं, इसीलिए वो आकर्षित होता है। दोनों की यही सामान्यता एक-दूसरे से जुड़ने का आधार बनती है। “उसने गहरे रंग का स्कर्ट पहन रखा था और ऊपर फटा ब्लाउज। उसकी छातियाँ अपना आकार ले रही थी, यों अभी वह बच्ची ही थी। किसी का ध्यान खींचने के लिए उसे कम से कम दो साल की और ज़रूरत थी।”(03) यूँ तो ये लेखकीय वर्णन है, मगर लेखक के ‘मैं’ पात्र का विकसित रूप होने के कारण, इस वर्णन में ‘मैं’ पात्र भी झलक जाता है। ये लेखकरूपी ‘मैं’ जब अपने भूतकालीन ‘मैं’ से पूर्णतया दूरी बना लेगा, तब ही ‘मैं’ और जेम्स खाखारूपी ‘वह’ के साथ न्याय कर पायेगा। किसी भी लेखक की यही तो सबसे बड़ी दिक़्क़त है कि अगर वो पूर्णतया दूरी बनाने में सफल हो जाता है, तो न्यायाधीश बन जाने का ख़तरा पैदा हो जाता है। अपने ‘मैं’ के लगाव के बिना रचना और रचाव कैसा! रचना-राचना साथ-साथ होता है। इसका मतलब ये है कि लेखक का लगाव और दूरी उपयुक्त मात्रा में हर पात्र के साथ होना चाहिए। शायद इलियट के कथन कि “लेखक व्यक्तित्व से पलायन करता है।” का आशय यही था। इस तरह उपर्युक्त लेखकीय वर्णन में ‘मैं’ के मनोभाव और चिंता लगे हुए हैं अलगाव के बावजूद, जिनकी अभिव्यक्ति इस तरह होती है, “क्या पागलपन में भी देह का विस्तार होता चला जाता है, मैंने सोचा।” इस कथन के तत्काल बाद ‘वह’ का असहज हो उठना, दोनों पात्रों के मनोभावों और क्रिया-कलापों का द्वन्द्वना-संयोजना है। “अचानक मेंने देखा कि वह व्यक्ति कुछ असहज हो उठा। उसकी असहजता उसके चेहरे पर स्पष्ट थी। वह चोर आँखों से लड़की की छातियों की तरफ देख रहा था।” यह दृश्य अहम इसलिए है कि दोनों उम्र और मनोभाव में लगभग समान हैं, मगर एक-दूसरे से छिपते-छिपाते हैं। यही इन दोनों अनभिज्ञों के भिज्ञने का आधार बनता है। लेखक ने यहाँ अपने ‘मैं’ की गतिविधि को छिपा लिया, शायद संकोचवश। ‘मैं’ शैली की कथा के साथ यही तो कठिनाई है कि लेखक या तो मोहवश अपने ‘मैं’ को इतनी तरजीह दे देता है कि दूसरे पात्र गौण हो जाते हैं, या संकोचवश इतनी उपेक्षा कर देता कि ‘मैं’ पात्र अत्यंत गौण हो जाता है। मतलब यह कि पात्रों का चित्रण संतुलित नहीं हो पाता। यहाँ जब इस बात का ज़िक्र किया जा रहा है, तो इसका यह मतलब नहीं कि यह एक प्रभावशाली रचना नहीं है। प्रभावशाली रचना है, तभी तो इसकी छोटी-सी ख़ामी भी खटकती है और मजबूर करती है इस बात को जानने के लिए कि यह ख़ामी कैसे दुरुस्त हो सकती थी, या है। लेखक को कैसे पता चला कि “किसी का ध्यान खींचने के लिए उसे कम से कम दो साल की और ज़रूरत थी।” स्पष्ट है कि उसके भूतकालिक ‘मैं’ ने भी उस युवक की तरह ही उस लड़की की छाती को देखा था। चूँकि वह कथा उस युवक की कह रहा है इसीलिए उसकी गतिविधि को चित्रित कर रहा है। इस चित्र के माध्यम से ही इसके चित्रकार का पता चलता है। इसीलिए यह दृश्य इसका संकेत करता है कि अगर ‘मैं’ और ‘उस’ की जगह को अदल-बदल दिया जाये, मतलब कि कथा का नैरेटर ‘वह’ हो जाये, तो वह भी ‘मैं’ को इसी तरह की गतिविधि करता दिखलायेगा। लेखक, जो आदित्य नामक ‘मैं’ का ही विकास है, वह अपने ‘मैं’ से उतनी दूरी नहीं बना पाता जितनी कि ‘जेम्स खाखा’ से और ‘जेम्स खाखा’ से उतनी नज़दीकी बना लेता है जितनी कि ‘मैं’ से। कहने का मतलब यह कि ‘मैं’ से अपेक्षित दूरी न बन पाने के कारण उसके बारीक़ क्रिया-कलापों को दर्ज़ करने में एक प्रकार का संकोच आड़े आ गया, जबकि जेम्स खाखा के वर्णन में इस तरह के संकोच के लिए कोई अवकाश ही नहीं था। अगर अपेक्षित दूरी बन जाती तो ‘मैं’ सर्वनाम की जगह ‘वह’ सर्वनाम प्रयुक्त होता। तब लेखक को दोनों पात्रों का समुचित विकास करने में कोई हिचक नहीं होती। प्रथम पुरुष होने के कारण आदित्य के चरित्र का समुचित विकास नहीं हो पाया। हालाँकि जेम्स खाखा और ‘मैं’ एक ही व्यक्ति के ‘मैं’ और ‘वह’ होते लगते हैं। इस तरह ‘मैं’ और जेम्स खाखा गहन मनोमंथन के जीवंत रूप का आभास कराते हैं। इन दोनों का व्यक्तित्व एक-दूसरे के बिना अधूरा है, बावजूद इसके कि आदित्य का चरित्र दब गया है। दोनों एक-दूसरे से द्वन्द्वते-संयोजते हुए ही विकसित होते हैं। ऐसे में सोज़ेलिन मिंज जीवन (सरसानेवाली) का प्रतीक बन जाती है, जिसके इर्द-गिर्द ‘मैं’ (आदित्य) और जेम्स खाखा, दोनों हैं। ग़ौरतलब है कि सोज़ेलिन के प्रति आकर्षित होने के बावजूद ‘मैं’ सोज़ेलिन और जेम्स खाखा के संबंधों के प्रति कभी भी असंतुष्ट या ईर्ष्यालु नहीं होता। जो सहज नहीं लगता। ऐसी असहजता लेखक के अपने भूतकालिक ‘मैं’ से पर्याप्त दूरी न बना पाने कारण ही हुई। अगर लेखक उस अपने ‘मैं’ से ‘वह’ जितनी दूरी बना लिए होता, तो ऐसी असहजता के लिए कोई अवकाश न रहता। इससे मैं का चरित्र पूर्ण रूप से विकसित होता। हालाँकि ‘मैं’ प्रयोग के बावजूद लेखक ने अधिकतर ‘वह’ जितनी दूरी बना ली है, जिससे इस तरह की बारीक़ असहजताएँ छिप गयी हैं। कहने का मतलब यह है कि अगर यह उपन्यास ‘वह’ शैली में होता तो इससे ज़ियादा प्रभावशाली बन पड़ता। यहाँ इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इसमें आत्ममोह नहीं है, जैसा कि अकसर आत्मकथाओं में देखा जाता है, बल्कि आत्ममोह से बचने की अतिरिक्त कोशिश है, जिसके कारण ‘मैं’ गौण हो जाता है। इस उपन्यास में केवल बाहरी-भीतरी का द्वन्द्व और संयोजन ही नहीं है, बाहरी-बाहरी और भीतरी-भीतरी का भी द्वन्द्वात्मक संयोजन है। इसीलिए तो यह त्रिस्तरीय बन जाता है। स्तरी ही स्त्री है। तर का मतलब नम, छाया और तल होता है। स्त्री ही तीसरा स्तर (तल) है। पहला जिस्म के तल में मन और मन के तल में जल और जल के तल में जीवन। दूसरी तरह से पहला स्तर बाहर का बाहर से द्वन्द्वना, दूसरा स्तर भीतर का भीतर से द्वन्द्व और तीसरा स्तर द्वन्द्वित बाहरियों का द्वन्द्वित भीतरियों से द्वन्द्वना। इस तरह इस उपन्यास में त्रिस्तरीय द्वन्द्वात्मक संयोजना है। जीवन का मतलब और लक्ष्य है, सरसना और सरसाना। देखिये, “इस तरह वह खाखा था और सोज़ेलिन मिंज मछली। उसने झुक कर सोज़ेलिन की आँखों को चूम लिया। सोज़ेलिन मिंज जो कि अभी नींद में ही थी, उसे लगा कि जैसे खाखा उसकी आँखों के इर्द-गिर्द चोंच मार रहा हो। वह एक तरह के आनन्द से सराबोर हो गयी। खाखा की चोंच का नशा उसकी पूरी देह में धंस गया। उसने अपनी आँखें खोल दीं और बहते हुए पानी में खाखा के साथ लिपटते हुए कहा–मैं तो सपने में थी, नदी में, उसके पानी के साथ बहती हुई।अपने आसपास देखो तुम्हें पानी ही पानी नज़र आयेगा और फिर ज़रा ऊपर देखो।–जेम्स ने कहा। वह बेहद प्रसन्न था और सोज़ेलिन को अपनी बाहों में भर कर उसके साथ वह सब कुछ बाँटना चाहता था जो उसने अभी अभी देखा था। चेन्द्रा में पानी ही पानी था। ऊपर आकाश में सुंदर काले पक्षी चहक रहे थे।” (113-14) यह जेम्स खाखा का सपना है, हक़ीक़त नहीं। यह स्वप्निल दृश्य, जो जेम्स और सोज़ेलिन मिंज को तो सरसाता है, क्योंकि वे इस दृश्य के पात्र हैं, मगर क्या पाठक को नहीं सरसाता! भीतरी द्वन्द्व इसी की प्राप्ति का है, जिसमें बाधक है बाहरी द्वन्द्व। बाहर सत्ता का द्वन्द्व है, चाहे वह चर्च हो, चाहे हिन्दूवादी धार्मिक संगठन, चाहे पैलेस, चाहे राय साहब, चाहे निक्करधारी, चाहे बिशपस्वामी, चाहे कांग्रेस, चाहे भाजपा। ये सब आपस में द्वन्द्वते-संयोजते हुए ऐसा माहौल बनाते हैं कि जिसमें जेम्स खाखा और सोज़ेलिन मिंज का उपर्युक्त अदना-सा सपना भी पूरा नहीं हो पाता, जो किसी भी इनसान को सरसाता है, न कि ईर्ष्याता। धर्म के ठेकेदार जिस धर्म की बात करते हैं ठीक उस के विरुद्ध आचरण करते हैं। देखिये, “अब तक भइया-बहन के बीच लकड़ी का एक लट्ठा डाल कर एक साथ सोया करते थे। धरमेस ने विधिवत् लड़के को बुलाया और उससे कहा,–जब तुम यह लट्ठा पार करो, तब मानव की वृद्धि होगी।– और जब भइया-बहन गहरी नींद में पड़ गये तब धरमेस ने लकड़ी का वह लट्ठा उनके बीच से हटा दिया। इस तरह धरमेस ने मनुष्य की प्रथम जोड़ी की शुरुआत की।”(112) देखा न कि कहाँ तो धरमेस लकड़ी का लट्ठा हटाते थे, कहाँ ये लकड़ी का लट्ठा लगाते हैं। यहाँ ‘मानव की वृद्धि’ में प्रयुक्त ‘वृद्धि’ केवल संख्यावाची नहीं है, बल्कि गुणवाची भी है, क्योंकि “मनुष्य की प्रथम जोड़ी की शुरुआत की” का मतलब है कि पशु को मनुष्य में विकसित किया, जो गुणात्मक परिवर्तन का सूचक है। उपर्युक्त सपने में भी धरमेस ने जेम्स खाखा और सोज़ेलिन मिंज के बीच का लट्ठा हटा दिया था, “वह पलट कर जेम्स खाखा के साथ लिपट गयी। धरमेस ने उन दोनों के बीच से लकड़ी का लट्ठा उठा लिया था। जेम्स ने सोज़ेलिन मिंज को अपनी बाँहों में भर लिया। दोनों के जिस्म की गंध चेंद्रा के पानी में घुल गयी।” (114) इस वर्णन में एक तरह की आत्मीयता है, जो लेखक के विकसित ‘मैं’ के अलगाव से नहीं, पात्र ‘मैं’ के लगाव से संचालित है। तभी तो हम सबको सरसाने में समर्थ बनता है। हम सब के पास न जाने कितने विविध और विशिष्ट अनुभव हैं, मगर हम उन्हें रचना में ढाल नहीं पाते। अगर कोई ढाल पाता है, तो क्यों? अस्तित्व का संकट ही शायद रचना का मूल कारक है। शायद इसीलिए अतिरेकी व्यक्ति ही रचनाकार बनता है। वह किसी भी संकट को अति की हद तक कल्प और महसूस सकता है और जब अस्तित्व पर ही बन आती है, तब ही कोई अपनी पूरी ताक़त लगाता है, अन्यथा तो दुख का रोना रोता है या पगुराता है। ऐसा व्यक्ति न तो संकट को ख़त्म कर पाता है, न उसका रोना या पगुराना दूसरों को प्रभावित करने में समर्थ होता है। जो अपनी पूरी ताक़त लगाता है, वह संकट को भले ही ख़त्म न कर पाए, मगर उसकी कोशिशें दूसरों को प्रभावित करने में समर्थ होती हैं। जिससे कि उस संकट के ख़त्म होने की संभावना बढ़ जाती है। जब कोई बाहरी घटना अथवा क्रिया-कलाप उसके अस्तित्व के लिए ही चुनौती बन जाता है, तब वह अपने सारे अनुभवों और शक्तियों को संयोजित करता है। शायद इस संयोजित रूप को ही रचना कहते हैं। तो बाहरी वह कौन-सी घटना अथवा क्रिया-कलाप हैं, जो तेजिन्दर के अस्तित्व के लिए ख़तरा बन जाते हैं। देखिये, “मुझे अपने भीतर एक तरह की आत्मग्लानि महसूस हुई। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि मुझे पश्चाताप करना चाहिए, सिर्फ़ अपने लिए नहीं, अपनी पूरी जाति के लिए। लेकिन मेरी जाति क्या थी? मुझे लगा कि मेरे अपने भीतर जितना भी मानवीय बोध बचा हुआ है, मुझे वह समेट लेना चाहिए ताकि इससे पहले कि उड़ीसा या बिहार या गुजरात से आने वाली आग की लपटें उस तक पहुँच सकें मैं जेम्स और सोज़ेलिन के साथ कहीं दूर चला जाऊँ।”(93-94) यह चिंता अतिरेकी है, जो तेजिन्दर को अपने सारे अनुभवों को इकट्ठा और संयोजित करने का कारण बनती है। यह चिंता ही अपने सवाल का जवाब भी देती है कि भागना मुमकिन नहीं, क्योंकि हर जगह यही मिलेगा। तो सामना करने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं। विकल्पहीनता ही सिरजन की जननी है। ऐसे में सामना जी जान से करना पड़ेगा। अनुभव ही किसी भी इनसान की पूँजी हैं। जिसके पास जितना ही ज़ियादा अनुभव है, वह उतना ही ज़ियादा धनी और मजबूत है। जो इस पूँजी को सही रूप से संयोजित करता है, वही बड़ा रचनाकार बनता है। तो तेजिन्दर अपने अनुभवों की पूँजी को संयोजित करते हैं अपने पूरे आवेग के साथ, जिससे निर्मित होता है, ‘काला पादरी’। एक युवा, सशक्त और प्रतिभाशाली चरित्र, जिसका संघर्ष भी प्रभावशाली है। मतलब कि दूसरों को आकर्षित करनेवाला है, जिससे उम्मीद बनती है कि और भी जेम्स खाखा विकसेंगे, जिससे यह संघर्ष ज़ियादा तीव्र और शक्तिशाली होगा। जिसमें जीत जेम्स खाखा की ही होगी। समस्या जहाँ की होती है, वहीं के लोग अपने ही तरीक़े से उसका निदान लाते हैं, बाहरी (पर) तो केवल उत्प्रेरक बनता है। उपन्यास के केन्द्र में शायद जेम्स खाखा इसीलिए है। बाहरी आदित्य तो उत्प्रेरक है। उत्प्रेरित करके बाहर निकल जाता है। किसी भूखे को रोटी देना और उसे रोटी के निर्माण के लिए उत्प्रेरित करना, दो अलग-अलग चीज़ें हैं। रोटी देकर उसे पशु (पालतू) भी बनाया जा सकता है और रोटी निर्माने में समर्थ भी। धर्म पालतू बनाता है, न कि रोटी निर्माने में समर्थ, क्योंकि वह उत्प्रेरित नहीं करता, बल्कि अवप्रेरित करता है। मतलब कि शासता है। जो धर्म निर्मानने में समर्थ बनाये, वही मानवीय है। तो किसी भूखे को रोटी देना इनसानी कर्म है, यह तभी मुमकिन है जब इन्सानियत धरी गयी हो, मगर, अगर रोटी अपने साध्य की पूर्ति के लिए दी जाती है, अपने अनुसार चलने के लिए दी जाती है, तो पशुता है। इस तरह अपने धर्म के अनुयायी बनाने में लगे सारे धर्म मानव विरोधी हैं, क्योंकि वे व्यक्ति की स्वतंत्रता, जो सृजनशीलता का कारक है, का हनन करती हैं। वे सृजनशीलता, जिससे कि इनसान ख़ुद सरसते हुए अन्यों को सरसाता है, के बीच लट्ठ लगाती हैं। इसाई मिशनरियों का आदिवासी क्षेत्र में जाने और उनकी मानवीय संवेदना को जगाने के मूल में स्वतंत्र करने की कामना नहीं है। “यह सच है सोज़ेलिन कि बरसों बरस से मार खाते खाते हम लोग अपने जीवन की संवेदना खो चुके थे। मिशनरीज़ ने पहली बार हमारे अंदर छिपे एक संवेदनशील मनुष्य को छूने की कोशिश की और फ़ॉर दैट वी आर सरटेनली इनडेबटेड टू दैम।”(109) अगर इतना करके छोड़ दिया जाता, तो मानव अपने अनुसार सिरजता। मगर नहीं, उन्हें तो अपनी इमेज (अपनी श्रेष्ठ इच्छाओं का चित्र, मतलब कि अपने ईश्वर का चित्र) रोपना था, “इनके पास ईश्वर का कोई इमेज नहीं था डियर, जिसकी ओर ये आस भरी निगाह के साथ देख सकें, जब हम यहाँ आया तो राजा भी अपना देवी को प्लांट कर रहा था। यू नो हाऊ टू प्लांट ए थाट, इट इज़ वैरी इम्पार्टेंट, हमने भी प्रभु यीशु की इमेज प्लाँट कर दी, इट वाज़ ए वार ऑफ़ इमेजेज़, जिसमें जीत हमारी हुई।”(44-45) जिसके लिए उपजाऊ ज़मीन चाहिए थी। तो उनके सारे क्रिया-कलाप ज़मीन को उपजाऊ बनाने के प्रयास हैं। मतलब कि आदिवासी लोग उनके लिए तो उपजाऊ माटी (ज़मीन) हैं। इसलिए केवल बीज छींट दो। प्रभु यीशु की इमेज प्लांट करने का तरीक़ा देखिये, “इसका बाप काम करते करते हमारे पास आता था तो हम उसको दूध खिलाता था और जीसस क्राइस्ट का फ़ोटो दिखाता था।... वह पूछता कि यह दूध कहाँ से आया तो हम बताते कि ये दूध प्रभु यीशु भेजा है तुम्हारे वास्ते, तो वह मान जाता।”(44) इस तरह “संवेदना को जगाना” ज़मीन को उपजाऊ बनाने के अर्थ का वाहक बन जाता है। माटी जब उपजाऊ बन जाती है, तब वह ख़ुद भी अपने वातावरण से अर्जित करती और उसे विरजती है, न कि किसी के द्वारा प्लांट किये जाने की बाट जोहती है। जेम्स खाखा, फ़ादर मैथ्यूज़ के विचार कि “इनके पास ईश्वर का कोई इमेज नहीं था।” से सहमत नहीं होता और कहता है, “क्या यह सच नहीं कि हमारी इमेजेज़ में पहाड़ थे, नदियाँ थीं, पेड़ थे, शेर थे, छीते थे, और राजा ने हमें बंधुआ बना दिया, फिज़िकली और इक्नॉमिकली एक्सप्लायट किया, लेकिन आपने क्या किया? यू रादर टेम्ड अस, आपने हमें पालतू बना दिया, हमारे लिए हिन्दू फ़ंडामेंटलिस्टों और आपमें अब कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं है। हमारी सारी इमेजेज़ छीन लीं आप लोगों ने।”(45) यह जेम्स खाखा के पूर्वजों की अपनी इमेज थी। मतलब कि उनकी श्रेष्ठ इच्छाओं (ईश्वरों) की तश्वीर थी। इस तरह फ़ादर का उपर्युक्त कथन झूठ साबित होता है। संवेदनशीलता की विशेषता बाहर के ज्यों का त्यों ग्रहण करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसे अपने अनुसार बनाकर प्रकट करने तक है। प्रतिभा संवेदनशीलता का ही अंग है। किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का प्रतिभाशाली होना लाज़िमी है। इसीलिए तो सर्जक संवेदनशील व्यक्ति ही हो सकता है। जेम्स खाखा सर्जक है। वह बाहर को ज्यों का त्यों को ग्रहण करके अपने अनुसार संयोजित करके प्रकट करता है, न कि ज्यों के अनुसार। इसीलिए तो जेम्स के माँ-बाप पालतू थे, जबकि जेम्स स्वतंत्र होने की जद्दोजहद करता है। उसका यही करना तो फ़ादर मैथ्यूज़ और बिशपस्वामी को नागवार लगता है। इसीलिए तो उसे दूर रोम भेजने की कोशिश होती है। यही दुख है जेम्स खाखा का, जिसे वह इस तरह बयान करता है, “लेकिन वी शैल सरटेनली नाट एलाऊ देम टू एक्सप्लायट अस, क्योंकि जो हमें एक तरह के शोषण से मुक्त कराता है। जब वह ख़ुद हमारा शोषण करने लगता है तो उसके अंदर का ‘सेस ऑफ़ गिल्ट’ भी ख़त्म हो जाता है।”(109) आदित्य जब जेम्स खाखा के गाँव से लौटता है तो जेम्स खाखा को उत्तेजित पाता है। आदित्य द्वारा इसका कारण पूछे जाने पर वह बतलाता है कि “फ़ादर मैथ्यूज़ से मैं जब भी मिलता हूँ, वे हमें हमारे बौनेपन की याद दिलाते हैं।”(46) ठीक ऐसा ही जीवन में भी होता है। जब कोई व्यक्ति किसी को मदद करने के बाद उसका बार-बार ज़िक्र करता है, तो वह व्यक्ति तो उसे स्वीकार लेता है, मगर उसकी संतान उसे नहीं स्वीकार पाती है, बल्कि जेम्स खाखा की तरह ही प्रतिक्रिया करती है। इसीलिए कहा जाता है कि किसी को मदद करने के बाद इसका ज़िक्र नहीं करना चाहिए। फ़ादर मैथ्यूज़ इसे न जानता हो, ऐसा नहीं हो सकता। वह तो जेम्स के मन पर अधिकार जमाने के लिए जानबूझकर ऐसा करता है। जेम्स अत्यंत संवेदनशील एवं प्रतिभाशाली व्यक्ति है और प्रतिभा किसी की अनुचर नहीं होती। वह अपना रास्ता ख़ुद बनाती है। प्रतिभा अगर क़ाबू में आ गयी तो समझो कि फ़तह। सत्ता इसीलिए प्रतिभाओं को लुभाकर अपना हित साधती है। प्रीस्ट हर कोई नहीं बन सकता। बाक़ायदे इसकी पढ़ाई होती है। परीक्षा होती है। एक प्रीस्ट बनने में पन्द्रह साल लग जाते हैं। मतलब कि प्रतिभाओं की गहन खोज की जाती है। प्रतिभावान ही प्रीस्ट बन सकता है। बिशपस्वामी ने जेम्स की प्रतिभा को पहचान लिया है, इसीलिए उसे चर्च के अनुकूल बनाने की कोशिश करता है। जब वह देखता है कि जेम्स यहाँ की सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं में डूबने लगा है तो उसे रोम भेजने का फ़ैसला सुनाता है, यह सोचकर कि उस अनभिज्ञ समाज से कोई नाता न होने के कारण जेम्स पूरी तरह चर्च के माहौल में सिमटकर (पगकर) तीन साल में पूरा का पूरा चर्च का हो जायेगा। सामान्य प्रीस्ट इस ख़बर पर ख़ुशी से नाचने लगता, मगर जेम्स चिंतित हो जाता है। तभी तो वह तीन साल को तीस साल की तरह व्यक्त करता है, “तीन साल जेम्स खाखा ने तीन साल को तीस साल की तरह खींचते हुए कहा।”(115) संवेदनशील और प्रतिभावान होने के कारण ही वह यह भी महसूस करता है कि “...फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि वह स्थिर नहीं है और न ही शांत। उसके मन के अंदर एक चीता है जो दौड़ता रहता है, एक तेज़ तर्रार चोंच और बड़े बड़े पंखों वाला पक्षी है जो आसमान में उड़ता रहता है। पर क्या यह पूरी तरह सच है? कई बार उसे यह भ्रम भी होता है कि क्या वह सचमुच चीते की तरह दौड़ रहा है या पक्षी की तरह उड़ रहा है या फिर उसकी डोर बिशपस्वामी के सधे हुए हाथों में है। इस तरह उसे रोम तक उड़ाया जा सकता है। रोम का अर्थ है–यूरोप यानी कि आधुनिक सभ्यता का सर्वाधिक भव्य रूप। मैं जेम्स खाखा एक ऐसे स्थान का निवासी जहाँ आज भी भूख के कारण लोग मृत्यु का शिकार हो रहे हैं। जहाँ आज भी अकाल है। क्या एक ऐसे समय में जब उसके गाँव के लोग भूखे मर रहे हैं अपना गाँव छोड़ कर ईश्वर की प्रार्थना सीखने के लिए रोम तक जाना एक तरह का पलायन नहीं है? क्या सचमुच बेगार प्रार्थना नहीं है जब उसे सबसे पहले इस बात पर शोध करना चाहिए कि अग्रवालों और मोटवानियों और अरोड़ाओं के गोदामों तक चावल पहुँचाने वाले टोप्पो और खाखा और मिंज और तिग्गो की यह हालत कैसे हो गयी कि वे भूख से मर रहे हैं? वह अपना गाँव छोड़ कर रोम जा रहा है उस समय जबकि उसके आसपास अदृश्य मकड़ियों का एक झुंड है जो कि लगातार भूख का एक जाला बुन रहा है और उसके गाँव के गाँव उस जाल में कसते हुए दिखायी दे रहे हैं।”(120) प्रीस्ट की ट्रेनिंग के दौरान ही वो जान जाता है कि शारीरिक ताक़तों से प्राप्त सत्ता स्थायी नहीं होती। स्थायी होने के लिए ही ये धर्म की मदद लेती है। धार्मिक सत्ता इसीलिए ज़ियादा ताक़तवर मानी जाती है। पहले राजा बेगार कराता था, अब मिशनरी बेगार कराती है, प्रार्थना की बेगार। क्या फ़र्क़ रहा? बाढ़, महामारी जैसी आपदाओं के समय आर एस एस जैसी ढेरों धार्मिक संस्थायें लोगों की मदद करती हैं। ये मदद वो मानवीय कर्म के तहत नहीं करतीं, अपना अनुयायी बनाने की कोशिश के तहत करती हैं। इसी तरह ये विपत्ति के मारे लोगों को मानसिक और वैचारिक रूप से ग़ुलाम बनाती हैं। जेम्स इसे जानता है और इसी से परेशान है। “माँ कहती हैं कि चूँकि चर्च ने तुम्हारे पिता और दादा को रोटी दी थी, काम दिया था और राजा की बेगार से मुक्ति दिलवायी थी, इसलिए तुम्हें अपना पूरा जीवन चर्च की सेवा में बिताना है। क्या यह एक तरह का बंधुआ विचार नहीं है।”(47) ये बंधुआ विचार ही है, इसलिए इसका विरोध होना चाहिए। ये ही घृणित है। ये प्रवृत्ति विश्व के सारे धर्मों में है, केवल ईसाई धर्म में ही नहीं। तेजिन्दर मानव और उसकी विकास प्रक्रिया को अच्छी तरह समझते हैं। इसीलिए तो ईसाई धर्म प्रतीक बन जाता है सारे धर्मों का और जेम्स खाखा प्रतीक बन जाता है विकसित होते पिछड़े समाज के लोगों का। इस लेख के प्रारम्भ में कहा गया है कि जेम्स और ‘मैं’ (आदित्य) एक ही व्यक्ति के मनोमंथन के जीवंत रूप हैं। दोनों एक-दूसरे के बिना जी ही नहीं सकते। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। आदित्य, जो बैंक का अधिकारी है, किस तरह उसे जीते-जागते इन्सान से निर्जीव बनाया जा रहा है। किस तरह व्यवस्था उसे अपने अनुसार बनने पर मजबूर कर रही है, जिसे वह इनकार देता है अपने अनुसार। देखिये बैंक मैनेजर का ये कथन, “देखो, मैं साफ़ साफ़ कह रहा हूँ, हमारे बैंक को यहाँ पर कारोबार करना है, राजनीति नहीं। हमें कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए कि शहर की बिज़नेस कम्यूनिटी हमारे किसी अफ़सर पर उंगली उठाये। शहर छोटा है और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी पहचान हमारे बैंक में होने की वजह से है। आई होप नाउ यू कैन अंडरस्टैंड।”(88) यहाँ बैंक भी प्रतीक बन जाता है अंग्रेज़ों का। व्यापारियों का। किस तरह एक व्यापारी सत्ताधीश बन जाता है। बैंक मैनेजर पेशेवर व्यापारी है, जबकि आदित्य अपने को पेशेवर व्यापारी बनने से बचाता है। वह इनसान होने की जद्दोजहद करता है। क्या किसी भी इनसान की पहचान उसके पेशे से होनी चाहिए? आज लोग पेशेवर हो रहे हैं, इसीलिए आदमीयत कम होती जा रही है। पेशेवर व्यक्ति स्वतंत्र नहीं होता, पेशा उसे परतंत्र बनाये रखता है। इस तरह वह व्यापक जन समुदाय से कट जाता है और एक दिन अपने आप को अकेला पाता है। पेशेवर लेखक भी स्वतंत्र लेखन नहीं कर पाता, उसे पेशे के अनुसार ही लिखना पड़ता है, अपने अनुसार नहीं। आदित्य बैंक मैनेजर को जवाब देता है कि “आई अंडरस्टैंड सर एंड आई ऑल्सो अंडरस्टैंड माइ पर्सनल रीलेशंस एज़ वैल ऑफ़िशियल।” (88) वो अपनी वैयक्तिकता बनाये रखने के लिए पेशे (बैंक) से जद्दोजहद करता है, तो जेम्स अपने पेशे (चर्च) से। चूँकि कथा जेम्स की कही जा रही है, इसीलिए फ़ादर मैथ्यू और बिशपस्वामी पेशेवर रूप में चित्रित हुए हैं। अगर यही कथा आदित्य को केन्द्र में रखकर लिखी जाती, तो मैनेजर पेशेवर रूप में चित्रित होता। तब आदित्य के संघर्ष को प्रमुखता मिलती। कुल मिलाकर यह उपन्यास मनुष्य होने की जद्दोजहद को प्रकट करता है। मतलब कि जो व्यक्ति जितना ही ज़ियादा मनुष्य बनने की कोशिश करेगा, उसे उतना ही ज़ियादा संघर्ष करना पड़ेगा। व्यक्ति की वैयक्तिकता ही ख़तरे में है, जिसके कारण सृजन-प्रक्रिया मंद पड़ गयी है। असंतुलित पेशेवरी प्रवृति ने व्यक्तिवादिता को बढ़ दिया है। व्यक्ति-स्वातंत्र्य का व्यक्तिवादिता से कोई रिश्ता नहीं। दोनों एक-दूसरे की विरोधी हैं। व्यक्ति-स्वातंत्र्य हमेशा समाज-स्वातंत्र्य के सापेक्ष होता है, जबकि व्यक्तिवादिता समाज-स्वातंत्र्य के निरपेक्ष होती है। इस प्रकार व्यक्ति और समाज द्वंद्वात्मक संयोजन करते हुए एक-दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश में एक-दूसरे को आगे बढ़ाने में मदद भी करते जाते हैं। उपन्यास का अंत सवाल करता है कि क्या जेम्स रोम जायेगा, अथवा क्या उसे रोम जाना चाहिए। क्या जेम्स पादरी बन पायेगा? अगर जायेगा और पादरी बनेगा, तो कैसा पादरी बनेगा। अब तक का उसका व्यक्तित्व तो यही बतलाता है कि वह रोम नहीं जायेगा और पादरी भी नहीं बनेगा। तो फिर वह क्या करेगा? उसका व्यक्तित्व क्या इसके योग्य नहीं है कि वह सामाजिक जीवन में लौटकर अपने समाज के लोगों को पालतू होने से बचाये! क्या वह अपने सपनों और विचारों को लागू करने की जद्दोजहद करेगा? “उसने सोज़ेलिन मिंज के माथे पर हाथ रख दिया और फिर पूछा–तुम मेरे साथ हो न? सोज़ेलिन ने सिर हिला कर स्वीकृति देते हुए आँखें बंद कर लीं। अब हम और बर्दाश्त नहीं करेंगे। न बेगार और न प्रार्थना।–उसने कहा। सोज़ेलिन चौंक गयी। प्रार्थना क्या बर्दाश्त भी की जाती है?–उसने पूछा। हाँ, कई बार बर्दाश्त करने का ही दूसरा नाम प्रार्थना कर दिया जाता है।–उसने जवाब दिया।” (110) जेम्स को यह सारा ज्ञान पादरी बनने की प्रक्रिया से गुज़रते हुए अपने अनुभव से मिला है। इसका मतलब है कि धर्म को जानना है, तो धर्म की प्रक्रियाओं से गुज़रना लाज़िमी है। किसी भी चीज़ को जानना हो तो उसके भीतर उतरना ज़रूरी है। इसमें डूबने का ख़तरा भी है, मगर इस ख़तरे को उठाये बिना कुछ नया और मूल्यवान लेकर बाहर आना मुमकिन नहीं। इस उपन्यास में यह ख़तरा उठाया गया है, तभी एक भयानक सच बाहर आ सका है। इस तरह यह पादरी की कथा नहीं, पादरी बनने की प्रक्रिया से गुज़रते एक काले व्यक्ति की कथा है, जिसके माध्यम से सारे धर्मों की असलियत खुलती है, न कि केवल इसाई धर्म की। लेखक अभी भी अपने भूतकालिक ‘मैं’ से दूर नहीं हो सका है, इसीलिए तो इस क्षेत्र में होती कुछ क्रियाओं से अचम्भित होता है। देखिये, “अचानक उसने अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाया। बड़ी मुश्किल के साथ मैं स्वयं को संभाल पाया था। निश्चित ही वह मेरे साथ मज़ाक़ नहीं कर रही थी। मैंने उसे पहली बार ही देखा था। ज़ाहिर है, उसने भी मुझे पहले नहीं देखा था। मैं जो कि बड़े नगरों में रहने वाला अपनी सोच विचार उत्तर आधुनिकता से भरा-पूरा समझने वाला एक शहरी, सरगुजा के एक भीतरी गाँव में बीस-बाईस वर्ष की एक लड़की के सामने खड़ा था, लगभग असहाय। उस युवती के चेहरे पर आत्मविश्वास था, साथ ही एक ऐसी शालीनता जो आपके मन के भीतर तक उतर जाती है। कुछ क्षण ठिठक कर मैंने भी अपना हाथ आगे बढ़ा दिया।”(39) “मैं सोच भी नहीं सकता था कि सरगुजा के एक छोटे से गाँव के अंदर फैले झोंपड़ों में एक झोंपड़ा ऐसा भी हो सकता है जहाँ बैठ कर पूरे देश के हालात की नब्ज़ पर हाथ रखा जा सकता है।”(104) मुझे लगता है कि अगर लेखक ने जेम्स की तरह आदित्य के संघर्ष को भी उतना ही महत्त्व दिया होता, तो यह उपन्यास और सघन, पारदर्शी तथा अधिक प्रभावशाली बन जाता। मतलब कि दोनों तरफ़ से एक ही सत्य साफ़-साफ़ नज़र आता, जबकि अभी तो केवल आदित्य की ओर से ही साफ़ दिखाई देता है। मतलब कि जेम्स के क्रिया-कलापों का ही देखना हो सकता है, आदित्य के क्रिया-कलापों का नहीं। अगर ऐसा होता तो पूरी तरह बैंक और धार्मिक संगठन एक-दूसरे के समान नज़र आते। मतलब कि यह साफ़ तौर पर दिखता कि धार्मिक संगठनों और बैंकों के क्रिया-कलाप में कोई मूलभूत फ़र्क़ नहीं है। दोनों का पेशा मुनाफ़ा कमाना है। दोनों इनसान की महेच्छा (ईश्-वर) की इमेज को उखाड़कर अपनी महेच्छा (ईश्-वर) की इमेज प्लांट करके उन्हें बंधुआ बनाते हैं। इस तरह यह उपन्यास आदिवासी जीवन की त्रासदी को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है। • श्रीराम त्रिपाठी, ए-67, तेजेन्द्रप्रकाश-1, खोडियारनगर, अहमदाबाद–382350, मोबाइल: 09427072772

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