रेहन पर रग्घू

रेहन पर रग्घू श्रीराम त्रिपाठी साहित्यकार अपने वातावरण, मतलब कि अपने समय की बात (वात) के आवरण को भेदते हुए अपनी बात का आवरण बुनता है। एक लेखक अपने दीर्घकालीन जीवन के वातावरण को किस तरह भेदते हुए एक नया वातावरण बुनता है, जानना हो तो ‘रेहन पर रग्घू’ पढ़ना चाहिए। काशीनाथ सिंह का लेखन उस साठोत्तर काल से शुरू हुआ, जिसे युवा आक्रोश और विद्रोह का काल कहा जाता है, परंतु इस उपन्यास में आक्रोश और विद्रोह का नामो-निशान तक नहीं है। इसका मतलब है कि काशीनाथ सिंह जीवन में युवा आक्रोश और विद्रोह की भूमिका को स्थायी नहीं, क्षणिक मानते हैं। वास्तविक जीवन तो टूटन-छीजन, समझौते आदि से निर्मित होता है। ज्ञानदत्त चौबे का जीवन आक्रोश और विद्रोह की ही परिणति है। इतिहास साक्षी है कि साठोत्तर कवियों ने या तो आत्महत्याएँ कीं, या आत्महत्या में नाकाम होने पर अपाहिज बनकर लोगों तथा “घर वालों की गालियाँ और दुत्कार” पायीं। “आज वही ज्ञानदत्त–बिना पैरों का ज्ञानदत्त–चौराहे पर पड़ा भीख माँगता है। मरने की ख्वाहिश ने उसे कहीं का न छोड़ा!” उसने मरने की कोशिश एक बार नहीं, दो-दो बार की थी, “जाने क्यों, उसमें जीवन से मोह पैदा हुआ और उठ कर भागने को हुआ कि घुटनों के पास से एक पैर खचाक्!” और दूसरी बार “उसने बैसाखी फेंक छलाँग लगाई और पानी में छपाक् कि बरोह पकड़ में आ गई।” इस प्रकार उसने अपने भोक्ता के अनुभव से जाना कि “जीवन के अनुभव से जीवन बड़ा है। जब जीवन ही नहीं, तो अनुभव किसके लिए।” ध्वनि है कि आक्रोश-विद्रोह की परिणति जीवन नहीं, बल्कि अपाहिज बनकर समाज पर बोझ होना है। रघुनाथ, जिसने “विनम्रता, मितभाषिता और मुसकान के साथ जीवन की यात्रा शुरू की थी।” वह जीवन को समर्पित है। अगर गौर से देखें तो पायेंगे कि वह होरी का ही विकसित रूप है। उसका जीवन न मारता है न मरता, न खेलता है न खेलाता, बल्कि लाड़ लड़ाता है। ऐसे लोग अपने लिए कम और दूसरों के लिए ज़ियादा जीते हैं। इस तरह ‘रेहन पर रग्घू’ बाहर से विस्तरते, मगर भीतर से संकुचते व्यक्तिवाद का प्रतिकार करता है। भोक्ता और द्रष्टा, श्रुति और दृष्टि का सुभग संयोजन होने के नाते यह उपन्यास अत्यंत रोचक, जीवंत और प्रभावशाली बन पड़ा है। साहित्य भी इनसान के ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में ही विकसित होता है। इसलिए आलोचना का दायित्व बनता है कि वह उस ऐतिहासिक प्रक्रिया के अंतर्गत ही किसी रचना की व्याख्या और मूल्यांकन करे। भाषा का दाय में मिलने का मतलब है, इतिहास का दाय में मिलना। शब्दों के अर्थ का बदलना इतिहास के बदलाव का सूचक है। साहित्य के बिना इतिहास और इतिहास के बिना साहित्य मुमकिन नहीं। साहित्य में इतिहास और इतिहास में साहित्य इसीलिए मिलता है। साहित्य और इतिहास सिर और पैर की तरह जीवन के दो छोर हैं। इसे समझने के लिए यहाँ साहित्य शब्द का ध्वनि-विग्रह करते हैं। ध्यान रहे कि हिन्दी शब्द के अंत में कोई न कोई स्वर जरूर रहता है। किसी अन्य स्वर के अभाव में अ हमेशा मौजूद रहता है। इस प्रकार साहित्य का विग्रह हुआ–स्आह्इत्इअ। अब अंतिम अ को वहीं स्थिर करके क्रमशः दायें से बाँये चलते हैं, तो इत्इह्आस्अ हो जाता है, जिसकी संधि से इतिहास शब्द बन जाता है। इस प्रकार साहित्य का उलटा इतिहास और इतिहास का उलटा साहित्य है। साहित्य में अवचेतन के रूप में केवल सर्जक का ‘आत्म’ ही नहीं, परमात्म भी, मतलब कि मानव इतिहास भी आता है। इस तरह आलोचक को साहित्य में मानव के साथ-साथ उसके इतिहास की भी खोज करनी होती है। ऐसा करने पर ही वह पाठक के साथ-साथ सर्जक की सर्जना में भी मददगार साबित होता है। मुक्तिबोध ने शायद इसीलिए साहित्य के नेतृत्व का भार सर्जक को नहीं, आलोचक को सौंपा था। • ‘रेहन पर रग्घू’ की संरचना अन्य उपन्यासों जैसी होने पर भी उनसे अलग है। दूसरे अध्याय से लेकर अंतिम अध्याय तक तो यह अन्य उपन्यासों की तरह है, परंतु अंतिम अध्याय से पहले का पूरा अध्याय उपन्यास के पहले अध्याय के रूप में सामने आता है, सिर्फ़ पहले वाक्य में हेर-फेर के साथ। अंतिम अध्याय का पहला वाक्य, “कभी नहीं भूलेगी जनवरी की वह शाम!” पहले अध्याय में “जनवरी की वह शाम कभी नहीं भूलेगी!” के रूप में उपन्यास की टेक बन गया है। गद्य में टेक का यह नया प्रयोग पाठक में कुतूहल पैदा करता है। टेक का मतलब सहारा (थुन्हीं) ही नहीं, ज़िद भी होता है। इस तरह यह कथा की ज़िद भी है और थुन्हीं भी है, जिस पर पूरी कथा टिकी है। सभी चीज़ों का ओर-छोर होता है। हर चीज अपने ओर-छोर से जुड़ी होती है। इस प्रकार जीवन का ओर अगर रघुनाथ है, तो छोर ज्ञानदत्त है। एक-दूसरे के विरोधी होने के बावजूद दोनों, मतलब कि रघुनाथ और ज्ञानदत्त अपने-अपने जीवन से एक ही सार को अर्जित करते हैं कि “जीवन के अनुभव से जीवन बड़ा है। जब जीवन ही नहीं, तो अनुभव किसके लिए।” विरोधी जीवन के बावजूद प्राप्ति तो एक ही सार की। “कभी नहीं भूलेगी जनवरी की वह शाम!” पाठक को उत्कंठित करने के साथ-साथ उसकी सारी चेतना को अपने में केंद्रीभूत कर लेता है। ‘कभी नहीं भूलेगी’ से पता चलता है कि यह घटना बहुत पुरानी नहीं है। कथा का आवेग इतना घनीभूत है कि सर्जक उसे ज़ियादा समय तक रोक नहीं पाता। तभी तो लखी-लिखी होने के बावजूद वह कहने-सुनने लगता है। इस उत्तर आधुनिक युग में जहाँ कहना-सुनना होता है, वहाँ लखना-लिखना नहीं होता और जहाँ लखना-लिखना होता है, वहाँ कहना-सुनना नहीं होता। काशीनाथ सिंह की यही तो विशेषता है कि वे अपने लखे-लिखे में कहने-सुनने और कहे-सुने में लखने-लिखने लगते हैं। इस तरह वे पाठक को उसकी जातीय स्मृतियों से जोड़ते हैं। कैसी विडम्बना है कि हम बाहर जितना ही विस्तरे हैं, भीतर उतना ही संकुचित हुए हैं। भीतरी विस्तार का द्योतक स्मृति होती है, जिसका निरंतर ह्रास हो रहा है। इस तरह व्यक्ति हल्का और संकुचित होता हुआ बाहरी आकाश में विस्तर रहा है। मनुष्य के लिए धरती और आकाश, दोनों अधिकरण हैं। वह धरती पर और आकाश में ही नहीं, धरती में और आकाश पर भी रहता है। मतलब कि उसका जीवन न धरती के बिना चल सकता है, न आकाश के बिना। उसका जीवन धरती और आकाश की संयुक्ति में है। काशीनाथ सिंह जिस धरती पर रहते हैं, उसे लेकर ही आकाश में विस्तरते हैं और जिस आकाश में विस्तरते हैं, उसे लेकर ही धरती से जुड़ते हैं। इस प्रकार वे धरती में रहते हैं और धरती उनमें। वे धरती पर रहते हैं और धरती उन पर। ऐसा ही आकाश के साथ भी है। इस तरह वे बाहर-भीतर के द्वंद्व को संतुलित करने की कोशिश में ‘रेहन पर रग्घू’ रच देते हैं। गहने बिना का विस्तरना वास्तविक न होकर आभासी होता है। रघुनाथ के जीवन का विस्तार अत्यंत गहन होने के कारण कुतूहलपूर्ण आकर्षण पैदा करता है। इसे और स्पष्ट करना मुश्किल लगता है, इसलिए मुक्तिबोध से उधार लेकर कहें, तो ‘समझ में आ न सकता हो/कि जैसे बात का आधार/लेकिन बात गहरी हो।’ यहाँ तो बात गहरी ही नहीं है, बल्कि गहनी हुई भी है। • तो चलें, अपनी जातीय स्मृति में। अपने यहाँ तो कथा शाम को ही कही-सुनी जाती थी। दिनभर जो कुछ विशेष जिए-किए अथवा कहे-सुने होते थे, उसी को सिलसिलेवार क़िस्से के रूप में कहते-सुनते थे। तो ‘रेहन पर रग्घू’ उपन्यास के कलेवर में क़िस्सा-कहानी ही है। ठंढ के दिनों में खा-पीकर लोग अलाव के चारों ओर बैठकर अपने दिनभर की दास्तान कहते-सुनते थे। जनवरी, भीषण ठंढ के अलावा वर्ष का पहला महीना भी है। वैसे भी सामान्य जन को हर वर्तमान भूतकाल की बनिस्बत अधिक कठिन लगता है। इससे तो यही लगता है कि कथा जिस शाम सुनाई जा रही है, उसे लोग सबसे ज़ियादा ठंढा बता रहे हैं। अलाव के द्वारा वातावरणीय ठंढ को कम और मानवीय ऊष्मा को अधिक बचाया जाता था। आज जहाँ देखो वहाँ मानवीय ठंढ का शोर है, परंतु उसके निदान की कोई कोशिश नहीं। सभी अपनी ठंढ से बचने की कोशिश में ख़ुद में सिमटते-संकुचते जा रहे हैं। सभी की ठंढ दूर हो, इसके लिए अलाव जलाने जैसा कोई उपाय नहीं कर रहे। ऐसे में “कभी नहीं भूलेगी जनवरी की वह शाम।” द्वारा लेखक हमें वर्तमानकालिक तत्काल से अपनी भूतकालिक देखी-भोगी वातावरणीय ठंढ में ले जाता है। ध्यान रहे कि मनुष्य को तत्कालीन समस्या के निदान का मार्ग भूतकाल से ही मिलता है। लोगों की निष्क्रिय चिंता कि हर साल मानवीय ऊष्मा कम होती जा रही है, को धक्का देता है यह वाक्य। उस शाम तो भीषण ठंढ के साथ-साथ भयंकर आँधी-पानी भी था। ऐसे में, जहाँ घर में दुबककर ख़ुद को महफ़ूज़ रखना चाहिए, वहाँ यह इकहत्तर वर्षीय रघुनाथ उससे मिलने निकल पड़ता है। वह रघुनाथ, जिसे दिमाग़ पर बहुत ज़ोर देने पर याद आता है कि साठ बासठ साल पहले ऐसे किसी मौसम और बारिश और हवा से पाला पड़ा था। मतलब कि उस समय तो वह केवल पाँच साल का था और उसके पास बचाव का कोई उपाय भी न था, परंतु जनवरी की उस शाम तो वह अपने घर में था। एकदम महफ़ूज़ और सुरक्षित। “हर सुखी और सफल आदमी की तरह रघुनाथ ने भी अपने जीने, आगे बढ़ने और ऊँचाइयाँ छूने के कुछ नुस्खे ईजाद कर लिए थे! सच पूछिए तो उन्होंने ईजाद नहीं किए थे, उनकी प्रकृति में ही थे, बस वे समझ गए थे और उन्हें अपने नित्य व्यवहार का अंग बना लिया था।” उनके नुस्खे थे–विनम्रता, मुसकान और सहमति। “और इसे संयोग ही कहिए कि वे कभी असफल नहीं रहे! इसी संयोग को दूसरे ‘किस्मत’ कहा करते थे! और इस पर विश्वास कर लिया था रघुनाथ ने भी!” ऐसे व्यक्ति का यह सोचना कि “...हादसा न हो तो जिन्दगी क्या?” हमारी उत्सुकता को तीव्रतर करता है। रघुनाथ का यह निष्कर्ष स्वानुभव से अर्जित है। अब तक तो सुनी-सुनाई बातों के अनुसार बच-बच के जीते रहे। बारिश में भींगे, लू के थपेड़े खाए, जेठ के घाम में झुलसे, अंजोरिया रात में मटरग़श्ती किए, ठंड में ठिठुर कर दाँत किटकिटाए कितने दिन हो गए? मतलब कि प्रकृति और उसके क्रिया-कलापों से निरंतर दूर होते गए। सहचरी प्रकृति को दुश्चरी मान लिए। कुल मिलाकर यह कि उन्होंने अब तक भ्रम की ही ज़िन्दगी जी। “इधर एक अर्से से रघुनाथ को लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब वे नहीं रहेंगे और यह धरती रह जाएगी! वे चले जाएँगे और इस धरती का वैभव, इसका ऐश्वर्य, इसका सौन्दर्य- ये बादल, ये धूप, ये पेड़ पौधे, ये फसलें, ये नदी नाले, कछार, जंगल पहाड़ और यह सारा कुछ यहीं छूट जाएगा!” “उन्हें लग रहा था कि बहुत दिन नहीं बचे हैं उनके जाने में! मुमकिन है वह दिन कल ही हो, जब उनके लिए सूरज ही न उगे।” पूरा जीवन भ्रम में ही गँवा दिया। छूछे के छूछे रह गए। छछिया भर छाछ भी न मिली। वह तो सार के आग्रही थे, परंतु ज़िन्दगी अहीर की छोहरियों की तरह छछिया भर छाछ की लालच दे नचवाती रही, परंतु अंत में नट गयी। “लेकिन एक मन और था रघुनाथ का जो उन्हें धिक्कारे जा रहा था- कल तक कहाँ था यह प्यार? धरती से प्यार की यह ललक? यह तड़प? कल भी यही धरती थी। ये ही बादल, आसमान, तारे, सूरज चाँद थे! नदी, झरने, सागर, जंगल, पहाड़ थे। ये ही गली, मकान, चौबारे थे! कहाँ थी यह तड़प? फुर्सत थी इन्हें देखने की? आज जब मृत्यु बिल्ली की तरह दबे पाँव कमरे में आ रही है तो बाहर जिन्दगी बुलाती हुई सुनाई पड़ रही है?” “सच सच बताओ रघुनाथ, तुम्हें जो मिला है उसके बारे में कभी सोचा था? कभी सोचा था कि एक छोटे से गाँव से लेकर अमेरिका तक फैल जाओगे? चौके में पीढ़ा पर बैठ कर रोटी प्याज नमक खाने वाले तुम अशोक बिहार में बैठ कर लंच और डिनर करोगे?” इस तरह जितना हो सके उतना अपने विस्तरे को बटोरने (संकोचने) में जुट जाते हैं रघुनाथ और निकल पड़ते हैं आँधी-बारिश के बीच, यह सोचे बिना कि उन्हें झेल पाएँगे भी कि नहीं। वे आत्महत्या करने नहीं निकले। वे निकले थे आत्मजीवन के लिए। “निकले थे बूँदों के लिए, ओले के लिए, हवा के लिए।” परंतु पाने के पहले ही अचेत होकर गिर पड़ते हैं। मतलब कि बूँदों, ओलों और हवा का भी पूरा अनुभव नहीं कर पाये। चूँकि उन्हीं के प्रभाव से अचेत हुए थे, इसका मतलब है कि कुछ अनुभव तो पाये ही, जिससे “उन्होंने नतीजा निकाला कि जीवन के अनुभव से जीवन बड़ा है। जब जीवन ही नहीं, तो अनुभव किसके लिए।” जीवन में कोई भी अनुभव पूरा नहीं होता। सारे अनुभव गुणात्मक और मात्रात्मक, दोनों रूपों में अधूरे ही होते हैं। मतलब कि न केवल छछिया भर होते हैं, बल्कि छाछ होते हैं। रचनाकार की यह ऊपरी दयनीयता भीतर शक्ति से इतनी घनीभूत है कि हमारे पत्थर हृदय को पिघलाकर संचरित कर देती है। हमें लगता है कि जब छछिया भर छाछ में इतनी शक्ति है, तो मक्खन में कितनी शक्ति होगी। इस तरह वह मक्खन की ओर अग्रसरित हो जाता है। इस उपन्यास में कहीं भी नहीं लगता कि लेखक ने इसे अपने एकांत में लिखा है। हमेशा यही लगता है कि वह हमारे सामने बैठा हुआ बोलते-बतियाते हुए लिख रहा है, जिसमें हमारा बोलना-बतियाना भी शामिल है। इससे तो यही लगता है कि काशीनाथ सिंह के लिए लेखन भी एक प्रकार का लाड़ लड़ाना ही है। याद है न कि काशीनाथ सिंह ने धूमिल के संदर्भ में लिखा है कि वे कविता का रियाज करते थे। रियाज शब्द कुश्ती के अखाड़े का है। इसी तरह लड़ाना भी कुश्ती के अखाड़े से ही जुड़ा है। जीवन भी तो कुश्ती ही है। कुल मिलाकर यह कि यह उपन्यास हमें व्यक्ति से समष्टि और व्यक्तिवाद से समाजवाद की ओर अग्रसरित करता है। • उपन्यास का पहला वाक्य है, “कभी नहीं भूलेगी जनवरी की वह शाम” और दूसरे खंड के ग्यारहवें अध्याय का पहला वाक्य है, “जनवरी की वह शाम कभी नहीं भूलेगी!” इसके बाद दोनों अध्याय समान हैं। इस प्रकार उपन्यास की कथन भंगिमा ‘कभी नहीं भूलेगी जनवरी की वह शाम!’... ‘जनवरी की वह शाम कभी नहीं भूलेगी!...’ में बदल जाती है। दो ‘कभी नहीं भूलेगी’ के बीच में ‘जनवरी की वह शाम’ और उसके बीच हाथ-पाँव मारते रघुनाथ। “कभी नहीं भूलेगी जनवरी की वह शाम!” यह एक वाक्य होने के साथ ही पैराग्राफ़ भी है। इसका आश्चर्यबोधक होना भावोत्कटता के साथ-साथ गहन चिन्ता और चिन्तना को भी दर्शाता है। विसार के दो अर्थ हैं– भूलना और विशेष रूप से सारना। जब हम किसी घटना के सार से संतुष्ट हो जाते हैं, तब उसे याद रखने का कोई औचित्य नहीं रहता। अर्जित सार की असंतुष्टि ही कहने की प्रेरणा बनती है कि ‘कभी नहीं भूलेगी जनवरी की वह शाम!’ इसका एक मतलब तो यह हुआ कि जनवरी की वह शाम बहुत जटिल और कठिन है। आश्चर्य में छिपा सवाल और लेखक के कठिन प्रयास की असफलता, पाठक को लेखक के प्रति संवेदित करके जनवरी की उस शाम को चुनौती बना देती है। यही है ‘... अतिरेकवादी पूर्णता/की ये व्यथाएँ बहुत प्यारी हैं’। जनवरी की वह शाम भूलती नहीं, सतत परेशान करती है। वह भुलाने के लिए ही पाठक के पास आया है। जनवरी, वर्ष के पहले महीने के साथ-साथ बर्फ़ीले मौसम का भी संकेतक है। नैरेटर उस शाम में इतना भल गया है कि लाख कोशिश के बावजूद उससे मुक्त नहीं हो पाता। अपने अर्जित सार से असंतोष का कारण भी यही है। इसलिए भी ‘कभी नहीं भूलेगी जनवरी की वह शाम।’ लेखक ने तो इसे केवल अवसरा है, पाठक अगर विसर ले, तो लेखक उस शाम से मुक्त हो जाए। कहाँ इकहत्तर साला रघुनाथ और कहाँ अत्यंत विषम वातावरण! देखिए तो, “शाम तो मौसम ने कर दिया था वरना थी दोपहर!” दोपहर जवानी का प्रतीक है। तो क्या इकहत्तर साला रघुनाथ जवान है, जिसे वातावरण ने बूढ़ा (शाम, चौथा पहर) कर दिया! यहाँ होरी का कथन याद आता है कि “मर्द तो साठे पर पाठा होता है।” जफ़र के लिए जीवन चार दिन का था, तो सूर के लिए चार पहर का। जफ़र के दो दिन आरज़ू में कट गए और दो इंतज़ार में। इस तरह रमना हुआ ही नहीं। जबकि सूर के ‘चार पहर बंसी बन भटक्यो साँझ परे घर आयो।’ में बीत गये। यहाँ साँझ, रात के पहले पहर का सूचक है। मतलब कि चार पहर तक बन-बन भटका और साँझ पड़ने पर घर लौटा। घर, यानी रघु, यानी लघु। रमने-विस्तरने के लिए बाहर निकले, दर-दर भटके, परंतु रमना-विस्तरना तो हुआ ही नहीं। आख़िर में थक-हार कर विस्तरने के लिए अपने उसी लघु में लौटे। काशीनाथ सिंह ने जिस वातावरण का चित्रण किया है, वह दिन के दो पहर को लीलने में समर्थ है। हमेशा सिर झुकाये रहनेवाले रघुनाथ का ऐसे विषम वातावरण से मिलने निकलना, आश्चर्यजनक नहीं, तो क्या है! “ऐसा मौसम और ऐसी बारिश और ऐसी हवा उन्होंने कब देखी थी? दिमाग पर जोर देने से याद आया- साठ बासठ साल पहले!” इसका मतलब है कि इन साठ बासठ सालों में उन्होंने अपने भीतर को कभी ही विस्तरा नहीं, केवल संकोचा था। अब तक जिया ही नहीं, बकौल मुक्तिबोध, “अब तक क्या किया/जीवन क्या जिया”, सिर्फ़ अनुकरण किया। अनुकरण में देखना कम और सुनना ही अधिक होता है। रघुनाथ देखने लगे, तो पाए कि उन्होंने तो ज़िन्दगी जी ही नहीं। देखिए कैसे उनकी जीवन-दृष्टि बदल गयी! “यह एक हादसा था और हादसा न हो तो जिन्दगी कैसी? और यह भी एक हादसा ही है कि बाहर ऐसा मौसम है और वे कमरे में हैं।” जिस रग्घू को रघुनाथ ने रेहन पर रख दिया था, वह रेहन से छूटने लगा है। तो क्या यह एक बूढ़े का बचपना है! “कितने दिन हो गये बारिश में भींगे? कितने दिन हो गये लू के थपेड़े खाए? कितने दिन हो गए जेठ के घाम में झुलसे? कितने दिन हो गए अंजोरिया रात में मटरग़श्ती किए? कितने दिन हो गए ठंड में ठिठुर कर दाँत किटकिटाए? क्या ये इसीलिए होते हैं कि हम इनसे बच के रहें? बच बचा के चलें? या इसलिए कि इन्हें भोगें, इन्हें जिएँ, इनसे दोस्ती करें, बतियाएँ, सिर माथे पर बिठाएँ? हम इनसे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे ये हमारे शत्रु हैं! क्यों कर रहे हैं ऐसा?” “इधर एक अर्से से रघुनाथ को लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब वे नहीं रहेंगे और यह धरती रह जाएगी!” ‘क्यों कर रहे हैं ऐसा?’ की संरचना पर ग़ौर फ़रमाएँ। यहाँ ‘क्यों’ का ज़ोर ‘कर रहे हैं’ क्रिया पर है। ऐसा ज़ोर बोलचाल में ही मुमकिन है, लेखन में नहीं। यहाँ भोक्ता बोल रहा है, द्रष्टा नहीं। रघुनाथ को पहले कभी ऐसा नहीं लगा था। असल में, रघुनाथ की एकलता उन्हें मृत्यु की ओर ढकेल रही थी। साठ बासठ साल से उन्होंने मौसम की भयंकरता को कभी देखा ही नहीं, केवल भोगा है। देखने के लिए तो उससे भिन्न होना पड़ता है। यह बोध रग्घू की रेहन से मुक्ति का परिचायक है। वातावरण की भयंकरता उन्हें अचेत ज़रूर कर देती है, परंतु मार नहीं पाती। “अचेत होकर गिरने से पहले उनके दिमाग़ में ज्ञानदत्त चौबे कौंधा- उनका मित्र! उसने दो बार आत्महत्या करने की कोशिश की...” मतलब कि क्षण भर के लिए उनके मन में भी मरने का ख़याल आया। इस तरह की ज़िंदगी से तो मर जाना ही अच्छा है। परंतु ज्ञानदत्त मरा नहीं था, बल्कि दोनों पैरों से हीन होकर घिसट रहा था। “आज वही ज्ञानदत्त- बिना पैरों का ज्ञानदत्त-चौराहे पर पड़ा भीख माँगता है। मरने की ख़्वाहिश ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा।” ज्ञानदत्त का अर्थ है, ज्ञान द्वारा दत्त। ज्ञानने से ही ज्ञात हुआ कि “वे मरने के लिए तो निकले नहीं थे? निकले थे बूँदों के लिए, ओले के लिए, हवा के लिए। उन्होंने नतीजा निकाला कि जीवन के अनुभव से जीवन बड़ा है। जब जीवन ही नहीं, तो अनुभव किसके लिए।” क्षणभर के लिए आयी इस मृत्यु की ख़्वाहिश पर फिर रग्घू की गहनता भारी पड़ी। मतलब कि रेहन से रग्घू छूट गया। इसके बाद रग्घू के रेहन पर रखने और रघुनाथ बनने की कथा समीर के बारे में सोनल की इस बातचीत तक चलती है कि– “पापा, समीर से कह रही हूँ कि इसी नगर में जब अपना घर है तो वहाँ क्यों है? ऊपर तो एक कमरा खाली ही पड़ा है! रघुनाथ ने कातर होकर हाथ जोड़े- जो करना हो करो, मुझे अकेला छोड़ दो! प्लीज!” इसके बाद “रघुनाथ ने बिना खाए पिए रात गुजारी। नींद ही नहीं आई। वे कमरे की बत्ती बुझा कर सोते थे, लेकिन आज जलती हुई छोड़ दी। एक बजे रात तक उनकी आँखों के आगे बापट का चेहरा घूमता रहा और कानों में उनके गाने–‘हाए हाए ये जलिम जमाना! लेकिन इसके बाद–इसी के बाद उनके दिल ने कान में ‘धक् धक्’ के बजाय ‘कत्ल कत्ल’ धड़कना शुरू कर दिया तो रोशनी का रंग पीला से लाल होने लगा। फिर तो वे जिधर नजरें घुमाते, उधर ही फावड़ा, कुल्हाड़ा, हँसिया, चाकू, कटार, र्इंट, पत्थर, तमंचा, उछलते कूदते ललकारते दिखाई पड़ने लगे। थोड़ी ही देर में बल्ब से रोशनी नहीं जैसे खून के फव्वारे छूटने लगे और चारो दीवारें लाल हो गर्इं! वे उठ कर बैठ गए और खुद से बुदबुदाए–‘इसी दुनिया में कभी हरा रंग भी होता था भाई, वह कहाँ गया?” यहाँ रघुनाथ और उस शाम से संबंधित सारे संदर्भ पूरे होते हैं। विश्लेषण के लिए ज़रूरी उपादानों की विरोधपूर्ण द्वंद्वात्मक संयुक्ति को अवसरना ही कथा है। इतना सुनाने के बाद लेखक का आवेग शांत होता है। इस कथा का विन्यास आरोही नहीं, अवरोही है। घनीभूत आवेग क्रमशः कम होता हुआ अब मानो सम् पर आता है। ऐसे में लेखक थोड़ी देर ठहरने के बाद कहता है कि “जनवरी की वह शाम कभी नहीं भूलेगी।” जनवरी की उस शाम की कथा पूरी होती है। हर शाम एक सुबह को जन्म देती है। इस शाम ने भी सुबह को जन्म दिया। ध्यान रहे कि जन्म की प्रक्रिया रात्रिधर्मी है। “वे जैसे बेहोशी में लग रहे थे–नींद में ज्यादा, जाग में कम।” मतलब कि अवचेतन से क्रमशः चेतना की ओर लौटने लगे थे। “उनके एक तलवे में समीर तेल रगड़ रहा था और दूसरे तलवे में सोनल! गरम तेल से अजवाइन की गंध आ रही थी।” ‘अजवाइन की गंध’ सोनल और समीर के संबंध की ओर भी इशारा करती है, जिसकी पुष्टि थोड़ी ही देर बाद “लेकिन उसकी नहीं सुनी समीर ने। उसने बैठी सोनल को लगभग अपनी गोद में उठाया और लिए दिए कमरे से बाहर हो गया!” अब एक सप्ताह बाद की सुबह का यह दृश्य देखिए, “गाड़ी में सोनल के बगल में बैठते हुए समीर ने हाथ हिलाया–‘बाय-बाय पापा, हैव ए गुड डे।’ जवाब में रघुनाथ ने भी हाथ हिलाया–लेटे-लेटे। कौन जाने, हाथ हिला या हिलाया।” यहाँ ‘हाथ हिला या हिलाया।’ पर ज़रा ध्यान दें। पहले तो लेखक ने फर्राटे से कह दिया कि ‘हाथ हिलाया–लेटे-लेटे।’ परंतु तत्काल उसको अपनी भूल का ख़याल आया। यह तो उसका आरोपण हुआ। हिला और हिलाया में बहुत फ़र्क़ है। हिला में उनकी शारीरिक दुर्बलता कारणभूत है और हिलाया में उनकी इच्छा। लिखने में ऐसी भूल का अवकाश नहीं होता। ऐसी भूल तो कहने में ही मुमकिन है। स्पष्टता की ज़रूरत कहने में पड़ती है, लिखने में नहीं। लिखने में सुधार का अवकाश होने के कारण इस प्रकार की स्पष्टता की ज़रूरत नहीं पड़ती। रघुनाथ का ‘गुड डे’ सामान्य न होकर विशेष है; मतलब कि ‘वेरी गुड डे’। “कालोनी हमेशा की तरह निर्जन और उदास अपने घरों में सिमटी थी! ऐसे ही में उनके दरवाजे पर एक बोलेरो जीप खड़ी हुई और उसमें से दो नौजवान बाहर आए! वे वही थे शायद जिनकी चर्चा की थी गाँव पर सनेही ने। अभी हाल में पिछले दिनों।” वे जबरन उनकी ज़मीन लिखाने आए थे। अगर नहीं लिखेंगे, तो गोली मार देंगे। ये रघुनाथ विनम्रता, मुसकान और सहमति को जीवन का नुस्खा मानने वाले रघुनाथ से अलग हैं। साठे पर पाठा हो चुके रघुनाथ हैं। पाठा का एक मतलब पढ़ा हुआ भी होता है। जीवन एक पाठ है। सठ से सोंठ बना है। अदरक से जब पानी सूख जाता है, तो सोंठ कहलाता है। अदरक की अपेक्षा सोंठ अधिक स्वास्थ्यवर्द्धक होती है। तो पानी के सूखने का मतलब संवेदना का सूखना है। मतलब कि शुष्क ज्ञान। गोपियों के ज्ञान की अपेक्षा उद्धव का ज्ञान शुष्क था। अपने-पराएपन से मुक्त ज्ञान ही शुष्क ज्ञान कहलाता है। रघुनाथ अपने-पराए से मुक्त होने के बाद भी शुष्क नहीं होते, तभी तो हत्यारों से भी लाड़ लड़ाते हैं। देखिए– “कितना दिया नरेश ने? अस्सी हजार? एक लाख? इससे ज्यादा कीमत तो नहीं है जमीन की?” पूछा रघुनाथ ने। “सिग्नेचर करते हो कि नहीं?” “वह तो कर देंगे लेकिन मैं दो लाख दिला दूँ तो?” x x x “लेकिन मैं उसे मारने के लिए नहीं कहूँगा! काम वह करो जिसमें खतरा न हो, रकम हो, लज्जत हो। जितनी मामूली रकम के लिए दौड़े हुए आए हो उतने की तो पेशाब करता है मेरा एक बेटा!” “इसीलिए इतना बास मार रहे हो! उसी में नहाते हो क्या?” x x x “मुझे ले चलो! अगवा करो मुझे और फिरौती माँगो दो लाख!” “कौन देगा तुम्हारे जैसे सड़े गले बुड्ढे का दो लाख?” x x x “रघुनाथ ने क्षण भर सोचा–तो भी चिन्ता नहीं। तुम्हारी ‘पकड़’ इतनी गई गुजरी नहीं। इतना है मेरे पास कि खुद को छुड़ा लूँ!” इस तरह रघुनाथ ख़ुद ही ख़ुद को अगवा करवाते हैं। अपने-पराएपन से मुक्त होते ही रघुनाथ अपने असली रूप में नज़र आते हैं। अपने-पराए की भावना व्यक्ति को ह्रस्वती-ह्रासती है। उससे मुक्त होते ही व्यक्ति दीर्घ होकर हर्षने लगता है। रघुनाथ का हर्ष तो देखते ही बनता है, “रघुनाथ जब छड़ी के सहारे बाहर आए तब उनका चेहरा बन्दरटोपी के अन्दर था और रजाई लड़के के कंधे पर! वे आगे आगे, दोनों अपहर्ता लड़के पीछे पीछे–जैसे वे बेटों के साथ मगन मन तीरथ पर जा रहे हों।” यहाँ अपहर्ता और बेटों कोई अंतर नहीं रह गया है। दोनों एकरूप हो गये हैं। • जन्म और मृत्यु के बीच का आवन-जावन खेल और लड़ाई के बीच का भी आवन-जावन है। काशीनाथ सिंह ने खेल और लड़ाई जैसे विरुद्धों की एकता को लाड़ लड़ाई बना दिया है। ‘रेहन पर रग्घू’ इसी लाड़ लड़ाई का परिणाम भी है और आईना भी, जिसमें लाड़ लड़ाई ही प्रत्यक्ष होता है। खेल और लड़ाई के विविध दाँव-पेंचों का द्वंद्वात्मक संयोजन है ‘रेहन पर रग्घू’, जो ऊपर से तो ‘रघुनाथ गाथा’ लगता है, परंतु भीतर-भीतर लाड़ लड़ाई है। रग्घू का जिक्र तक न होने के बावजूद उपन्यास का नाम ‘रेहन पर रग्घू’, कुतूहल और आश्चर्य पैदा करता है। हमें इस अदृष्ट को ही देखना है, जिसकी आवाज़ पूरे उपन्यास में गूँजती है। मतलब कि आवाज़ के उद्गम तक पहुँचना है। रघुनाथ का अपने वातावरण से लाड़ लड़ाने की बजाय सिर झुकाकर अनुसरना ही रग्घू का रेहन पर होना है। रघुनाथ तो हमेशा वातावरण के अधीन रहकर ख़ुद को सुरक्षित रखता है। देखिए, “हर सुखी और सफल आदमी की तरह रघुनाथ ने भी अपने जीने, आगे बढ़ने और ऊँचाइयाँ छूने के कुछ नुस्खे ईजाद कर लिए थे! सच पूछिए तो उन्होंने ईजाद नहीं किए थे, उनकी प्रकृति में ही थे, बस वे समझ गए थे और उन्हें अपने नित्य व्यवहार का अंग बना लिया था।” उनके नुस्खे थे–विनम्रता, मुसकान और सहमति। “और इसे संयोग ही कहिए कि वे कभी असफल नहीं रहे! इसी संयोग को दूसरे ‘किस्मत’ कहा करते थे! और इस पर विश्वास कर लिया था रघुनाथ ने भी!” ये सभी वाक्य आश्चर्यबोधक होने के साथ व्यंग्य भी हैं। जिसे ‘संयोग ही कहिए’ कहा गया है, वह असल में विनम्रता, सहमति (मितभाषिता) और मुसकान का त्रिगुणात्मक संयोग है। फिर असफल कैसे रहते! दूसरे लोग इसकी तात्त्विक विवेचना में न पड़कर ‘किस्मत’ कहते हैं। इससे रघुनाथ को दर्द होना चाहिए, परंतु ऐसा नहीं होता, वे सहमति के नुस्खे का प्रयोग करके सुखी हो जाते हैं। इस तरह उन्होंने अपने स्व (रग्घू) को रेहन पर रखकर सुख और सफलता की प्राप्ति की है। नैरेटर का आश्चर्य प्रश्नवाची है, जो एक ओर तो रघुनाथ पर व्यंग्य सूचित करता है, तो दूसरी ओर पाठक को सचेत भी करता है। अपने स्व को रेहन पर रखकर भला कोई सुखी हुआ है? चूँकि रघुनाथ ने अपने रग्घू को मारा नहीं, रेहन पर रखा है, इसीलिए उनका राम नाम सत्त नहीं हुआ। राम नाम सत्त इसलिए है कि अंतत: वह अपने मान ‘मार’ को प्रमाणित करके ही दम लेता है। ऐसे राम को कोई अन्य नहीं, राम ही मारता है। इस राम से अलग एक दूसरा राम भी है, जो रमता है, केवल रमता है। मनुष्य ने अपनी रमत से मार को निकाल दिया, अन्यथा रमत में भी मरना, मारना और ज़िन्दा होना होता था। ज़िन्दा होने के लिए विरोधी को मारना पड़ता था, तभी तो राम ने शम्बूक को मारकर ब्राह्मण-पुत्र को ज़िन्दा किया। इस तरह शम्बूक रमता है और राम मारता। वाल्मीकि कहीं शम्बूक की ही विकसिति तो नहीं? क्योंकि वे न रमते हैं, न मारते; बल्कि हर किसी से लाड़ लड़ाते हैं। तभी तो ख़ुद को मारनेवाले की पत्नी और संतान को न केवल रक्षते-पालते हैं, बल्कि लाड़ लड़ाने की सीख देते हैं। इस प्रकार मनुष्य का लक्ष्य मरना-मारना नहीं, लाड़ लड़ाना है। तुलसी ने अपनी ‘रघुनाथ गाथा’ को ‘रामचरितमानस’ नाम दिया, तो काशीनाथ सिंह ने ‘रेहन पर रग्घू’। यहाँ मेरे मन में एक सवाल कुलबुलाता है कि राम को दिलीपनाथ, अजनाथ अथवा दशरथनाथ न कहकर रघुनाथ क्यों कहा जाता है? विचारने पर दिखता है कि दिलीप ने अपने राज्य का विस्तार न करके अपनी सम्पत्ति को लुटाया। अज का राज्य तो एक पत्नी तक ही सीमित रहा, जबकि दशरथ ने ख़ुद का तीन पत्नियों तक विस्तार किया। इस वंश में एक रघु ही नज़र आता है, जिसने दूसरों को मारकर अपने राज्य का ख़ूब विस्तार किया। इस तरह कह सकते हैं कि अपने पूर्वज रग्घू का अनुसरण करने के कारण ही राम को रघुनाथ कहा गया। इस तरह ‘रेहन पर रग्घू’ उस ‘रघुनाथ की गाथा’ है, जिसका राज्य अमेरिका तक विस्तृत हो गया, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। यह रघुनाथ न मरता-मारता है, न रमता, न लाड़ लड़ाता; बल्कि सिर झुका लेता है। मारना अगर वैदिक है, तो मरना जैनी। इन दोनों अतियों का द्वंद्वात्मक संयोजन ही बौद्धिक है, जिसे यहाँ लाड़ लड़ाना कहा गया है। ‘सिर झुका लेना’ बौद्धिक वृत्ति नहीं, वणिक वृत्ति है। अपने स्व को गिरवी रखे बिना वणिक वृत्ति मुमकिन नहीं। कैसी विडंबना है कि मार-मारकर अपना राज्य बढ़ाने वाले रघु का वंशज सिर झुका कर अपना राज्य अमेरिका तक विस्तार कर लेने के बावजूद अपनी पत्नी और बेटी-बेटों तक भी नहीं विस्तार पाता। अगर सचमुच का विस्तार किया होता, तो बेटे-बेटी उसका अनुसरण करते, न कि बाज़ार (वातावरण) का। वे बाहर से तो अमेरिका तक विस्तृत हुए हैं, परंतु भीतर तो रघुनाथ से रग्घू और वह भी स्वतंत्र नहीं, गिरवी होकर संकुचित हुए हैं। काशीनाथ सिंह अपनी ‘रघुनाथ गाथा’ का नाम ‘रेहन पर रग्घू’ देते हैं। उपन्यास में तो कहीं रग्घू है नहीं, फिर रेहन पर कैसे हुआ! काशीनाथ सिंह कहीं ‘गप्प’ तो नहीं मार रहे। द्विवेदी जी के शिष्य जो ठहरे। द्विवेदी जी की रचनाएँ जटिल मुनि के बिना कभी सम्पन्न नहीं हुर्इं। तो काशीनाथ सिंह भी कहीं अपने मौन से रग्घू को जटिल तो नहीं बना रहे! मौन की जटिलता को कौन नहीं जानता! रग्घू की ज़मीन रेहन पर हो जाने से रग्घू रूपी फ़सल कैसे उगती! उस पर तो रघुनाथ ही उग सकता था। रग्घू और रघुनाथ एक-दूसरे के विरोधी होते हुए भी एक-दूसरे को संयोजित करते हैं। रग्घू को रेहन पर रखकर रघुनाथ वातावरण का अनुसरण करता है, तो बाह्य रूप से सुखी और सफल दिखता है, परंतु भीतर से तो दुखी और असफल ही रहता है। उसके भीतर दुखी रग्घू का ही वास है। वातावरण ने न उसे लघु बनने दिया, न गुरु, बल्कि लघु-गुरु के मध्य स्थापित करके उसे मध्यवर्गीय बना गया। लघु रूपधर्मी है, जबकि गुरु गुणधर्मी। लघु रूप में गुरु गुण के समावेश को मुमकिन बनाने वाला लाघव ही है। लघु रग्घू ने क्या अपने लाघव से गुरु को गहना नहीं? भयानक मौसम और अपहर्ताओं के साथ उसका व्यवहार उसकी गुरु गहनता को ही प्रकट करता है। लघु अपने लाघव से गुरु बनता है। श्रोता-दर्शक तो लघु के लाघव से आकर्षित होते हैं। इस तरह गुरुत्व गुरु की नहीं, लाघव की विशेषता है। ‘रामायण’ के रघुनाथ ने ख़ुद को गहना नहीं, गौरवा था, तभी तो विडंबना का शिकार हुए, परंतु यह लघु रग्घू गुरु गहन है। इस प्रकार ‘रेहन पर रग्घू’ राम नाम के ‘मरम’ को उद्घाटित करता है। यह दुबला-पतला लघु उपन्यास अपने लाघव से ‘रामायण’ और ‘रामचरितमानस’ जैसे गुरु का संस्कार करता है। हिन्दी पुलिंग में आइन और गुजराती में आयण लगा देने से पुलिंग स्त्रीलिंग बन जाता है। इस तरह रामाइन या रामायण का एक ही अर्थ हुआ–राम की पत्नी, अर्थात सीता। जिस तरह पंडित की पत्नी पंडिताइन अथवा पंडितायण। ग़ौरतलब है कि साहित्य कभी मारता नहीं, वह तो मार, मतलब कि अपने दुश्मन से भी लाड़-लड़ाता जीवन की संयोजना करता है। तुलसीदास को ‘रामायण’ मार की कथा लगी, तभी तो लिखा कि “उलटा नाम जपत जग जाना। बालमीकि भये ब्रह्म समाना।।” तुलसी ने वाल्मीकि को उलटकर राम की कथा लिख दी, क्योंकि मार का उलटा राम है। अब ज़रा रघु पर विचार करें। ल का र में और र का ल में रूपांतर जग-ज़ाहिर है। इस तरह रघु का लघु और लघु का रघु हुआ। लघु ही अपने लाघव से गुरु बनता है। ध्यान रहे कि लाघव लघु का गुण है, गुरु का नहीं। आकर्षित करने की क्षमता लाघव में होती है। छोटे बच्चों की गुरुता पर कौन नहीं लुभाता! वस्तुत: वह उसके लाघव का परिणाम होती है। इस प्रकार रघुनाथ, मूलत: लघुनाथ है। वह जिसे गुरु समझ बैठा था, वह तो उसका भ्रम था। लघु रघु ने हमेशा ख़ुद को गुरु माना, सो लाघवहीन हो गया। मतलब कि आकर्षणहीन हो गया। लघु रघु के बिना रघुनाथ छूछा है। मतलब कि सारहीन है। काशीनाथ सिंह के रघुनाथ ने अपने लघु रग्घू को रेहन पर रख दिया था। रघुनाथ, जो मृत्यु से लाड़ लड़ाता दिखता है, वस्तुत: रेहन से छूट चुका रग्घू है। यही है लघु की गुरुता। यही है सुख और सूख का द्वंद्वात्मक संयोजन। यह हर्ष रग्घू के रेहन से छूटने का परिणाम है। इसके बाद तो केवल एक अध्याय है, जिसमें रग्घू के लाघव का गुरु प्रदर्शन है। उसका मौत से लाड़ लड़ाना हमारी जिजीविषा को गुरु करने में समर्थ है। इस अध्याय में रघुनाथ की चेतना लौटती है, तो पाते हैं कि सोनल और समीर एक-दूसरे के अत्यंत निकट हैं। ऐसे में वे ख़ुद को अचेत ही बनाये रखते हैं। मतलब कि सोनल के सम्बंध से मुक्ति का मार्ग पा जाते हैं। दूसरे दिन सबेरे दो लड़के एक कागज़ पर सिग्नेचर कराने आते हैं। अगर रघुनाथ सिग्नेचर नहीं करेंगे, तो वे उन्हें गोली मार देंगे। • लेखक के कभी न भूलने के मूल में घटना ही नहीं, उसके घटक भी हैं, जो विसार के परिणाम हैं। सत्तर वर्षीय रघुनाथ का व्यक्तित्व ऐसा तो था नहीं, जैसा उसने उस शाम कर दिखाया। परिचय का पहला ही वाक्य रघुनाथ पर गहन व्यंग्य है, क्योंकि उसमें पैराग्राफ़ का गहन विस्तार समाहित है। “पहाड़पुर में रघुनाथ एक ही थे।” “हर सुखी आदमी की तरह रघुनाथ ने भी अपने जीने, आगे बढ़ने और ऊँचाइयाँ छूने के कुछ नुस्खे ईजाद कर लिए थे! सच पूछिए तो उन्होंने ईजाद नहीं किए थे, इनकी प्रकृति में ही थे, बस वे समझ गए थे और उन्हें नित्य व्यवहार का अंग बना लिया था।” “वे पतले और लम्बे थे इसलिए थोड़ा झुक कर चलते थे। कहीं आते-जाते समय, किसी से मिलते जुलते बोलते बतियाते समय थोड़ा झुके रहते थे। पहली बार उन्होंने अपने संदर्भ में किसी दूसरे से बात करते समय प्रिंसिपल साहब के मुँह से ‘विनम्रता’ शब्द सुना। ऐसा उनकी प्रशंसा में कहा गया था। जिस झुके रहने पर वे शर्म महसूस करते थे, वही उनकी खूबी है–यह नया बोध हुआ।” अर्थात और झुकने लगने। अपने अनुसार न बनकर दूसरों के अनुसार बनना ही एक ओर रग्घू का रेहन पर रखा जाना है, तो दूसरी ओर रघुनाथ बनना भी है। “इसमें उन्होंने आगे चल कर दो खूबियाँ और जोड़ दीं–मुसकान और सहमति। कोई कुछ कहे, वे मुसकराते रहते थे और समर्थन में सिर हिलाते रहते थे। यह तभी सम्भव है जब आप अपनी तरफ से कम से कम बोलें।” “इस तरह रघुनाथ ने विनम्रता, मितभाषिता और मुसकान के साथ जीवन की यात्रा शुरू की थी।” “और इसे संयोग ही कहिए कि वे कभी असफल नहीं रहे! इसी संयोग को दूसरे ‘किस्मत’ कहा करते थे! और इस पर विश्वास कर लिया था रघुनाथ ने भी!” ‘इसे संयोग ही कहिए’ भी व्यंग्य ही है, क्योंकि रघुनाथ ने जिन खूबियों के साथ जीवन की यात्रा शुरू की, वे तो सफलता की कुंजी के रूप में पहले से ही स्थापित हैं। ‘नमक का दारोग़ा’ के बंसीधर तो सफलता की कुंजी से अनजान थे, परंतु रघुनाथ ने तो सोच-समझ कर सफलता की कुंजी हासिल करके जीवन की यात्रा शुरू की थी। ऐसे में असफल कैसे होते! इस तरह रघुनाथ समय की धारा के अनुरूप चलते हुए सफल होते रहे। “इस तरह एक बेटी, दो बेटों, शीला और रघुनाथ–सब मिलाकर पाँच जनों का परिवार। छोटा परिवार, सुखी परिवार! परिवार सुखी रहा हो या न रहा हो–रघुनाथ सुखी नहीं थे।” जो चाहा वह पाया, फिर भी सुखी नहीं! हाँ, जो कुछ भी पाया, अपने रग्घू को रेहन पर रखकर ही पाया। अपने जी का तो कुछ किया ही नहीं। अपने जी का करते तो सुखी होते और जीते। “उनकी सारी शक्ति और सारी बुद्धि और सारी पूँजी उन्हें ही सँवारने में लगी रही! उन्होंने चाहा–सरला पढ़ लिख कर नौकरी करे। सरला पढ़ लिख कर नौकरी करने लगी। उन्होंने चाहा–संजय साफ्टवेयर इंजीनियर बने। संजय साफ्टवेयर इंजीनियर ही नहीं बना, अमेरिका पहुँच गया! उन्होंने चाहा–मैनेजर समधी बनें! संजय ने यह नहीं चाहा! उसने वह किया जो उसने चाहा!” रघुनाथ का दुख यहीं से शुरू होकर भयानक से भयानक होता हुआ ‘जनवरी की वह शाम कभी नहीं भूलेगी!’ पर विरमित होता है। भीतर की उथल-पुथल ही भयंकर वातावरण के रूप में प्रकट होती है। ऐसे भयंकर वातावरण से लाड़ लड़ाने तो रग्घू ही निकल सकता है, रघुनाथ नहीं। रघुनाथ ने तो कभी सोचा भी नहीं था कि आख़िर में वह अकेला रह जाएगा। गुरु रघुनाथ अमेरिका तक विस्तृत होने के बावजूद आख़िर में अपने रग्घू के ही पास आता है, जिसे उसने रेहन पर रख दिया था। तो क्या यह ‘जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी, पुनि जहाज पर आवै’ है? हाँ के बावजूद भी ना और ना के बावजूद भी हाँ। हाँ, इसलिए कि आना-जाना दैनिक प्रक्रिया है और ना इसलिए कि इकहत्तर वर्षीय बूढ़े का मारक वातावरण के सामने सिर झुकाने की बजाय लाड़ लड़ाना, अत्यंत आकर्षक है! यह इकहत्तर वर्षीय बूढ़े के रग्घू का लाघव है, जो हमें आकर्षित करता है। इसका मतलब हुआ कि गुरुता के भ्रम से मुक्त होकर रघुनाथ अब रग्घू बन गया है। नैरेटर ने अपहर्ताओं को बेटों से उत्प्रेक्षित किया है, “जैसे वे बेटों के साथ...”। ऐसा लघु के लाघव से ही मुमकिन है, गुरु की गुरुता से नहीं। पूरे उपन्यास में गहन विषाद ही संचरित होता है, जो कभी विरमता नहीं। पाठक के जेहन में गूँजता है कि जीवन न तो सिर्फ़ लाड़ है न लड़ाई, बल्कि लाड़ लड़ाई है। काशीनाथ सिंह ने अपनी रघुनाथ गाथा तो लिख दी, अब उनके बेटों की रघुनाथ गाथा वे ख़ुद लिखेंगे। अमेरिका तक विस्तृत हुआ संजय अगर सम्-जय होता, तो अपने अजय (न जय) और बाज़ार का समन्वय करता, न कि बाज़ार के आगे सिर झुकाता। यही हाल राजू का भी है, जो ख़ुद को राजा समझता है। परंतु बेटी का क्या हाल है? क्या वह सुखी है? गाँव में एक मुहावरा प्रचलित है कि दोनों हाथ घी में और सिर कड़ाही में। हमारे यहाँ स्त्री को सिर माना गया है तथा पुरुष को हाथ। जो अपनी व्यथा को जितना सिरता है, उसकी व्यथा उतनी ही रिसती है। व्यथा के रिस जाने के बाद सिर शून्य हो जाता है। ऐसे ही लोगों को प्राचीन काल में ऋषि-मुनि कहा जाता था। अपनी व्यथा को जो न केवल सिरते, बल्कि वकते भी हैं, वे ही कवि कहलाते हैं। सामान्य को तो सामान्य व्यथा का एहसास नहीं होता। कवि अपनी विशेष व्यथा के माध्यम से सामान्य जन को न केवल उनकी ही विशेष व्यथा का एहसास कराता है, बल्कि उपचार की कोशिश की प्रेरणा भी देता है। काशीनाथ सिंह ने अपनी विशेष व्यथा को वक कर अगली पीढ़ी को उसकी विशेष व्यथा का एहसास कराते हुए उपचार की कोशिश के लिए प्रेरित भी किया है। अब अगली पीढ़ी का दायित्व है कि वह कितना एहसास करती है, अथवा करती भी है या नहीं। वेद (सम्मान्य, स्थापित) को लउकना और लउके को ऐसे वदना कि दूसरों को भी वैसा ही लउके, यही है लोक-वेद का एक-दूसरे में रूपांतर। साहित्य इसीलिए लोक-वेद का संयोजन और सम्मिश्रण होता है। न केवल वेद, न केवल लोक, बल्कि लोक-वेद। कोई भी कृति इसी लोक-वेद के गुणन का ही परिणाम होती है। लेखक ने रघुनाथ के लिए हर जगह सम्मानवाची सर्वनाम का प्रयोग किया है। इसका मतलब है कि लेखक के मन में रघुनाथ के प्रति श्रद्धा है। श्रद्धा गहन श्रेष्ठता के प्रति उपजती है। इस तरह रघुनाथ के प्रति लेखक की गहन संवेदनात्मक श्रद्धा है। रघुनाथ का चरित्र मानव मात्र का प्रतीक है। ऐसे मनुष्य का, जो अपने युवा काल में दृष्ट को ही सत्य मान कर अदृष्ट पर ध्यान नहीं देता। जैसे-जैसे दृष्ट की कलई खुलती जाती है, वैसे-वैसे वह अदृष्ट को तरजीह देने लगता है, परंतु समय बीत जाने के कारण पछताने के अलावा उसके हाथ कुछ नहीं लगता। काशीनाथ सिंह ने पछतावे को ख़ारिज करके लाघव को अवसरा है। इकहत्तर साला होने का मतलब बूढ़ा अथवा शाम नहीं होता। मौसम ने दोपहर को शाम कर दिया, ऐसा मानकर अगर मौसम से ही लाड़ लड़ाया जाए, तो कैसा रहे! ऐसा करने पर क्या मौसम हमारे अनुकूल नहीं हो जाएगा! रघुनाथ का ‘मगन मन तीरथ’ जाना, इसी को सूचक लगता है। पूरे उपन्यास में भोक्ता और द्रष्टा का सुभग समन्वय हुआ है। द्रष्टा से भोक्ता की मात्रा ज़रा भी कम नहीं है। भोक्ता और द्रष्टा का एक-दूसरे में रूपांतर ही इस उपन्यास को द्वंद्वात्मक लयबद्धता के गुण से सम्पन्न करता है। इसकी भाषा में आई लयबद्धता के मूल में भोक्ता और चित्रात्मकता के मूल में द्रष्टा है। भोक्ता कब द्रष्टा बन जाता है और द्रष्टा कब भोक्ता, पता ही नहीं चलता। यह उपन्यास अत्यंत पारदर्शी है। लेखक ने अपने वर्तमान के अतीत और अतीत के वर्तमान को इस तरह गहना-विस्तरा है कि यह जीवित वर्तमान लगता है। दृष्ट अतीत के भीतर से प्रकट होता वर्तमान ख़ुद में लघु भविष्य को छिपाए है। • अब अखंडित ‘रेहन पर रग्घू’ को विखंडित भी कर लिया जाये। वैसे सही विखंडन तो वह है, जिसमें सारे अवयवों की छान-बीन के बाद उनकी संयोजना, मतलब कि संरचना को भी देखा-परखा जाए। इससे सर्जक बनने की गुंजाइश बनती है। परंतु आजकल तो केवल रचना के अवयवों पर ही विमर्श होता है। अखंडित रचना में उसकी उपयोगिता पर विचार नहीं किया जाता। न नमक स्वादिष्ट होता है न मिर्च, परंतु उचित मात्रा में सब्जी में पड़कर वह सब्ज़ी को स्वादिष्ट बना देता है। आजकल दलित विमर्श और स्त्री विमर्श का ज़ोर है। रघुनाथ की बिटिया उन्हीं के द्वारा पढ़ाए गए एक दलित विद्यार्थी से प्रेम करती है, परंतु उससे शादी नहीं करती, क्योंकि इसके लिए न तो उसका समाज इजाजत देता है, न ही दलित समाज। लड़के के पिता भी इस तरह की शादी से सहमत नहीं हैं। दलित विमर्शियों के अनुसार तो यह सर्जक की कमज़ोरी मानी जाएगी, परंतु साहित्यिक तौर पर यही उचित और प्रभावशाली है। साहित्य का काम प्रेरना है, न कि समाज के लक्ष्य को सिद्ध करना। अपने लक्ष्य की सिद्धि तो समाज को ही करनी है। इसी सिद्धि के लिए लेखक उसे प्रेरित करता है। वास्तविक जीवन में उचित और सही का पाते-पाते रह जाना ही पाठक को बेचैन करता है। यही बैचैनी प्रेरणा का काम करती है। इस प्रकार पाठक और सर्जक के बीच स्त्री-पुरुष का रिश्ता बनता है। सर्जक के स्त्री बन जाने से जैविक प्रक्रिया मुमकिन नहीं। इसी तरह स्त्री विमर्श को भी लिया जा सकता है। रघुनाथ की बिटिया आज़ाद होकर भी आज़ाद नहीं है। पुरुष के बिना उसका जीवन अधूरा है। वह चाहकर भी उस दलित से शादी नहीं कर पाती, जिस तरह उसके दोनों भाई अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ शादी कर लेते हैं। वहन-क्षमता जिसमें अधिक होती है, उसे ही सामाजिक दायित्वों को वहना होता है। पाठक के ज़ेहन में रघुनाथ के दोनों बेटे नहीं कौंधते, कौंधती है उनकी बिटिया, जिसका जीवन सद्धर नहीं, अद्धर है। सामाजिक दायित्वों का वहन करने में वही समर्थ है। पाठक का मन उसी के इर्द-गिर्द घूमता है। उसकी ज़िन्दगी हमें प्रश्नाकुल करती है। हम पाठकों को ही उसका जवाब ढूँढना है। ‘गोदान’ प्रेमचंद का ही नहीं, हिन्दी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है। उसमें दो प्रसंग ऐसे हैं, जिसमें दलित विमर्श और स्त्री विमर्श को स्थान मिला है। एक में सिलिया और मातादीन का प्रेम प्रसंग है, जिसमें सिलिया तो मातादीन को जी जान से चाहती है, परंतु मातादीन उपभोक्तावादी है। उसके लिए सिलिया काम करनेवाली और शारीरिक भूख मिटानेवाली के रूप में उपयोगी है। ऐसे में प्रेमचंद उसके भाइयों द्वारा उसे दलित बनाने के लिए उसके मुँह में हड्डी डलवाते हैं। 1936 में प्रेमचंद द्वारा ऐसा कर दिखाने के बावजूद क्या यह समाज में स्वीकृत हो गया? असल में प्रेमचंद अपने ग़ुस्से को क़ाबू में नहीं कर सके। सर्जक को अपने भावों पर क़ाबू रखकर चरित्रों के भावों को प्रकट करना होता है। इसी तरह राय साहब की बिटिया का अपने पति को हंटरों से मारना भी प्रेमचंद का ही ग़ुस्सा है, राय साहब की बिटिया का नहीं। ध्यान रहे कि सर्जक को एक विशेष चरित्र अथवा अनुभव को सामान्य बनाकर ही प्रस्तुत करना होता है। ऐसा न होने पर कृति चाहे जो बन जाए, मगर साहित्यिक कृति नहीं बन पाती। इस तरह काशीनाथ सिंह ने सामान्य चरित्रों के विशेषत्व को सामान्य बनाकर प्रस्तुत किया है, जो अपनी क्षमताओं के अनुरूप ही क्रिया-कलाप करते हैं, जिससे जीवंत और प्रभावशाली बन जाते हैं। कुल मिलाकर यह उपन्यास अपनी लघुता में गहन दीर्घता छिपाये है। यह गागर में सागर, बूँद में समुंद और नइया बिच नदिया डूबी जाय है। तभी तो ‘रेहन पर रग्घू’ अंतत: रग्घू पर रेहन हो जाता है। • ए-67, तेजेंद्रप्रकाश-1, खोड़ियारनगर, अहमदाबाद–382350 मोबाइल: 7069181001 & 9427072772

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जाल