कामरेड आर.बी. यादव
कैसे भी हो, उसे मैं अपना मित्र कहने की जुर्रत नहीं कर पा रहा। क्योंकि मैं ठहरा एक अदना-सा मास्टर और वह अनगिनत पटरियाँ बदलकर पहुँचा हुआ आदमी। आदमी से भी ऊँचा, जिसे देवता कहते हैं, वह। संयोग कहें या भाग्य कि उसके साथ ही पढ़ा था। साथ-साथ चाय पी थी। साथ-साथ पिक्चर देखी थी। दोस्त तो वह तब भी नहीं था।
अक्सर वह कहा करता– “सीनियर कभी भी दोस्त नहीं हो सकता। फ्रेंडशिप तो भैया, बराबरी में हुआ करती है।”
मुझसे तो वह पैदाइशी सीनियर था, साथ ही साहित्य के सम्पर्क में वह चड्डी पहनने के समय से ही आ गया था।
जब-तब वह कहा भी करता– “राजू, अभी तुम नौसिखुए हो। डू यू नो? मैं इस लाइन में सात साल से झक मार रहा हूँ। मेरी पहली कहानी तब छपी थी, जब मैं नौवीं में पढ़ता था। मैंने पढ़ा ही नहीं, समझा। तुम क्या जानो, मुक्तिबोध को धाँसू विद्वान भी नहीं समझ पाते। जानते हो मुक्तिबोध को? पढ़ना, जरूर पढ़ना। मगर पहले मार्क्सवादी समझ को बढ़ाओ।”
मैं कुछ बोलता इसके पहले वह फिर शुरू हो जाता– “और मार्क्स-एंगेल्स, लेनिन, कोडवोल, लूकाच...को बारहवीं करते-करते चाट गया था। देखो, अभी तुम्हें बहुत कुछ पढ़ना है। फर्स्ट रीड एण्ड ट्राय टू अण्डरस्टैंड। क्रान्ति क्या है? और कैसे आती है? जानना इतना आसान नहीं।”
वह जब भी शुरू होता, तूफान मेल की तरह छोटे-मोटे स्टेशनों पर नहीं रुकता। उसके सामने मेरा अस्तित्व महज श्रोता का था। लिहाजा, जब वह आ धमकता, मैं खुद को बचा न पाता। मुझे यह स्वीकारने में ज़रा भी संकोच नहीं कि कहीं-न-कहीं मैं उससे प्रभावित जरूर था। जहाँ उसकी लेक्चरबाजी से बोरियत महसूस करता, वहीं अंदर से कुछ कुलबुलाहट भी चालू हो जाती। जिसमें मेरे अध्ययन की बैलगाड़ी भी धीरे-धीरे स्पीड पकड़ने लगी। आज याद करता हूँ तो पाता हूँ कि मैं जिन्दगी और साहित्य दोनों में ठेठ नया था।
प्रिय पाठक, मैं यह बता देना चाहता हूँ कि आज भी मेरी अंग्रेजी कमजोर है। अतः आर.बी. के कथनों का या तो हिन्दी कर दिया है, या स्मृति में न रहने के कारण छूट गया है। जो शब्द, जो वाक्य मेरे मस्तिष्क में रह गए थे, उन्हें उसी रूप में यहाँ रख दिया है।
हाँ, तो वह पोलिटिकल साइंस का विद्यार्थी था और मैं हिन्दी का। हम दोनों एम.ए. कर रहे थे। दोनों के डिपार्टमेंट अलग होते हुए भी पास-पास थे। इसलिए वह रिसेस में आ धमकता और मुझे धर दबोचता। मेरा हाल वही था कि सहा भी न जाए और रहा भी न जाए। अक्सर हम साथ-साथ दिखते। लोग हमें एक अच्छा दोस्त समझते थे। आज जब इस बात को वर्षों गुजर गए हैं, मैं अभी भी यह तय नहीं कर पा रहा कि मैं उससे क्यों सम्बन्ध बनाए था। मेरी कोई मजबूरी थी या उसका आकर्षण था। ...शायद दोनों था। मेरी मजबूरी थी एक ऐसे साथी की, जो मेरे अकेलेपन को बाँट सके। साथ ही जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारी-बोध से पीड़ित था। दूसरे, वह भी मुझे शागिर्द बनाना चाहता था। यह भी सच है। हिन्दी उसके लिए कोई अहमियत न रखती थी। उसकी निगाह में हिन्दी का कोई भविष्य न था। हिन्दी ही क्या? अंग्रेजी के सिवाय हर भारतीय भाषा का भविष्य उसके अनुसार ‘अंधकारमय’ था। इसलिए उसकी नजर में मैं एक बेचारा था। दया का पात्र था।
वह कहा करता– “हिन्दी भी कोई विषय है? जब चाहो खेलते-कूदते पास कर लो। यदि लैंग्वेज और लिट्रेचर से रियली लगाव है तो इंग्लिश पढ़ो। हिन्दी में अभी तक कोई कायदे का राइटर हुआ है?”
वह हमेशा चैलेंजिंग काम का हिमायती था।
वह जातिप्रथा का कट्टर विरोधी था। जाति के नाम से ही वह उत्तेजित हो जाता। फिर तो रामशरण शर्मा, कौशाम्बी और न जाने कितने विद्वानों के नाम से न जाने कितने वाक्य बोल जाता। वह अपना नाम आर.बी. बताया करता। मगर, कागज पर तो आर.बी. यादव चलता था। मुझसे भी वह मेरे नाम से पुछल्ले को उखाड़ फेंकने को कहता।
मैं सकुचाते हुए कहता– “यार आर.बी.। अगर, मैं अपने पुछल्ले को हटा दूँ तो और भी गड़बड़ हो जाएगा। मैं कट्टर साम्प्रदायिक बन जाऊँगा। सच में, मेरा नाम भी कोई नाम है। जानते हो, मैंने यह नाम किससे पाया? हमारे गाँव के स्कूल में एक मास्टरजी थे, जो जाति से चमार थे। उन्हें सभी लोग मुंशीजी कहा करते थे। उन्होंने स्कूल में मेरे दाखिले के समय मेरा नया नामकरण कर दिया– श्रीराम त्रिपाठी। मैं जब भी अपने नाम को सुनता हूँ, मेरी आँखों में मुंशीजी तिर आते हैं। और सच बात तो यह है कि मैं अपने मुंशीजी को कभी भी भुलाना नहीं चाहता।”
आर.बी. मेरी इस कमजोरी की खिल्ली उड़ाता कहता– “राजू, तुम ब्राह्मण हो। तुम में जातिवादी भावना गहरे पैठ गई है। और पैठे भी क्यूँ नहीं? जब दूसरी जाति के बूढ़े लोग तक तुम्हें ‘पाँयलागी’ करते रहे होंगे, ऐसे वक्त तुम जमीन पर खुद को थोड़े ही पाते होगे। है न! कभी शर्म तो नहीं आई होगी? स्साले, इन बाभनों-ठाकुरों ने तो इस देश का बंटाढार कर दिया।
ऐसे वक्त मैं केवल चुप रहता क्योंकि आर.बी. की बातों में सचाई होती। चुप रहने से एक और लाभ था कि बोलते-बोलते आखिर आर.बी. खुद ही चुप हो जाता।
एक बार आर.बी. ने ही बतलाया था कि किस तरह मास्टर लोग स्कूल में नीची जाति के लड़कों के साथ बुरा सुलूक करते थे। भूल होने पर जहाँ बाभन-ठाकुरों के बच्चों को थप्पड़ से मारते थे, वहीं नीची जाति के बच्चों को लातों और चप्पलों से मारते थे। वह खुद भी इसी तरह मार खा चुका था। इतना ही नहीं, कई बार मास्टर लोगों ने उससे कहा था– “बुझरथा! तेरा काम पढ़ना नहीं है, रे। जाके रहर-ओहर की पलई काट। भँइस चरा। सब ही लोग पढ़ लेंगे, तो ई सब कौन करेगा?”
आर.बी. का पूरा नाम रामबुझारथ यादव था। मगर, कभी भी वह अपना पूरा नहीं बताता।
आर.बी. अपना गुरु एक हिन्दी के कवि को मानता था। मगर, सार्वजनिक रूप से नहीं। वह अपना गुरू खुद था। फिर भी अपनों के बीच उन कवि के ऋण को स्वीकार करता। क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले उसके अन्दर छिपे रचनाकार को पहचाना और प्रेरित किया लिखने को।
वह अक्सर कहा करता– “साहित्यकार किसी भाषा विशेष का नहीं होता। वह किसी समाज विशेष का भी नहीं होता। वह तो भाषा और समाज की सीमाओं से परे होता है। गोर्की ओनली रशिया का नहीं, पूरे वर्ल्ड का है। फ्रॉस्ट भले ही युनाइटेड स्टेट में जन्मा हो, मगर पूरा विश्व उसका अपना है। अपने प्रेमचंद को ही लो। वह केवल इंडिया के ही नहीं, वर्ल्ड के तमाम सर्वहारा की आवाज को बुलंद करता है। हकीकत में तो साहित्यकारों की अपनी एक अलग ही कास्ट होती है।”
यह सच है कि मार्क्सवादी लोग बड़े ही सरल, कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार होते हैं। वे भेद-भाव, ऊँच-नीच जैसी चीजों में विश्वास नहीं करते। इतना ही नहीं, इनका डटकर विरोध करते हैं। मुझे अच्छी तरह याद है कि आर.बी. में भी अब धीरे-धीरे परिवर्तन दिखने लगे थे। मैं सोचता कि जैसे-जैसे वह मार्क्सवाद को पचाता जा रहा है, वैसे-वैसे उसमें बदलाव आता जा रहा है। सफाचट चेहरे पर अब दाढ़ी-मूँछ ने जगह ले ली। दाढ़ी तो ऐसे लगती जैसे कुछ ऊबड़-खाबड़ बंजर पर उगी घास। बुशर्ट की जगह अब सस्ते खादी कुर्ते ने अथवा फुटपाथ से खरीदी जर्सी-टीशर्ट ने ले ली। जिसे वह अपने पॉलिस्टर पैण्ट के ऊपर पहनता। कंधे पर के थैले में कोई परिवर्तन न आया। अब वह सिगरेट भी पीने लगा था। आप जानते ही हैं कि जिन्दगी में ताजगी के अलावा सब कुछ प्राप्य है। इस पूँजीवादी व्यवस्था में अगर आप ताजगी के मरीज हैं तो आपको चाहिए कि आप बीड़ी-सिगरेट का सेवन करें।
जब सिगरेट के लिए उसके पास पैसे न होते, तब वह बीड़ी पीते और दलील देते पाया जाता– “मुक्तिबोध भी तो बीड़ी पिया करते थे।” वह ज्यादा-से-ज्यादा सरल और आडम्बरहीन दिखने के प्रयत्न में लगा था। इसलिए अपने शरीर के प्रति वह लापरवाह-सा रहने लगा था।
उसमें हुई यह तब्दीली रंग लाई। उसके क्लास के तकरीबन सभी विद्यार्थी उससे खौफ खाते और उसकी कद्र करते। वे सपने में भी न सोच सकते थे कि इतने सीधे-सादे और फुटपाथी लिबास का इन्सान धाराप्रवाह अंग्रेजी बोल सकता है। उनके लिए तो फर्राटेदार अंग्रेजी कोई अंग्रेज–वह भी दिनेश सूटिंग्स अथवा मैक्डोवैल के मॉडल जैसा–ही बोल सकता है। आर.बी. जब हिन्दी में बातें करता तो उसमें अंग्रेजी के कुछ शब्द अपनी जगह बना ही लेते। ऐसे समय वे शब्द अंगूठी में लगे हीरे-सा काम करते। और कभी-कभी तो अंग्रेजी में ही बोलने लगता, जिसमें अंग्रेज विद्वानों के तमाम कोटेशन्स होते।
फिर भी वह खुद ही रुक जाता और कहता– “सारी। मुझे खयाल ही नहीं रहा कि मैं अंग्रेजी में बोल रहा हूँ।”
विद्यार्थी आलम तो यही समझता था कि आर.बी. बहुत पढ़ता है। पढ़ने से ज्यादा तो समझता है। उनका भाग्य है कि वे आर.बी. जैसे के क्लासफेलो हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि आर.बी. जीनियस और मेच्योर स्टूडेन्ट था। मगर उसकी हरकतें मुझे शादी-ब्याह में होनेवाले उस जनवासे की याद दिलाती है, जिसमें दो पण्डितों में शास्त्रार्थ चलता है। श्लोक पर श्लोक दागे जाते हैं। बेहिचक और बेधड़क बोलने वाला, जिसकी बात जितनी ही कम समझ में आती है, सभा का महापण्डित साबित होता है। क्या कहा महत्त्वपूर्ण नहीं, महत्त्वपूर्ण है कैसे कहा गया?
आर.बी. ने अपनी अंग्रेजी और भारी-भरकम कोटेशनों से मुझे बख्शा था। शायद, उसे इस बात का डर था कि कहीं मैं बिदक न जाऊँ। मुझसे साफ-सुथरी हिन्दी में ही बात करता। इतना ही नहीं, कभी-कभी तो भोजपुरी पर उतर आता। उसकी बातों में जब-तब अंग्रेजी के शब्द आते, मगर जाने-समझे।
सचमुच, आर.बी. के साथ रहकर मैं बहुत सारी चीजों को समझने लगा। जिन्दगी की जटिलता में उतरने लगा। लीजिए, मैं कहाँ बहक गया। सुनाने बैठा था आर.बी. की कहानी और सुनाने लगा अपनी। शायद आर.बी. का प्रभाव है। खैर...
आइए, आर.बी. पर। आर.बी. को इस शिक्षा-पद्धति से बहुत शिकायत थी। यह तो किसी भी समझदार और जागरूक इन्सान को होगी। मगर आर.बी. की शिकायत अलग प्रकार की थी। उसके बी.ए. में कम अंक थे। नियमतः तो एम.ए. पालिटिक्स में उसका ऐडमिशन ही नहीं होना चाहिए था। लेकिन गुरुजी की कृपा से उसे ऐडमिशन रूपी फल मिल गया था। गुरूजी एक रचनाधर्मी संवेदनशील इन्सान के भविष्य को अंधकार में कैसे भटकने को छोड़ देते?
आर.बी. अक्सर कहते सुना जाता– “इस क्लर्क बनाऊ एजूकेशन से क्या लाभ? आई डोन्ट लाइक दिस टाइप ऑफ एजूकेशन। आई डोन्ट वान्ट...मैं तो पढ़ना ही नहीं चाहता था। यह तो कबीजी के कारण ऐडमिशन लेना पड़ा। इस व्यवस्था का टोटली बायकाट किया जाना चाहिए।”
और अपने ‘कबीजी’ यानी ‘गुरूजी’ के लिए आर.बी. क्लास अटेण्ड करता रहा।
आर.बी. के पिता मिल में नौकरी करते थे और अहमदाबाद महानगर के पिछवाड़े, यानी अमराईवाड़ी में रहते थे। एक छोटी, सँकरी और गंदी-सी चाली में। जिसमें एक कोठरी और एक ओसारी थी। जहाँ न तो कभी सूरज निकलता था, न चंदा अपनी चाँदनी फैलाता था। हाँ, मिलों के धुएँ जरूर आया करते थे, जो यहाँ के अँधेरे को और गाढ़ा कर जाते थे। अहमदाबाद में मिलों के बन्द होने का सिलसिला जब शुरू हुआ, तभी आर.बी. के पिता की मिल भी बन्द हो गई। मिलों का बन्द होना और शहर में साम्प्रदायिक दंगों का भड़कना लगभग साथ-साथ हुआ। दूसरे प्रदेशों के मजदूर ‘जान बची तो लाखों पाए’ को मन्त्र की तरह घोकते खेप-के-खेप अपने-अपने घरों को भागने लगे। आर.बी. के पितृ-प्रेम के आगे खुद को असहाय पाकर उसके पिता भी अपने गाँव गोरखपुर चले गए।
आर.बी. के पितृ-प्रेम के पीछे उसकी अपनी ‘प्लानिंग’ थी। वह बिना किसी चिन्ता-फिक्र के क्रान्ति को अंजाम देना चाहता था। इस मार्ग में पिता कहीं-न-कहीं बाधक ही थे। क्रान्ति-पथ में न जाने कितनी कठिनाइयाँ आती हैं। ऐसे में, पिता का यहाँ रहना उचित नहीं। एक बार तो मन में आया कि पत्नी को भी गाँव भेज दे। फिर, अकेला रहेगा? अकेले रहा जा सकता है, क्या! नहीं, नहीं। दिनभर की थकान को पत्नी ही तो पल में मिटा देती है। औरत के बिना पुरुष अधूरा है। उसे क्रान्ति नहीं लानी। एक वही है, जिसने अरेंज मैरेज के बावजूद पत्नी को प्रेम किया है।
पिता के रहते आर.बी. को यह पता नहीं था कि जिन्दगी की गाड़ी चलाने में जो तेल-पानी लगता है, उसके लिए पैसों की दरकार होती है। आर.बी. के पिता आर.बी. जैसा बेटा पाकर धन्य थे। वे आर.बी. की जब भी प्रशंसा सुनते खुद को हवा में तैरते पाते। पिछले जन्म का कोई पुन्न ही है कि रामबुझारथ जैसा बेटा पाए। लिहाजा, अपना पेट काटकर भी उसकी फरमाइश पूरी करते। जो भी है, इसी का है। अपने कौन और दूसरी औलाद है? जो भी हो। माँ चाहे बाप, मैं ही तो हूँ।...
उनकी नजर अपने रिश्तेदारों और परिचितों में जहाँ तक जाती, कहीं भी आर.बी. जितना पढ़ा और ज्ञानी कोई नजर नहीं आता। उसी ज्ञानी आर.बी. को अब पिता का गाँव भेजना गलत लगा। पिता की जगह पत्नी को ही भेजना चाहिए था।...भेजना तो चाहा था, मगर जाहिल औरत माने तब न। साली मत्थे पड़ गई। अब इसकी चिन्ता करूँ, पैसे की करूँ कि क्रान्ति की करूँ?
“भैया आर.बी.। पैसे की चंता की, तब तो हो चुकी क्रांति। और औरत की चिंता की ही नहीं जाती। वह तो हर सिचुएशन में अपने को ढाल लेती है। यही तो संघर्ष की घड़ी है। ऐसे में, खुद को सँभाल लिए तो किसी भी सिचुएशन का सामना कर सकोगे।” उसके मन ने कहा।
और आर.बी. संघर्ष के लिए खुद को तैयार करने में जुट पड़ा। मगर, पहले ही धचके में लड़खड़ाने लगा। पढ़ा-लिखा, मार्क्सवाद का ज्ञाता भला फैक्टरी में नौकरी करे? यह कैसे हो सकता है? क्या इसी के लिए उसने इतनी मेहनत की है? रात-रात भर आँखें फोड़ी हैं? इतना ही नहीं, फैक्टरियों में तो सरेआम शोषण होता है। जिसके खिलाफ वह जंग की तैयारी कर रहा है खुद ही उसका शिकार बन जाए? कह दे, आ बैल मुझे मार? नहीं, नहीं। वह भूख से समझौता कर सकता है, अपनी इच्छाओं का दमन कर सकता है, मगर सिद्धान्तों से समझौता कभी नहीं कर सकता।
दोस्तों के बहुत समझाने पर वह अंग्रेजी का ट्यूशन करने को राजी हो गया।
आर.बी. मास्टरों को पन्तूजी कहा करता था, क्योंकि वे बच्चों को लकीर-का-फकीर बनाते हैं। उनकी दुनिया को पुस्तकों की दुनिया में सिमटा देते हैं। पानीपत की लड़ाई कब और कहाँ हुई?...भारत के प्रथम और अन्तिम वायसराय कौन थे?...जैसे फिजूल के प्रश्नों में ही उलझा देते हैं और महत्त्वपूर्ण बातों को हवा में उड़ा देते हैं।
आर.बी. ट्यूशन तो कर रहा था, मगर मन मारकर। जाहिर है कि अभी भी वह इसे अच्छा काम नहीं मान रहा था। चाली के लोग उसका बहुत सम्मान करते थे और उससे सहमते थे। जिस किसी को भी उससे बात करने का मौका मिल जाता, वह अपने आपको धन्य समझता। इसीलिए लोग उससे बात करने का बहाना ढूँढते। जबकि आर.बी. उनसे हमेशा बचने की कोशिश करता। इसके लिए वह चाली में प्रवेशते ही अपने चेहरे को गम्भीरता के आवरण से ढँक लेता।
उसके बारे में अक्सर लोग बतियाते मिल जाते– “कितना मेहनती है बलिराम का बेटा। भाई बलिराम ने जरूर पिछले जनम में पुन्न किया था कि बुझारथ जैसा बेटा पाया। देखो न, पढ़ भी रहा है और अपना घर भी चला रहा है। देखना, बड़ा साहेब बनेगा एक दिन।”
“यादवों का वह किस्सा जानते हो कि नहीं? अरे, वही। गाँव के सारे लोग भड़भूज के यहाँ भूजा भुजाने जा रहे थे। कोई चावल लेके गया, तो कोई चना। कोई गेहूँ लेके गया, तो कोई मटर और मकई। उसी गाँव में एक यादवजी भी थे। उन्होंने सोचा कि सभी कुछ-न-कुछ भुजा रहे हैं, तो चलो मैं भी कुछ भुजा लूँ। और वो मट्ठा लेकर चल दिए।”
सभी हँसने लगते। खूब हँसते। तभी आवाज आती– “इसी से तो कहते हैं कि यादव भाई लोग साठ बरस में बालिग होते हैं।”
हँसी का एक और दौर चलता।
कथावाचक कहता– “भैया! यादवों के इस कलंक को बुझारथ धो देगा।”
अपना बुझारथ सुनते ही आर.बी. के तन-बदन में आग लग जाती। मन में आता कि उस आदमी को कालर पकड़कर घसीटे। जूतों-चप्पलों से उसका जी-भर आवभगत करे। “बहिन...मादर...मैं तेरा नौकर हूँ? स्साले, यह भी नहीं समझते कि एक इज्जतदार आदमी के साथ कैसे पेश आया जाता है। तुम्हारे बीच रहता हूँ, इसका मतलब यह समझते हो कि मेरे बराबर के हो?”
मगर, जब ‘बड़ा साहब बनने’ और ‘कलंक धोने’ की भविष्यवाणी सुनता, उसका गुस्सा न जाने कहाँ हवा हो जाता। उसकी गर्दन पहले से कुछ लम्बी हो जाती और उसका व्यवहार बयान करता– “जाओ, माफ किया।”
फिर तो वह चाली के लड़कों को इकट्ठाकर जोरदार भाषण झाड़ देता। दो-चार ऐसे सवाल फटकार देता, जिनके जवाब उन लड़कों को क्या उनके बापों को भी न आते। एक-एक कर सबको डाँटता और उन सवालों के जवाब इस तरह समझाता जैसे लड़कों को नहीं, उनके बापों को समझा रहा हो। अन्त में, मेहनत से पढ़ने का उपदेश गर्द की तरह झाड़कर उन्हें भगा देता।
ऐसा सुनने में आता है कि साहित्यकार लोग भुलक्कड़ होते हैं। आर.बी. में भी अब यह गुण विकसित होने लगा। दोस्तों से अब वह नियत समय से न मिल पाता और कभी-कभी तो एकदम से भूल जाता। उसे याद ही न रहता कि किसी से मिलने को कहा है। किसी का काम हाथ पर लिए है। इसीलिए अब ट्यूशन पर नागा भी होने लगा। हाँ, अब उसमें मिलनसारी और दिल खोलकर खर्च करने की प्रवृत्ति आ गई। वैसे तो वह पहले से ही खर्चवाह था। उसके पास पैसे हों, तो आप उससे कहीं भी खर्च करा सकते हैं। मगर, ध्यान रहे कि जब उसके पास पैसे नहीं होंगे, तो वह आपको बख्शेगा नहीं। आपको गिरवी रखने में भी वह हिचकिचाएगा नहीं। उसमें अपने और पराए का भेद-भाव न था। इसीलिए वह हर किसी की जेब को अपनी ही जेब समझता था।
साथियों से वह कहा करता– “दोस्तो! प्रगतिशील साहित्यकार की नियति है, गरीबी। प्रगतिशील साहित्यकार सम्पन्न हो ही नहीं सकता। उसे सदैव मनी क्राइसेस रहेगा। मीन्स, कड़का। सोसाइटी की फिक्र के आगे वह अपने और अपने परिवार पर कैसे ध्यान दे सकता है? प्रोग्रेसिव राइटर मस्ट बी अ पूअर मैन। इट्स रियालिटी।”
मैं समझ ही न पाता कि आर.बी. अपना खर्च पूरा कैसे करता है। ट्यूशन में नागा होने से उसके पास बहुत कम ट्यूशन रह गए थे। आखिर पता चल ही गया। आजकल आर.बी. की बैठक में दो-चार खाते-पीते घर के लड़के आ गए थे। ये लड़के ही उसकी कड़की के दिनों के साथी थे।
आर.बी. कहता– “ये लोग कोई मुझ पर उपकार नहीं कर रहे। आखिर ये पैसे अपन लोगों के ही हैं न। इनके बाप-दादाओं ने मजदूरों के पसीनों से ही तो अपनी तिजोरी भरी है।”
मैं शायद उन लड़कों से जलता था। ईर्ष्या करता था। क्योंकि उनके आ जाने से आर.बी. का मेरे साथ आना कम हो गया था। जो भी हो, मगर इस दौरान मैं खूब पढ़ने लगा था। जिससे मुझे अपना आत्मविश्वास बढ़ता-सा महसूस हो रहा था। आर.बी. की एक-एक क्रियाएँ अब अलग ही अर्थ देने लगी थीं।
पाठक बन्धु, याद करें। मैंने पहले ही बता दिया है कि मैं समझौतापरस्त इन्सान हूँ।
इसलिए आर.बी. अक्सर मुझे सुनाया करता– “ब्राह्मण, ठाकुर और बनिया कभी समाजवादी नहीं हो सकते। ये तो हमेशा से चूसते आए हैं। ये लोग जोंक हैं, जोंक। अब भला पूछो कि वह भैंस समाजवादी बनेगी कि उसकी खून चूसती जोंक।”
यहाँ यह भी बता देना जरूरी है कि मैं महज ब्राह्मण खानदान में जन्मा हूँ। मेरे ऐसे कोई कर्म नहीं कि ब्राह्मण होने का दम्भ पाल सकूँ। मैं दोनों जून अपना पेट भर लेता हूँ। मेरे पास कभी इतने पैसे आए ही नहीं कि मैं आर.बी. की मदद कर सकता। मेरी स्थिति का अंदाजा आप इतने भर से लगा सकते हैं कि मेरे खानदान और गाँव के लोग मुझे म्लेच्छ कहते हैं। आवारा और बदचलन मानते हैं। इसीलिए कोई मुझे सामाजिक त्योहारों-कार्यक्रमों में नहीं बुलाता। वैसे, अकेले-अकेले चुपके से जरूर आते हैं, यह सोचकर कि मैं उनके बच्चों के लिए कुछ कर दूँगा।
मैं समझ नहीं पाता कि आर.बी. में इतनी ताकत आती कहाँ से थी। वह एक पुरानी साइकिल से पूरे शहर का दौरा किया करता।
पाठक बन्धु, आप बैठे-बैठे बोर हो गए होंगे। जिस्म अकड़ गया होगा। अभी तक मैं आपके सामने आर.बी. को पेश कर रहा था। शायद, इसमें मेरी दृष्टि ने परिवर्तन भी कर दिया हो। आइए, अब खुद ही आर.बी. के पास चलें। इससे आर.बी. को भी कोई डिस्टर्ब नहीं होगा और आपका मन भी बहल जाएगा। क्योंकि इस समय वह अर्जेण्ट काम में बिजी है। वह खुद आपके सामने नहीं आ सकता।
देखिए, वह रहा आर.बी.। पहचान गए न। जिससे वह बातों में मशगूल है, उसका नाम है–कामिनी। उसका रूप, उसकी अदा, उसके नाम को चरितार्थ कर रहे हैं या नहीं। आजकल आर.बी. उसे मार्क्सवाद की घुट्टी पिला रहा है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को उदाहरणों से ही नहीं, वरन् प्रयोगों से समझा रहा है। वह अनुभव के जिस दौर से गुजर रहा है, महज उसे महसूसा जा सकता है। देख रहे हैं न। उसकी आँखों में उगे असंख्य रंगों को, जो पल-पल में बदलते जा रहे हैं। और शोख चंचल कामिनी जिस तरह मन्त्रमुग्ध-सी उसमें डूबती जा रही है।
आर.बी. ने कामिनी से साफ कह दिया है– “हमारे प्रेम की परिणति शादी नहीं होगी, कामिनी। हमारा प्रेम सिर्फ प्रेम ही रहेगा।”
और यह कामिनी के साथ जीवन की उच्चतम और पवित्रतम चीजों का आदान-प्रदान करने में लगा है। लोगों को जागरूक बनाने और प्रेरित करने के लिए आवश्यक है कि खुद ही पहल की जाए।
किसी भी प्रगतिशील कार्य के लिए रूढ़िवादियों और प्रतिक्रियावादियों का विरोध तो सहना ही पड़ता है। मगर वह हारेगा नहीं। जीते जी लड़ना नहीं छोड़ेगा। आज अकेला है। कल साथियों का मजमा लग जाएगा। कितनी कठिन है यह लड़ाई। अपनी पत्नी के साथ भी उसे लड़ना पड़ रहा है। पत्नी ठहरी एक सनातन नारी। वह अपने पति का विरोध तो नहीं कर सकती। परन्तु, यह कैसे बर्दाश्त कर ले कि उसके जीते जी उसके पति की जिन्दगी में कोई दूसरी औरत आए। पत्नी एक कमजोर औरत थी। वह भी अनपढ़-गँवार। जब-तब चण्डी का रूप धारण कर लेती। फिर तो आर.बी. को उसकी झाड़-फूँक करनी पड़ती।
वह उसे समझाता– “सहधर्मचारिणी का कर्तव्य है कि वह अपने पति के विकास में अवरोधक न बने।”
विवाह के बारे में वह कहा करता– “विवाह तो एक समझौता है। समझौता ही नहीं, एक-दूसरे को ठगना है। प्रेम का नाटक है। यह कैसी अजीब बात है कि विवाह की चिन्ता किसी और को होती है और विवाह किसी और का होता है। माँ-बाप की सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपनी संतानों का विवाह है। विवाह कर देने के बाद वे गंगा नहा लेते हैं। जिस सोसायटी की चिन्ता और जिम्मेदारी ओनली मैरेज हो, उस सोसायटी का फ्यूचर क्या? नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता। मैं सोसायटी को बता देना चाहता हूँ। हाँ, हाँ। आइ वान्ट टू प्रूव, एण्ड आइ विल प्रूव। मैं जो हूँ, यही हूँ।”
प्रगतिशील कार्यों में बाधक बनने वाली जाहिल पत्नी अब गाँव पहुँच चुकी है। अब वह बंधनमुक्त है। अपनी कल्पना की उड़ानों को अमल में लाने का यह सबसे बढ़िया वक्त है। मस्तिष्क को तरो-ताजा बनाए रखने में शराब बड़ी मददगार है। इससे नई-नई कल्पनाएँ प्रस्फुटित होती हैं। सच पूछा जाए तो प्रकृति प्रदत्त सभी चीजों का उपभोग करना चाहिए। प्रकृति ने सारी चीजें मनुष्य के उपभोग के लिए ही पैदा की हैं।
एम.ए. का रिजल्ट आ गया है। इस बार भी वह बड़ी मुश्किल से सेकेण्ड डिवीजन में पास हुआ है।
वह कहता फिरता है– “इस साल तो मैं इग्जाम में ही बैठने वाला न था। कबीजी के कारण बैठना पड़ा। फिर भी सिक्स्टी परसेंट मार्क्स तो मिलना ही चाहिए था। ऐसे इग्जाम को तो मैं लात मारता हूँ। यह व्यवस्था और न्याय! इम्पासिबल।”
मेरे फर्स्ट क्लास पास होने पर उसकी प्रतिक्रिया थी– “मैंने पहले ही कहा था न कि त्रिपठिया फर्स्ट क्लास पास होगा। मैं जानता हूँ। ऐसे लोग ही फर्स्ट पास हुआ करते हैं। देखना, बहुत जल्दी लेक्चरर-वोरर बन जाएगा।”
यह वही आर.बी. है, जो मेरे अध्यापकों को नमस्ते करने पर कहा करता– “हाथ जोड़ने से मार्क्स नहीं मिलते, मिस्टर त्रिपाठी। लिखने से मार्क्स मिलते हैं।”
एम.ए. करने के तीन-चार साल बाद अचानक आर.बी. से मुलाकात हो गई।
हाथ मिलाने के बाद उसने पूछा, “कैसे हो?”
“ठीक हूँ। अपनी सुनाओ।”
“अमा यार, दिखते ही नहीं आजकल? क्या बात है? इजराइल को कौन-सा हथियार सप्लाई कर रहे हो।”
मैं समझ गया कि वह मुझ पर आक्रमण कर रहा है। फिर भी मैंने इतना ही कहा– “यार, आदिवासियों को अभिजात बना रहा हूँ। जानते नहीं? पन्तूजी बन गया हूँ। आखिर तुम्हारी भविष्यवाणी सच ही हुई।”
“क्या!”
उसके चेहरे पर विस्मय और अवसाद का भाव उभरा। मगर उसके फैसले से पहले ही उसने बटोर लिया और इस तरह चहका जैसे परीक्षा में अव्वल आया हो। मैंने महसूस किया कि उसने अपने को खूब साध लिया है।
“तुम्हीं ने तो कहा था कि मैं जल्दी ही पन्तूजी बन जाऊँगा। बन गया। अच्छा, छोड़ो, अपनी सुनाओ। आजकल कर क्या रहे हो?”
“यार, तुम्हारे बाल बड़े ही अभिजात ढंग से पक रहे हैं। शीशे में कभी देखे हो? फिल्मों में रूढ़िवादी बाप के बाल भी इसी तरह कान के पास से पकते हैं।”
पहले तो मैंने समझा कि कहीं यह पगला तो नहीं गया है? मगर फिर खयाल आया कि यह आर.बी. है। इसकी जिस बात में रुचि नहीं होती, इसी तरह अपनी रौ में बहने का नाटक करता है।
इसीलिए मैंने दुबारा नहीं पूछा और समर्थन के लहजे में उस पर धावा बोल दिया– “यार, अभिजातों के बाल अभिजात तरीके से नहीं पकेंगे, तो क्या प्रगतिशीनों की तरह पकेंगे? चलो, यह अच्छा है कि जो मैं हूँ, वही नजर भी आ रहा हूँ। उनसे तो बेहतर हूँ जो होते तो कुछ और हैं मगर दिखते कुछ और। वैसे जहाँ तक मेरी अल्प बुद्धि की पैठ है, उसके अनुसार अभिजातों के बाल कम उम्र में पकते ही नहीं।”
“यार, वी.पी. ईमानदार और प्रतिबद्ध लीडर है। रियली वह वामपंथी विचारों का हिमायती है। वह मार्क्सवादी सिद्धांतों को भारत के परिप्रेक्ष्य में देख रहा है। तुम्हारा क्या खयाल है?”
...आर.बी. की बातों में कहीं कोई ताल-मेल न था। अपने पर हुए आक्रमण को वह कैसे झेल गया? मैं समझ ही न पाया। न कोई आक्रोश। न विरोध। क्या मैं उसी आर.बी. से मुखातिब हूँ जो कभी वी.पी. को सबसे बड़ा मक्कार नेता मानता था?
मैंने कहा– “समझा नहीं, यार।”
“देखो, वी.पी. जब पी.एम. बना, देश के सामने प्राब्लम-ही-प्राब्लम थी जिसे कांग्रेस ने पैदा किया था। जानते हो? आई मीन, वी.पी. की इमेज खराब होने के पीछे है जनता की झूठी आशा। वह वी.पी. से बहुत बड़े चेंज की आस लगा बैठी थी।”
मेरा मत जानने के लिए वह क्षणभर रुका और फिर शुरू हो गया– “अपेक्षा ही अपने आप में बेमानी है। फिर तो बड़े परिवर्तन की अपेक्षा की बात ही क्या करनी? हम अपने दुख के कारण खुद हैं। मार खाएँगे, खाते जाएँगे और फिर पीछे-पीछे हो लेंगे। वी.पी. के पास कोई जादुई छड़ी तो नहीं है कि घुमाया और प्राब्लम साल्व। मेन थिंग है कोशिश, जो किया वी.पी. ने।”
मैं समझ ही न पा रहा था कि वह वी.पी.की इतनी तरफदारी करने में क्यों लगा है? इसीलिए एक ओर तो मैं उसकी बातों की ओर कान लगाए था, दूसरी ओर उन कारणों का पता लगाने की कोशिश कर रहा था, जिसके कारण आर.बी. ऐसा कर रहा था।...पोलिटिकल साइंस! डिग्री! हो-न-हो अब वह अपनी शिक्षा का उपयोग करने लगा है।
“देखो, वी.पी. ने दूरदर्शन और आकाशवाणी की स्वायत्तता के लिए ‘प्रसारभारती’ बिल पेश किया। अब सोसायटी के कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए वर्षों से धूल खाती मंडल रिपोर्ट को लागू कर दिया। इससे देश में असमानता कम होगी जिससे हेल्दी सोसायटी के फाण्डेशन की जमीन तैयार होगी। लगता है मंडल विरोधी ऐक्टिविटी में लगे हो।”
उसकी बेसिर-पैर की बातों से मैं खीझ गया था। बोला– “यार, पूछते हो तो बताए देता हूँ। मैं तो इस रिपोर्ट को जातिवादी राजनीति का एक स्टंट मानता हूँ। यह तो कमंडल के विरुद्ध उठाया गया कदम है। एक कुआँ है तो दूसरी खाई है। जिधर भी जाओ गिरना ही है। और गिरेगा कौन? वी.पी.? राजीव गाँधी? या ऐडवानी?”
“मैं जानता था कि तुम यही कहोगे। तुम जैसे लोगों ने ही सोसायटी को गर्क किया है। तुम क्यों चाहोगे कि कमजोर लोग भी तुम्हारे बराबर आ जाएँ। तुम तो पैर छुआकर आशीर्वाद देने वाले लोग हो।”
“यार, तू तो बात का बतंगड़ बना देता है। क्या इतना भी नहीं सोच सकता कि इससे तो वर्ग-भेद और बढ़ेगा। नए खेमे तैयार होंगे।”
“वर्ग-भेद किससे बढ़ेगा और किससे कम होगा, अब मुझे तुमसे सीखना पड़ेगा, क्यों? इतने दिनों तक तो झक मार रहा था। मार्क्सवादी साहित्य थोड़े पढ़ रहा था। वर्ग-भेद और वर्ग-संघर्ष के बारे में तुम मुझसे ज्यादा नहीं जानते। जान भी नहीं सकते। अभी कल तलक जिसे इन शब्दों के नाम तक का पता नहीं था, मुझे सीखना पड़ेगा कि वर्ग-भेद क्या है? कैसे पनपता है? और कैसे कम होता है?” आर.बी. तैश में आ गया था।
मुझे लगा कि मैं आर.बी. से ही मुखातिब हूँ। मगर, मेरा यह खयाल देर तक न टिक सका। मैं ‘रुको, रुको’ करता रहा, किन्तु वह अनसुना कर चलता बना।
मेरा मन रह-रहकर मुझे ही कोस रहा था। इतने दिनों बाद एक पुराना परिचित मिला। न चाय पिला सका न पानी। न दो मीठी बातें ही हुईं। और नहीं तो उसे दुखी करके भगा दिया।
...क्या करता? मार्क्सवाद के नाम पर उसकी प्रतिक्रियावादी बातों का समर्थन करता! अच्छा किया। ऐसे लोगों के साथ इससे भी बुरा सुलूक करना चाहिए। इन्हीं लोगों ने तो मार्क्सवाद की कब्र खोदी है। स्साले, मार्क्सवाद की खोल में पुरातनपंथी भेड़िए।
आर.बी. से फिर कभी मुलाकात नहीं हुई। राकेश ने बताया था कि आर.बी. ने मजदूरों की एक विशाल रैली आयोजित की थी। जिसमें राज्य सरकार के मन्त्रियों ने शिरकत की थी। वही राकेश आज फिर मिल गया। उससे जब-तब मुलाकात हो जाती है। अचानक देश-दुनिया की बातों में आर.बी. की बात निकल पड़ी।
राकेश ने पूछा– “जानते हो त्रिपाठी, आजकल आर.बी. कहाँ है?”
“नहीं, यार। उससे मिले तो अरसा बीत गया। वैसे सुना था कि जनता दल का झण्डा लिए घूमता था।”
“उसके बाद तो बहुत कुछ हुआ। तुम्हें पता नहीं! समाजवादी जनता दल में गया। भाजपा में जाने की चर्चा जोरों पर है। अरे, हाँ। छब्बीस जनवरी की पूर्व संध्या पर मुख्यमन्त्री का भाषण सुने थे?”
“नहीं, यार। इन चूतियों का भाषण मैं नहीं सुनता। स्साले, वही आसमान के तारे तोड़ने की बातें करते हैं और शर्त रखते हैं कि अगर जनता ने साथ दिया तो। स्सालो, यह अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाला। जाग रही है जनता। जाग रही है।”
मेरा मन खिन्न हो गया। मुँह का स्वाद कसैला हो गया। कहाँ की बातें ले उठा राकेश।
“वह भाषण आर.बी. का लिखा हुआ था। विश्वास न हो रहा हो तो देसाई से पूछ लेना। आजकल वह चीफ मिनिस्टर का प्रेस सलाहकार है।”
पलभर को मेरा मस्तिष्क जैसे सुन्न हो गया। धीरे-धीरे उसकी खाली जगह जब भरने लगी, तब मुझे पॉलिटिक्स और साहित्य, साहित्य और जॉलिटिक्स की लीद घोली जाती-सी लगी। धीरे-धीरे वह लीद एक आकार ग्रहण करने लगी और आर.बी. के रूप में बदल गई। यद्यपि उस आकृति के चेहरे से दाढ़ी-मूँछ नदारद थी मगर असंख्य चितकबरे दाग जगमगा रहे थे।
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