छुतिहर

छुतिहर बंगले के लान में चौपाल जमी थी। सभी के चेहरे गंभीर थे। जैसे अभी-अभी मय्यत से लौटे हों। मानो शहर की मिलों और फैक्ट्रियों का सारा धुआँ इसी लान में पसर गया हो। स्ट्रीट लाइट का प्रकाश भी इस धुएँ में बिला जा रहा था। परछाइयाँ ऐसे लग रही थीं जैसे भूत-प्रेत किसी भावी प्रोग्राम में मशगूल हों। लान में लगे फूलों ने जैसे इन लोगों के दुख में खुद को शामिल कर लिया था। मगर एक छिनाल रातरानी थी जो समय-कुसमय का खयाल किए बिना आवारा झोंके के साथ इश्क लड़ा रही थी। बड़ी देर की श्मशानी चुप्पी को देबीदीन ने तोड़ा– “मजबूर हूँ कि आप लोगों को पानी-कानो भी नहीं पूछ पा रहा। कहाँ सोचा करता था कि कोई प्रोग्राम बनाऊँ और आप लोगों को बुलाऊँ। मगर, मन की मुराद मन ही में रह गई। आप लोग आए और मैं आवभगत भी नहीं कर पा रहा।” देबीदीन का गला भर आया। वे रूमाल से अपनी आँखें पोंछने लगे और उसाँस लेते बोले– “सब समय का फेर है। चाचा कितने भले आदमी थे। आज दस बरस हो गए हमसे उनसे पैलगी-आसीर्वाद भी न था। मगर, चाचा की भलमनसाहत को कैसे भुलाया जा सकता है? चाचा अपने कौल के पक्के थे। इसी को कहते हैं कि इन्सान कुछ लेकर नहीं जाता, अपने कर्मों के सिवा। फिर भी हम आपस में लड़ते रहते हैं।” नजर उठाकर लोगों की ओर ताका देबीदीन ने। सभी बुत की तरह सिर नवाए बैठे थे। देवीदीन और गम्भीर हुए– “इन्सान ही इन्सान के काम आता है। मगर देखो न, घनश्याम भाई को। उधर चाचा की चिता भी अभी ठण्डी नहीं हुई, इधर ये भाँवर फिरवाएँगे। आज ही मैं उनसे मिला था। लाख समझाया। मगर, टस से मस न हुए। लड़िका डाक्टर क्या हो गया कि जमीन पर पाँव ही नहीं पड़ते। समझते हैं कि दुनिया से वास्ता ही नहीं पड़ेगा। अब तो दमाद भी इंजीनियर मिल गया है। अरे वही, जिसे मैंने रिजेक्ट कर दिया था, अपनी बिटिया के लिए। कुजतिहा।...आप लोगन की का राय है? सादी होनी चाहिए कि...” “हम का कहेंगे? भला ऐसे में कहीं सादी-बियाह होता है? सुमेर मउसा भी कह रहे थे कि छुतिहर में कोई सुभ काम नहीं होता। उन लोगों में तो अभी कितने पुस्त का फेर है?” छुन्नन बोले। “पुस्त का फेर! अरे, अभी तो अलग-बिलग हुए ही कितने दिन हुए? घनश्याम को तो बजरंगी ने ही पाला-पोसा। नहीं तो सौरिए में मर-मुआ गए होते।” सुरेन जैसे बैठे कठले को बिना हड़बड़ी के ठीक करते बोले। “मउसा कह रहे थे कि बारह दिन तक मरे हुए इंसान की आत्मा भटकती है और पीपल के पेड़ पर निवास करती है। एही से तो पीपर पर घंट लटकाते हैं और बारह दिनों तक बिना नागा सबेरे-संझा अन्न-पानी देते हैं। बिना मोहपातर के घंट फोड़े आत्मा मुक्त नहीं होती।” अलगू बीच-बीच में देबीदीन की ओर ताक लिया करते जैसे पूछ रहे हों कि आगे बढ़ूँ कि रुक जाऊँ। और हरी झंडी पाते ही पाँव का दबाव बढ़ा देते, “घीव देत बाभन नरियाय वाली कहावत इन्हीं मोहपातरों पर ही तो कही गई है। ये लोग घीव को मुँह में लेकर तब तक उसे गले के नीचे नहीं उतारते, जब तक उनकी माँग पूरी नहीं की जाती। घंट फूटते ही उधर आत्मा की मुक्ति होती है और इधर ‘काम’ पूरा होने पर वह खान्दान शुद्ध होता है। एही से तो ‘काम’ के पहले ऐसे घर का पानी तक नहीं पीया जाता। बहुत नहीं तो कम-से-कम पाँच पुस्त तक तो बराना ही चाहिए।” अलगू अपनी समझ पर मौसा की मुहर लगा रहे थे। क्योंकि इस समाज में मौसा की बात का अपना अलग महत्त्व है। मौसा ज्ञानी पुरुष हैं। अलगू ने सबकी ओर देखा और आश्वस्त हुए कि उनका प्रयास सफल रहा। विशेष रूप से देबीदीन से संतुष्ट थे। उन्हें विश्वास हो गया कि बेटा दसवीं पास हो जाएगा। “भाई जटेसर और बटुक कुछ नहीं बोले। का राय है, आप लोगों का?” जान-बूझकर देबीदीन ने पूछा। उन्होंने ‘आप लोगों’ पर कुछ ज्यादा ही बल दिया था। वे जानते थे इन दोनों को। हमपेशा जो ठहरे। इन दोनों को मास्टरी उन्होंने ही दिलाई थी। आखिर, पैसा देने पर भी नौकरी मिलती कहाँ है? जान-पहचान और बिचौलिए के बिना पैसा भी काम नहीं आता। जटेसर कुछ कहें कि बटुक बोल पड़े, “भइया, आपसे अलग भला कैसे सोच सकते हैं? आप ठीक ही तो कहते हैं। क्यों जटेसर।” “हाँ, हाँ।” जटेसर बोले। सच में, हाँ-हाँ की संस्कृति बड़ी नायाब संस्कृति है। इसके रहते कभी विघ्न-बाधा नहीं आती। अलगू ने ‘फट्-फट्’ सुर्ती की गर्द उड़ाकर बची सुर्ती को अपने मुँह में फाँक लिया। जीभ उसे ऐसे बटोरकर होंठ में दबाने लगी जैसे भेड़िया मेमने को अपनी माँद में भरता है। “इसका मतलब है कि जदि घनस्याम भाई सादी करते हैं तो हम लोग खाने का बहिस्कार करेंगे।” देबीदीन खुद को जज की कुर्सी पर पा रहे थे। इसीलिए सबकी दलीलें सुनने के बाद निर्णय देना अपना फर्ज समझा। एक जज तो महज जिरह-बहस सुनता है और उसमें से सत्य को खींच निकालता है। उसका अपना तो कोई मत होता नहीं। सुर्तीरस ने अलगू की रगों में नई ताकत का संचार किया, “नहीं भइया! खाने का बहिस्कार ही नहीं, लंकादहन भी करेंगे। आखिरकार हमारा भी तो कोई फर्ज बनता है, भतीजी की सादी में।” अलगू अब सौ फीसदी संतुष्ट हो चुके थे कि उनका सुपुत्र दसवीं कक्षा जरूर पास हो जाएगा। इसीलिए वे आज ही पर्चा लिखने खुद ही बैठ गए थे। “नहीं, यह ठीक नहीं है।” कोयलों के बीच यह कौआ कहाँ से आ टपका? पाजिटिव के बीच निगेटिव का क्या काम? कहाँ पाजिटिव पाजिटिव से धड़ाका, कहाँ पाजिटिव निगेटिव से विद्युतधारा। सबकी निगाह एक साथ उस तरफ उठ गई, जिधर से यह कर्कश आवाज आई थी। नगई, जो सबसे पीछे बैठा था, अब तक सबको ध्यान से सुन रहा था, बोल पड़ा। “क्या ठीक नहीं है?” कई आवाजें एक साथ चीखीं। “भइया, आप लोगों जित्ती समझ तो मुझमें कहाँ? फिर भी, गलत लगा इसलिए बोल उठा। बजरंगी बाबा का मरना, दुख देता है क्योंकि मौत कभी भी अच्छी नहीं होती। परंतु एक जवान इंसान के मरने पर जो दुख होता है वह तो नहीं ही है। बजरंगी बाबा बूढ़-पुरनिया थे। बूढ़-पुरनिया की मौत पर तो लोग बाजा बजवाते हैं। बरात सजाते हैं। मगर किसी ने सुना है कि किसी जवान की मौत पर बाजा बजा हो? दोनों मौत ही तो हैं।” सभी सन्न होकर सुन रहे थे। देबीदीन के दाँत में कुछ फँस गया था, जिसे वे कभी जीभ से तो कभी अंगुली के बढ़े नाखून से निकालने में जुटे थे। अलगू के मुँह में सुर्ती खली की तरह कड़वी लगने लगी थी। नगई की आवाज, जो तेज हो गई थी, क्षणभर के लिए रुकी। फिर वह मुलायम लहजे में बोला, “अरे भइया, ऐसा भी देखा हूँ, अपनी इत्ती-सी उमिर में ही कि एक ओर लहास पड़ी है और दूसरी ओर बियाह हो रहा है।” पलभर को सन्नाटा छा गया। जैसे नगई ने एक बने-बनाए खेल को ही एक झटके में बिगाड़ दिया हो। लगा कि खिलाड़ी अब तितर-बितर हुए। तभी देबीदीन ने बाजी अपने हाथ में ले ली, “नगई भी ठीक कह रहा है। जल्दबाजी में कहीं हम गलत कदम न उठा बैठें। बूढ़े-बुजुर्गों से भी राय ले लेनी चाहिए।” खेल में सिर्फ़ आक्रमण से ही काम नहीं चलता, बचाव भी जरूरी होता है। अटैक और डिफेंस की सही समझ ही किसी भी व्यक्ति को महान खिलाड़ी बनाती है। देबीदीन यह जानते थे। अन्त में तय हुआ कि रामसुमेर मौसा से मिला जाए। जैसा वे कहेंगे वैसा ही किया जाएगा। आखिर, मौसा धर्म-कर्म के कीड़ा जो ठहरे।  शादी को अब केवल दो ही दिन रह गए थे। घनश्याम बेतरह चिंतित थे। विघ्न-पर-विघ्न आते जा रहे थे। चार दिन पहले चाचा मरे, अब ड्राफ्ट ही नहीं भज रहा। अगर कल तक पैसा नहीं मिला तो भर समाज में पगड़ी उछलने की नौबत आ जाएगी। बिन बात के वे पत्नी पर झल्ला उठते हैं। दो दिन से नरेश से बेहद खफा हैं। अपने सिर्फ बैठे ही हैं। काम-धाम तो नरेश ही कर रहा है। फिर भी बड़बड़ाया करते हैं कि यह काम बाकी है, वह काम बाकी है। फलाँ काम ऐसे नहीं वैसे होना चाहिए। आज ही जो काम हो जाए, हो जाए। कल से तो नाते-रिश्तेदारों की भीड़ लग जाएगी। पता नहीं क्या है कि इस बेटी के दाईं...काहे इसी के दाईं? बड़ी के दाईं तो और भी नुकसान हुआ था। उसकी हरदी के दिन ही तो बड़े भाई सहर से आ रहे थे। कितने सौक से लड़के और उसके रिश्तेदारों के लिए धोती-कुर्ता ला रहे थे। जैसे ही गाँव उतरे मोटर से कि बक्से का पता ही नहीं। अभी आधे घंटे पहले ही तो उसे बस में अपने पास ही रखकर बैठे थे। पूरा बस छान मारा। पर, न मिला तो न मिला। इसी को तो कहते हैं, भाग्य। नहीं तो, गाँव के सिवान में आकर गुम हो जाता? कहाँ भाई से मदद मिलती, कहाँ उन्हीं को धोती-कुर्ता बनवा कर देना पड़ा। गवने में क्या कम हुआ? वह तो तकदीर अच्छी थी कि मिल गया। नहीं तो, गुम हुई चीज कहीं मिलती है भला!...इधर बरात आई, उधर नरेश अभी भी सहर में ही हैं। मसहरी और चुट्ट-फुट्ट सामान लेने गए थे। बरात खा चुकी। रिश्तेदार लोग भी खा चुके। मगर, अभी तक उनका कोई अता-पता नहीं। आजकल के लवंडों का कोई भरोसा नहीं। जिम्मेदारी-उम्मेदारी समझते ही नहीं।...पिक्चर-उक्चर में बैठ गए होंगे।...चिंता से भूख ही मर गई। मगर, क्या करें? खाना तो पड़ेगा ही। कितने सारे काम करने को पड़े हैं।...अभी दो कौर भी मुँह में नहीं गया कि देखता क्या हूँ? लाट साहब, हाथ झुलाते छिपते-छिपाते घर में दाखिल होते हैं। सच कहता हूँ, बड़ा गुस्सा आया। समय का खयाल कर अपने पर काबू रक्खा। पूछता हूँ तो, क्या बोलते हैं, “टैक्सी खराब हो गई। मसहरी कल आ जाएगी।” “परंतु, दूसरे सामान तो ला सकते थे। कि वे भी टैक्सी में ही लदकर आएँगे?” मैं समझ ही न पा रहा था कि नरेश पर गुस्सा कर रहा हूँ कि खुद पर। नरेस पहले तो अचकचाए, फिर बोले, “आज बड़ी भीड़ थी। बहुत बड़ी लगन है। कोई टैक्सी वाला मसहरी लादने को तैयार ही न था। बड़ी मुश्किल से एक तैयार हुआ, तो सीट पर थैला रखकर मसहरी से लदा रिक्शा लेने चला गया। रिक्शा लेके आया तो देखा कि टैक्सी नदारद।...उसका नम्बर है मेरे पास। जाएँगे कहाँ, सरऊ? सुबहे चौराहे पर पहुँचता हूँ न!” मैं समझ गया था कि नरेस के पास नम्बर-ओम्बर नहीं है। कहीं कोई नम्बर देखकर टैक्सी-मोटर में बैठता है? अब तो लगी चपत हजार-बारह सौ की। जब मुकद्दर ही खराब हो जाए तो दूसरे को दोस देने से क्या लाभ!...कौन नहीं जानता कि गुम हुई चीज नहीं मिलती। भाग्य की बात अलग है।...अपना भाग्य ही अगर अच्छा होता तो चोरी होती भला! अब तो ‘जाही बिधि राखे राम चाही बिधि रहिए।’ ...भाग्य के खेल भी न्यारे होते हैं। घड़िक में रुलाते हैं, घड़िक में हँसाते हैं। दूसरे दिन नरेस अल्-सुबह निकले, तो आए तिजहरिया को। मगर, मय सामान।...मैं भी सोचूँ कि भगवान मुझे कौन से पाप की सजा दे रहा है। अपने जान तो किसी को सताया नहीं। हाँ, दू-चार पइसा मिलता है तो इन्कार नहीं करता, ले लेता हूँ। आखिर जीने के लिए यह सब तो करना ही पड़ता है। किसी को दबा-सताकर नहीं लिया। जितना बँधा-बँधाया मिला, ले लिया। उसी को भगवान का प्रसाद समझ संतोस मान लेता हूँ।...मेरे भाग्य में ही सायद चैन नहीं। नहीं तो चार-पाँच साल पहले ही बिटिया को बियह नहीं दिया होता? लड़का ढूँढने में कितना फूँका? कितने जूते घिसा? इतना तो भगवान को भी नहीं ढूँढना पड़ता। वे तो खुद ही दौड़े चले आते हैं। सिर्फ मन से पुकारना भर चाहिए। थक-हारकर आखिर समझौता करना ही पड़ा। यही अगर पहले कर लिया होता तो इतने में तो बियाह ही हो गया होता। हैरानी-परेसानी से छुटकारा मिल गया होता, सो अलग। खैर, ‘होइहें सोई जो राम रचि राखा।’ गोसाईं जी ने गलत थोड़े कहा है। घनश्याम सपने में भी न सोच सकते थे कि इस जाति में बेटी बियहेंगे।...का करें? नरेसवा के कहे में जो आ गए। नहीं, नहीं। कहे में कहाँ आए? वे तो जो ठान लेते हैं, वही करते हैं। वो तो उसने उनकी मर्दानगी को ही ललकारा था। यही तो उनकी कमजोरी है। वे अपनी मर्दानगी का अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसीलिए तो बिटिया को पढ़ाकर दिखा दिए। इसके लिए करना भी क्या था? बँधे-बँधाए को थोड़ा ढीला ही तो करना था। अगर बिटिया को पढ़ाए न होते तो उन ऊँची जातियों में लड़कों का अकाल थोड़े ही था, जिसमें बाप-दादा बियहते आए।...तब बुद्धि में ही न आया कि ऊँची जाति के लड़कों का बियाह जल्दी हो जाता है। देखो न, उनको ही अपने बेटे का बियाह कितनी जल्दी कर देना पड़ा था। वे अभी शादी करने के पक्ष में कहाँ थे? मगर, क्या करते? आए दिन नाते-रिश्तेदारों का जमघट लगा रहता। वैसे तो लोगों का आना और खुशामद करना अच्छा लगता है। मगर, नाश्ता-चाय-आवभगत में कमर टूट जाती है। आखिर आनेवालों का ठीक से स्वागत-सत्कार तो करना ही पड़ता है। समाज में रहना है, सिर ऊँचा करके रहना है, तो यह सब करना ही पड़ेगा।... ...आप लड़के वाले हो और साथ ही ऊँची जाति के, पता चले।...उनका बेटा तो पढ़ता भी था। आखिर, मजबूर होकर शादी करनी ही पड़ी। अगर, थोड़ा और धीरज रख लेते, तो खूब दहेज मिलता। हजारों में नहीं, लाखों में।...जानता कौन था कि नरेस डाक्टरी पढ़ेंगे?...दहेज कम थोड़े मिला था। कहीं नरेस बहेतू निकल जाते तो। जो हुआ, अच्छा हुआ। कौन जानता है? कहीं बहू के भाग्य से ही नरेस डाक्टर बने हों।... ...और बेटी की शादी! जब तक भाँवर न पड़ जाए, तब तक नहीं समझना चाहिए कि बला टली। न जाने कौन-सा बिघ्न आ टपके।...अब नरेस को का पता? भले ही डाक्टर हो गए। मोटी-मोटी पोथी पढ़ लिए। दीन-दुनिया की मुझसे जादा थोड़े जानते हैं। कैसे कह दिए– “पिताजी, अब तो शादी टालनी पड़ेगी न।” अब सोचो भला! दुनिया में तो रोज न जाने कितने लोग मरते हैं। तो क्या दुनिया का काम-काज रोक दिया जाता है?...हाँ, यह सही है कि चाचा ने ही मुझे पाला-पोसा। पढ़ाया-लिखाया। मगर, यह तो तब की बात है जब हम लोग एक में रहते थे। अलग-बिलग नहीं हुआ था। और अब...एक्के सहर में रहते हुए भी हम साल में कितनी बार मिल पाते हैं?...का चार पैसा खुटने पर वो दे देते थे। नहीं भइया, अलग-बिलग का मतलब ही है कि अपना-अपना कूटो। कहते हैं– “क्या आपको दुख नहीं, बाबा के मरने का? जिन्होंने आपको पाला-पोसा। बाप का प्यार दिया।” ...नतिनी पूछे नानी से कि चलबी नानी गवने? अब ई हमें बताएँगे कि चाचा ने ही मुझे पाला-पोसा!...बाप का प्यार दिया! हंऽ, अभी न होता तो पता चलता बाप के प्यार का।...पूछते हैं कि दुख नहीं है?...अब दुख को लेकर हाय-हाय करें कि कपारे पर जो पड़ा है उसको कूटें। अब जाने वाला तो चला गया। लाख करो, अब वह आने से तो रहा। फिर बिटिया का घर क्यों न बसाएँ! अपनी इज्जत-आबरू क्यों न देखें! बड़ी मुस्किल से तो सुभ मुहुर्त निकलता है। इनको क्या पता कि मुहुर्त क्या होता है? अभी बोलो तो फट् से कह देंगे कि यह सब बकवास है। अंधविस्वास है। अगर जिंदा रहा तो देखूँगा कि अपनी बिटिया के दाईं क्या करते हैं? इंतजाम करो तो पता चले। अब आपके इंतजाम को कोई देखनेवाला ही न हो, प्रसंसा करनेवाला ही न हो तो उस इंतजाम का मतलब ही क्या? ...कहते हैं कि गाँव वाले नहीं खाएँगे। मत खाएँ। इस सहर में क्या खानेवाले कम हैं? आपकी इज्जत-आबरू बनी रहे, व्यवहार बराबर रहे, तो एक बुलाओ तेरह आते हैं।...उन लोगों को तो जलन है कि घनस्याम अपनी बिटिया का बियाह एक इंजीनियर से कर रहे हैं। गाँवभर में किसी का दमाद इंजीनियर है?...नात केतना सोझवा मिला है! जब बताया कि कंकोत्री में जिस चाचा का नाम छपा है, उनका गाँव में स्वर्गवास हो गया है। वे मेरे सगे चाचा नहीं थे। वो तो बूढ़े-बुजुर्ग के नाते उनका नाम डाल दिया था। तो कैसे बोले, “मिसिरजी, रिस्ता आप से हो रहा है आपके चाचा से नहीं। जब आपको सादी करने में कोई आपत्ती नहीं, तो हमें क्यों होगी भला?” अच्छा नात मिला है। बिटिया राज करेगी।...बिटिया भी मेरी कोई कम है? साइंस से ग्रेजुएट है, साइंस से। कहाँ मिलती हैं साइंस से ग्रेजुएट लड़कियाँ? तभी तो दान-दहेज में कोई हुज्जत नहीं की। नहीं तो, सुरसा से कम मुँह बाते काया?...अब नहीं माँगे, तो उनका बड़प्पन है। एही से तो हमें भी अपना बड़प्पन निभाना पड़ेगा।...माँगे होते तो इतनी चिंता न होती। अब तो उनके अंदाज से भी जादा करना होगा। जिससे हमेसा के लिए दबे रहें।  देबीदीन के मानलपटल पर बार-बार वह दृश्य घूम जाता। जब वे अपनी बेटी के लिए इसी लड़के को देखने गए थे। जैसे ही लड़के ने सुना कि लड़की हाई स्कूल है, बोल उठा था, “नहीं, मैं यह शादी नहीं कर सकता। मुझे तो कम-से-कम ग्रेजुएट लड़की चाहिए।” ...कैसा मुँहफट लड़का है? कुसंस्कारी। न सरम न हया। सब धोकर पी गया। ऐसे घर में बेटी बियहूँगा?...जैसे भी हो, लड़का था हृस्ट-पुस्ट। इतने लड़कों को देखा, मगर इसके जैसा दूसरा कोई न था। सर्वगुन सम्पन्न। दुधारू गाय की चार लात भी खानी पड़ती है। बेटी सुखी रहती।...लाख सुंदर हो। गुनों की खान हो। मगर, इसका मतलब यह तो नहीं कि सबको जलील करता चले। उनका चेहरा तमतमा आया। लगा, अब चटखा तब चटखा। मन में आया कि बेटी का अभी ही गला दबा दें। उसी के कारण आज उन्हें जलील होना पड़ा। लड़की जिउ का जंजाल होती है। बूढ़-पुरनिया ऐसे ही नहीं बोझ समझते थे। देबीदीन के सितारे के आगे दूसरे का सितारा चमके, यह कैसे हो सकता है? आखिर, यह अनहोनी हो ही गई। आजकल घनश्याम का सितारा चमकने लगा है। जब से नरेश को डाक्टरी में ऐडमिशन मिला है, उनमें काफी बदलाव आ गया है। गरदन अकड़ने लगी है। हुमच-हुमचकर चलने लगे हैं। डाक्टर बनने के लिए देबीदीन के बेटे का जन्म हुआ था। नरेसवा बीच में कहाँ से आ गया? देबीदीन को लगता कि उनकी गरदन झुक गई है। वे अपनी गरदन को और सीधा करते अक्सर पाए जाते. “घनस्याम भाई का बेटा अभी तो डाक्टरी पढ़ रहा है। पता नहीं, पास होगा भी कि नहीं। जबकि हमारे बाबा अपने समय के प्रख्यात बैद थे।” घनश्याम ने उस लड़के से अपनी बेटी का रिश्ता तय कर जैसे देबीदीन के घाव पर नमक छिड़क दिया। देबीदीन का दर्द जितना ही बढ़ता, उनके अंदर का जहर और गाढ़ा होता जाता।...चलो, अच्छा हुआ। एक ही बार में दोनों का काम तमाम। अपनी तकदीर खराब थोड़े है। हर बात उनके ही ‘फेवर’ में पड़ रही थी। अब देखिए न, बजरंगी चाचा भी मरते-मरते उनका भला कर गए। लाख जुगाड़ भिड़ा रहे थे। मगर बात बन ही न रही थी। उनका मरना जैसे भभकते दीए में तेल भरना हुआ। देबीदीन राय-बाट लेने दूसरे बुजुर्गों के पास भी जा सकते थे। मगर गए, रामसुमेर मौसा के पास। जिनके यहाँ उनका जाना न के बराबर ही था। ...ससुरा ढोंगी। जब भी जाओ, पूजा-पाठ ही करते मिलेगा। इशारे से बिठाल दिए जाओगे खटिया पर। अब गरज है, तो करो इंतजार। जैसे आफीसर हो।...साहब अभी बिजी हैं। ताको मुँह चपरासी का।...दस बार तो ससुर मूड़ी नवाएँगे और उठेंगे तो ‘हरि ओम् हरि ओम्’ की पागुर करते। पैलगी करो तो ससुरा अपनहीं भगवान हो जाता है, पंजा उठाकर अभय-दान देता। फिर तिकड़म में लग जाएगा। ‘टाँड़ा’ की तरह लकड़ी को अंदर से कुतर खाएगा, चोरी से नहीं, आवाज करते। संगीत निकालते। ससुरा, घुन है घुन। सास्त्रों के ज्ञान से ससुरे ने यही तो सीखा है।...जैसा भी हो, अपना क्या? सिरिफ अपना यही काम सध जाता तो इनको लौंड़े का तीन कर देता। ऐसे कुकर्मी से कहीं रिस्ता जोड़ा जाता है? जिसकी घटियाही से हैरान होके उसकी पतोहू भाग गई। हाथभर का चन्नन लगा लेने से, गटई में पगहा पहिन लेने से कोई पण्डित नहीं हो जाता। अरे, ई तो मजबूरी है कि इसके यहाँ आना पड़ा।  सच में, घनश्याम की तकदीर में सुख नहीं बदा। तभी तो एक झमेले से रुखसत हुए नहीं कि दूसरा आ टपका।... देखिए न। किसी तरह पैसे का जुगाड़ हुआ तो राहु-केतु का खौफ धर दबोचने लगा। पता नहीं, ये दोनों कब ग्रस लें।...देबिया तो सँपोला है ही, मउसवा भी कौनों मूसे से कम थोड़े है। एक बिल खोदेगा, तो दूसरा उसमें से सरककर डँसेगा। उनका हृदय अचानक टीस उठा। जैसे तनी हुई रबर अचानक छूट गई हो। उनका चेहरा पीला पड़ गया। आँखों के आगे अँधेरा छा गया। जिसमें देबीदीन और मौसा का खून में सना चेहरा अट्टहास करता नजर आया।...क्या करें? गाँव से नात-रिश्तेदार भी तो नहीं आए। सायद उन लोगों ने सोचा हो कि घनस्याम छुतिहर में बियाह नहीं करेंगे। टाल देंगे। इतनी दूर जाने-आने का खर्चा कम थोड़े होता है।...कोई भी।...कोई भी, इस मौके पर आ गया होता तो एक सहारा मिल जाता। वैसे सहराती रिश्तेदार तो आए हैं, मगर इनमें से कोई भी ऐसा नहीं जो इस मुसीबत में साथ दे। आखिर इसके लिए आवड़त भी तो चाहिए। घड़िक में वे कुर्सी पर बैठते, घड़िक में उठ जाते। कहीं भी कल नहीं पड़ रहा। दूसरे लोग अपने-अपने काम में लगे थे। बड़े भाई भण्डारे पर अड्डा जमाए थे। उनका भण्डारे पर रहना जरूरी था, नहीं तो भण्डारी लोग सब गड़प जाएँ। उनके रहने से घनश्याम भण्डारे की ओर से बेफिक्र थे। अचानक मंडप के गेट से अंदर दाखिल होते मौसा प्रकट हुए, जैसे बहेलिए की गुलेल से छूटा ढेला। घनश्याम परिन्दे की तरह दुबक गए। मगर, वह ढेला तो डाल पर ही अँटक गया। घनश्याम समझ ही न पाए कि उस ढेले को गिरा दें कि जस-का-तस पड़ा रहने दें। या उड़ जाएँ। उड़ना तो मुमकिन न था। उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वे ही लड़की के बाप हैं। दाढ़ी-बाल बढ़े हुए। मुँह झँवाया हुआ। होठों पर पपड़ी जमी हुई। कपड़े अस्त-व्यस्त। जैसे अभी-अभी किसी भयंकर बीमारी से उठे हों।...उनके पैर न जाने कौन-सी शक्ति से गेट की ओर उठ गए। उन्होंने दोनों हाथ जोड़ मंडप में दाखिल हो चुके मौसा को नमस्कार किया। मौसा आशीर्वाद देने के बाद मौसम के लिहाज से बोले– “कहो, घनस्याम। सब व्यवस्था सम्पन्न हो गई न। मेरे लायक कोई काम हो तो कहना।” “हंऽ, मउसा। आपके असीस से सब हो गया है। भाई भण्डारे पर हैं। वहीं बैठें आप।” “काहे, ई औघड़वाला रूप धरे हो? दाढ़ी-बाल बनवा लिए होते। तब भी सब यही जानते कि लड़की के बाप तुम्हीं हो। बिटिया के बियाहे में बाप पर क्या गुजरती है, सभी जानते हैं।” “ई बात नहीं है, मउसा। चाचा का अभी...” “अरे, हंऽ! हम तो भूल ही गए थे। बहुत अच्छा किया बच्चा। खान्दान की परम्परा को तो निभाना ही चाहिए।” “सोचता हूँ मउसा, कि परसों-नरसों गाँव चला जाऊँ। खौरि के दिन तो पहुँच ही जाऊँगा।” “बहुत अच्छा सोचे हो। अच्छा, बच्चा। अपना काम-धाम निपटाओ। राधे के पास ही बैठता हूँ मैं।” मौसा के व्यवहार से घनश्याम को थोड़ा ढाढस बँधा।...फिर भी विश्वास न जमा। जमता भी कैसे? मौसा को समझ लेना इतना आसान भी तो नहीं। उड़ती चिड़िया की टँगरी में डोरी बाँधते हैं।...ढाढ़स का कारण था ढेले का अँटक जाना। अगर डाली को हिलने न दिया जाए तो यह गिरेगा नहीं, अँटका ही रहेगा। भइया इसे देख लेंगे। धीरे-धीरे लोग आने लगे। घनश्याम सबसे हाथ मिलाते। हाथ जोड़ नमस्ते करते। बतियाते। मगर दिमाग में रह-रहकर जैसे कोई काँटा करक उठता। जिसका असर पूरे जिस्म में बिजली की तरह फैल जाता। जिससे वे एकदम लस्त-पस्त हो जाते। लगता कि अब धड़कन बंद हुई। एक तो निराजल उपवास, दूसरे देबीदीन की दहशत। जहाँ वे देबीदीन की दहशत से लस्त-पस्त हुए जा रहे थे, वहीं दहशत ही उनमें ताकत का संचार भी कर रही थी। नहीं तो, क्या उनमें इतनी ताकत बची थी कि खड़े रहकर लोगों का स्वागत कर सकें?...जैसे ही किसी के आने की आहट होती, उन्हें लगता कि देबीदीन आया। वे तुरंत चौकन्ने हो जाते। इस वक्त उनकी सभी इंद्रियाँ मुस्तैदी से अपने-अपने प्वाइंट पर तैनात थीं। बारात आ चुकी थी। घनश्याम द्वारपूजा की वेदी पर बैठे थे। पण्डितजी मंत्रोच्चार के बीच कभी आचमन को कहते, तो कभी दूब चढ़ाने को। कभी फूल चढ़ाने को कहते, तो कभी अगियारी करने को। हर बार घनश्याम अचकचाकर उन्हें अंजाम देते। तभी पण्डितजी ने कहा– “आँख मूँदकर अपने भगवान को याद कीजिए।” घनश्याम को लगा कि देबीदीन ने पण्डित को भी साध लिया है। स्साला यह भी... “क्या सोच रहे हैं? आँख मूँदकर अपने भगवान को याद कीजिए।” घनश्याम अपने को बेबस पा रहे थे। उन्होंने न चाहते हुए भी अपनी आँखें बंद कर लीं। आँखों के उस अँधेरे में उन्हें देबीदीन और उनके गुर्गे, बाबा भूतनाथ और उनके गणों की तरह नाचते-गाते आ रहे थे। सचमुच, उन्हें अपने भगवान की याद आ गई, द्रपदी की तरह। आँख खोलते ही सामने खड़ी भीड़ में उन्हें देबीदीन नजर आया जो उनको नहीं, दूल्हे को एकटक घूरे जा रहा था।...अब क्या करूँ? हे भगवान! जंतर-मंतर न कर दे। इसकी आँखों को देखो। कहीं कुछ पुजा के न आया हो। उठ भी तो नहीं सकता?...अजब संकट में पड़ गया। एक ओर कुआँ तो दूसरी ओर खाई।...हे भगवान! अब लाज तुम्हारे ही हाथ है। जैसा चाहो, वैसा करो।...नहीं, मुझे परेशान नहीं होना चाहिए। बेटा जब अपने बराबर का हो जाए, तो बाप को चिन्ता नहीं करनी चाहिए। वैसे भी बड़ा बेटा, बेटा नहीं, भाई होता है। नरेस कम समझदार थोड़े हैं। आखिर में सारा काम-धाम, दौड़-भाग उन्हीं का तो किया हुआ है। उनके हित-दोस्त कैसे जी-जान से जुटे हैं। लगता है कि वे अलग-अलग जात-बिरादरी के हैं? अलग-अलग देस-परदेस के हैं?...और हमने भी जो ई मुस्टंड ओझा-सोखा लोगों को बटोर रक्खा है, किस दिन के लिए? ई अपने आपको भले ही भूतनाथ समझता हो और अपने गुर्गों को भूत-प्रेत। हमारे ई ओझा-सोखा क्या इनको पास भी फटकने देंगे? जब मरचा की बुकनी देंगे तो इनके होस अपने आप ठिकाने आ जाएँगे।... देबीदीन ने सबसे पहले बारातियों को ही पकड़ा। उसने सोचा कि अगर बाराती ही न खाएँ तो आगे कुछ करने की जरूरत ही न पड़ेगी। पेड़ को खत्म करने के लिए उसकी डालों को काटने की क्या जरूरत? जड़ को ही खत्म क्यों न किया जाए?...उन्हें क्या पता था कि उस पेड़ की जड़ जमीन में गहरे धँसकर छितरा चुकी थी। काफी मजबूती से जमीन को पकड़े थी। वैसे देबीदीन नौसिखुआ खिलाड़ी नहीं थे। उन्होंने काफी कुछ अकन लिया था। फिर भी उतना मनन और बंदोबस्त नहीं कर पाए थे, जितना चाहते थे। वे पेड़ को हिला-डुलाकर परख चुके थे और उसे अपने अँकवारि में पा रहे थे। लड़के का बाप बड़ा समझदार निकला। वह चुन-चुनकर बाराती लाया था।...अगर मिसिरजी की इज्जत जाती है, तो अपनी भी तो जाती है। देबीदीन को देखते ही वह भाँप गया कि यह कोई-न-कोई खरमंडल जरूर करेगा। बियहकटवा है। तभी तो घर भी पहुँच आया था बताने कि मिसिरजी के चाचा मर गए।...इससे चेतकर रहना होगा। इसीलिए, बाराती देबीदीन की बातें तो सुनते मगर कोई प्रतिक्रिया न जताते। अपना वार खाली जाता देख देबीदीन अंदर से खीझ रहे थे अपने ही ऊपर।...अब क्या करें?...मउसवा भी अभी तक नहीं आया। ईहो ससुरा दगा न दे जाए। इसका कोई ठिकाना नहीं। बिना पेंदी का लोटा है। “अरे भाई, अलगू। मउसा का तो पता लगाओ। आए हैं कि नहीं।” छुन्नन और अलगू, मौसा की खोज में लग गए। जटेसर, बटुक, सुरेन और देबीदीन खामोश खड़े इधर-उधर नजर दौड़ाते रहे। थोड़ी देर बाद अलगू लौटे– “मउसा आए हैं, कब के। और भण्डारे के पास बैठे हैं रधवा के साथ।” “उहाँ बैठ के का कर रहे हैं? पूड़ी छान रहे हैं का? बुलाया नहीं?” “बुलाया। बोले कि चलो, अभ्भी आता हूँ।” ...इहाँ जान निकली जा रही है, उहाँ बोलता है कि अभ्भी आता हूँ। ‘तू चल मैं आता हूँ, चुपड़ी रोटी खाता हूँ’ वाला पाठ तो नहीं पढ़ा रहा?...देखो न, इधर खाना सुरू ही होने वाला है। टेबुलों पर खाना जमने भी लगा। बड़ा इंतजाम किए है।...जब बिगड़ने को होता है तब ऐसा ही होता है। होनहार लड़के ही जल्दी मरते हैं। बुझने वाला दीया खूब भभकता है।...यह सब सोचने भर से नहीं होने वाला। जुगत लगानी पड़ेगी, जुगत। “जाओ, भाई अलगू, उसे पकड़िके ले आओ। तूँही से वह आएगा।” और खुद अपने गुर्गों को साथ ले इक्के-दुक्के लोगों से मिलने लगे, जिनसे थोड़ी-बहुत पहचान थी।...मउसवा के इंतजार में बैठे रहना भी तो ठीक नहीं। अपना काम करते रहना चाहिए। कोसिस करें। का पता ऐसे ही बात बन जाए। वे अपनी ‘कोसिस’ करते रहे। मगर उनकी बात का लोगों पर कोई असर न पड़ा। अलगू भागते-भागते आए और देबीदीन को किनारे ले जाकर फुसफुसाए, “मउसवा तो डाँट दिया। लगता है पाटली बदल लिया।” देबीदीन पूछना चाहते थे कि मउसवा का बोला? मगर, यह सोचकर रुक गए कि इसे जानकर क्या लाभ? अब तो कर बहियाँ बल आपनो का ही सहारा है। लोग-बाग खाना शुरू कर चुके थे। जैसे-जैसे लोग थाली लेकर खड़े दिखते देबीदीन का दिल बैठने लगता, जैसे लोग जमीन पर खड़े न होकर उनकी छाती पर खड़े हों। उनका मन जैसे खाली सीप हो गया था जो उन्हीं को खुरच रहा था।...ये तो सभी खा रहे हैं।... हड़बड़ाहट में अब उन्हें जो ही मिलता उसे धर दबोचने लगे। उन्हें इसका खयाल ही न रहा कि उनकी अंगुलियों के दबाव से वह इंसान मर भी सकता है। लिहाजा, वह आदमी किसी तरह अपने को छुड़ाकर भागता जैसे रात में परछाईं।...वैसे तो फुर्सत किसे थी कि उनकी पागुर सुनता। सभी को इसकी जल्दी थी कि लपको, नहीं तो पिछड़ जाओगे। खाने में जो पिछड़ा वो जिंदगी में भी पिछड़ जाएगा। फिर क्या पता? कोई आइटम मिले, न मिले। शादी-विवाह में तो अक्सर अच्छा आइटम खुट जाता है। सभी अच्छा आइटम ही खाने आते हैं। पूड़ी-सब्जी थोड़े ही। और पागुर खाना खाने के बाद की जाती है खाने के पहले थोड़े। ...अरे! जटेसरा और बटुका कहाँ गया?...ईहो सारे गए, का?...तभी उनकी निगाह एक जगह थिर हो गई। देखते क्या हैं कि पकवानों से भरी थाली लिए नगई खड़ा है। उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ। क्योंकि कुछ परछाई-सी दिखी थी उसके साथ, जो बटुक और जटेसर से मिल रही थी। सचमुच, वे बटुक और जटेसर ही थे। देखते-देखते तीनों के हाथ में एक-एक रसगुल्ला आया और एक साथ उनके मुँह में पहुँच गया। जिससे उनका मुँह गुब्बारे जैसा फूल गया। देबीदीन को लगा कि वे उन्हें चिढ़ा रहे हैं उनके ही सामने। उनकी आँखें अंगारा बरसाने को हुईं। नाक अपना आकार बढाने को हुई। पैर आगे चलने को तत्पर हुए। हाथ की अंगुलियाँ मुट्ठी बनने को हुई।...नहीं। कोई कुछ भी नहीं करेगा। दिमाग ने झटके से सबकी लगाम खींच ली। अब खिसक लेने में ही भलाई है। लड़ाई के मैदान में जान गँवाने से बेहतर है कि किसी भी तरह भाग-भूगकर जान बचाई जाए। बड़े-बूढ़ों ने कहा है कि जिनगी से बढ़कर कोई चीज नहीं। जिनगी रही तो बदला लेने के बहुत मौके आएँगे। वे, अलगू और सुरेन्द्र और छुन्नन नजर बचाकर मंप से बाहर खिसक लिए। तभी नरेश की आवाज कानों में करक उठी– “जा रहे हैं क्या, चाचा! खा-पी लिए न। भाँवर पड़ने तक नहीं रुकेंगे क्या?” देबीदीन का दिमाग उन्हें अँधेरे की ओर खींचे ले जा रहा था। अब यहाँ की जगमगाहट से दूर, बहुत दूर पहुँचना चाह रहा था। जहाँ सुकून के साथ सोच-विचार किया जा सके। धीरे-धीरे उनकी परछाइयाँ अँधेरे को और गाढ़ा कर गईं।  बेटी की बिदाई के साथ ही घनश्याम की चिंता भी विदा हो गई। अब वे निश्चिंत हैं। बेटी से बड़ी चिंता और कोई हो ही नहीं सकती। आधि-व्याधि तो इनकी उमिर के साथ-साथ बढ़ती हैं। हर-हमेस चौकस रहना पड़ता है। कहीं जरा-सा भी ध्यान बिचला कि दुनिया को मुँह दिखना भी मुहाल हुआ। और सादी-बियाह? भगवान बचाए। भगवान किसी को भी बिटिया न दे। उफ्फ! शादी की याद से ही वे पसीने-पुसीने हो गए। ...भगवान जो भी करते हैं, अच्छा ही करते हैं। हम नाहक परेशान होते हैं। कैसे भगवान मउसा के अंदर समा गए थे। नहीं तो, मउसा अपनी करने से बाज आते? देखा नहीं? कैसे अलगुआ लपक-लपक के उनके पास आ जाता था। सायद बुलाने। मगर, मउसा गए नहीं। एक बार तो झिड़क ही दिया– “का है? जाते हो कि नहीं।” जटेसरा जब आया तो उसके साथ चल दिए। मैं तो घबरा ही गया था। मगर, यह क्या? जटेसर-बटुक, नगई के साथ लग गए और खाए भी। हंऽ, मउसा ने उन्हें समझाया होगा। मउसा, मेरे मउसा। मउसा कच्चे खिलाड़ी न थे। वे जल्दी इसीलिए आ गए थे कि दुश्मन की ताकत को भी परख लें। वैसे देखा जाए तो उनकी न तो देबीदीन से दोस्ती ही थी और न घनश्याम से दुश्मनी ही। इसलिए सोच-समझकर अपना पक्ष चुनना ही समझदारी कही जाएगी। नहीं तो, ऊहे होगा कि चौबे गए छब्बे बनने और दूबे बनकर लौटे।...सहिए, घनस्मवा बहुत आगे बढ़ गया है। केतने बड़े-बड़े साहब लोग आए हैं। जिधर देखो उधर इस्कूटरों-गाड़ियों का ही जमघट। केतना सामान मिलेगा उसे। जेही को देखो ऊहे हाथ में बड़ा डिब्बा थामे है। चमचमाता।...नरेसवा के नाते है ई सब। ऊ जरूर मेरे बेटे को लगा सकता है। कुछ नहीं तो चपरासी तो बना ही देगा। ऊ चाहे तो क्या नहीं कर सकता?...जज-कलट्टर-दरोगा सभी तो दिख रहे हैं।...काहे की छुतिहर। बजरंगी और घनस्याम में केतने पुस्त का फेर है? घनस्याम की भलमनसाहत तो देखो। किसी से छिपाया नहीं। सभी को बता दिया। सच के साथ रहना ठीक है। उसी की जय होती है। देबिया, स्साला चोट्टा! मक्कार! खाना खाकर तो मौसा ने अपने बेटे की नौकरी ही पक्की कर ली।  घनश्याम जब से ट्रेन में बैठे हैं, उन्हें चाचा की बहुत याद आ रही है। उस चाचा की, जिन्होंने उन्हें बाप की तरह पाल-पोसकर बड़ा किया। अकूत प्यार दिया। जैसे कोई माली किसी पौधे को पानी देता है, गोड़कर आस-पास की मिट्टी भुरभुरी बनाता है। जिससे पौधे की जड़ अधिक सरलता से और नीचे उतर सके। काट-छाँटकर उसे और छतनार बना देता है। चाचा के प्यार और स्नेह का ही परिणाम है कि वे आज इस पद पर हैं। बेटा डाक्टर है और दामाद इंजीनियर। रह-रहकर चाचा आँखों के सामने तिर जाते।...ओ देखो। चाचा, अंगुली पकड़कर चलना सिखा रहे हैं।...रह-रहकर छोड़ देते हैं। बच्चा मुश्किल से दो कदम चलता है फिर बैठ जाता है। चाचा दौड़कर फिर से अंगुली पकड़ लेते हैं और चलने लगते हैं हँसते-हँसाते। कातिक-अगहन महीने की रात। चुपके से नाच देखने गया लड़का आधी रात के बाद लौटता है। डरा हुआ। चाचा बरामदे में सोए हैं। लड़का चुपके से बिना आहट किए दरवाजा खोलकर घर में घुसना चाहता है। अभी उसका एक पाँव बरामदे पर पड़ा ही था कि डंडा पटकने की आवाज सुनाई दी।...तो क्या चाचा सोए नहीं थे? तब तक चाचा खाट छोड़ चुके थे। लड़का भागा। चाचा खदेड़ लिए और बोले जा रहे थे– “बहेतू बनेंगे। बहेतुओं को घर में जगह नहीं। हम्में मरा समझ लिए हैं। चोरी-चुपके से जा रहे हैं। जाओ...” और न जाने क्या-क्या बक रहे हैं। लड़का पास के बाग में भाग जाता है और एक पेड़ के नीचे घुट्टी मारकर बैठ जाता है। थोड़ी देर बाद चाची आती हैं और अपने आँचल में छुपाकर ले जाती हैं। चाचा कुछ नहीं बोलते, जैसे सो गए। घनश्याम की आँखें छलछला आईं। वे कई बरस तक जानते रहे कि बजरंगी ही उनके बाप हैं। वे तो जानते ही न थे कि वे बिन बाप के हैं।... चाचा ने डाँट-पुचकारकर, ठोंक-पीटकर उन्हें इस लायक बनाया, नहीं तो वे भी टूअर होते और जिंदगीभर गोबर काढ़ते रहते। दुआरा बुहारते रहते। गाड़ी की रफ्तार से भी तेज उनकी यादों की रील चल रही थी। जैसे-जैसे वे गाँव के नजदीक पहुँचते जा रहे थे, चाची का चेहरा और साफ नजर आता जा रहा था। जो जाड़े में अपने कलेजे से लगाकर सोतीं। खुद पटरी पोताड़तीं। घिसकर चमकातीं और बिठातीं, लिखने को। काली पटरी पर मोती जैसे अक्षर देखकर बलैया लेतीं। रंगीन सपनों में खो जातीं, जो उनकी पनीली आँखों में झिलमिलाते साफ नजर आते। वे खुद लिखना-पढ़ना न जानती थीं। मगर, किस तरह उनको सिखाते-सिखाते खुद भी आठो डाँड़ी सीख गई थीं। ...बचपन में घनश्याम की नाक हमेशा बहा करती। चाची अपने आँचल से उनका पोटा पोंछतीं और हँसते-हँसते कहतीं– “नकबहना।” फिर एक चुम्मा ले लेतीं।...वही चाची, सफेद साड़ी में माँगविहीन कैसी लगेंगी? बंजर जमीन जैसी ही न, जिसमें रेह-ही-रेह होती है। खारी। जलनशील। घनश्याम जीभर रो लेना चाहते थे। रह-रहकर दिल फटा पड़ता था। अंदर से रह-रहकर ज्वार उठता और हलक में आकर अँटक जाता। आस-पास के पैसेंजरों के कारण वे खुद को दबाए हुए थे। उनका सिर बोझ से झुका पड़ने लगा। मूँछ नीची होती महसूस हुई। दाढ़ी में जैसे कोई कीड़ा रेंगने लगा। चाची का सामना कैसे करेंगे? रंगा हुआ पैर लेकर?... उन्हें पता ही न चला कि गाँव आ गया। बस से अभी उतरे ही थे और घर चलने की सोच रहे थे कि मुसई की आवाज सुनाई दी, “आ गए, घनस्याम भाई? कहाँ, घर जा रहे हैं का? सभी तो पोखरा पर गए हैं। आजु खौरि है न!” “हंऽ।” घनश्याम जैसे सोते से जगे– “ठीक है। सीधे पोखरे पर ही जाता हूँ। लोग लौट तो नहीं गए होंगे?” “नाहीं। फिर भी जल्दी लपकिए।”  पोखरे पर नंग-धडंग लोग, कुछ सिर झुकाए बाल छिलाते, कुछ अपनी बारी के इंतजार में सिर भिगोते, कुछ बौद्ध भिक्षु बने बैठे हैं। जैसे कापालिक बनने की होड़ लगी है। दूर से देखने पर ऐसे लगता है जैसे इस वीराने टीले पर आदिमानव कोई खेल खेल रहे हैं। घनश्याम सिर झुकाए बैठे हैं। नाई उनके बालों को भिगो रहा है। जैसे तप्त तवे पर पानी की बूँदें पड़ रही हैं। नाई की चलती अंगुलियाँ जैसे उनके माथे की मजबूती को परख रही हैं। धीरे-धीरे उस्तरा चलने लगा। उसके साथ ही घनश्याम का सिर बोझमुक्त होने लगा। मूँछ-दाढ़ी और सिर के बाल उनकी आँखों के सामने ही जमीन पर पड़े हैं।...यही मूँछ है न। जिसे बाप के जीते जी नहीं मुड़ाना चाहिए। उनके बाप तो बचपन में ही मर गए थे। फिर उन्होंने मूँछ क्यों रखी थी? कभी भी मुड़ाया नहीं। एक बार दाढ़ी बनाते समय एक ओर की थोड़ी कट भी गई थी, फिर भी नहीं मुड़ाया। कहीं चाचा के लिए ही तो नहीं? वे भी तो बाप के समान ही थे।...नहीं, नहीं। सब मोह-माया है। जिसके बंधन में रहकर जीव छटपटाता है। घनश्याम को लगा कि अब वे चाचा से ‘उरिन’ हो गए। चाची का सामना करने का खौफ भी न जाने कहाँ हिरन हो गया। वे सुख-दुख, भोग-शोक, घृणा-प्रेम, लज्जा-आबरू से निरपेक्ष वीतरागी की तरह घर की ओर चल पड़े, दूसरों के कदम-से-कदम मिलाते। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रेहन पर रग्घू

जाल