जिसका डर था

घर में पैर रखते ही केदारनाथ की निगाह खाट पर पड़े तमंचे पर पड़ी और वे पत्नी से पूछ बैठे– “ये तमंचे कौन लाया है?” “राजू लाया है। क्यों?” पत्नी ने जवाब दिया। उसके जवाब में जहाँ बेटे के लिए गर्व था, वहाँ पति के लिए तिरस्कार का भाव था। जैसे वह कह रही हो कि तुमसे ज्यादा समझदार और जिम्मेदार तो अपना राजू है। उसे परिवार के सुख-दुख की कितनी चिन्ता है। वह जानता है कि दीवाली आ रही है। ऐसे में बच्चों को पटाखे आदि तो चाहिए ही।...तुम्हें परिवार के सुख-दुख से क्या काम। तुम्हारे लिए तो नौकरी ही सब कुछ है। जैसे इतना कम हो, उसने आगे जोड़ा– “मिठाई भी लाया है। क्या मिठाई है! देखनेभर से जी भर जाता है।” पत्नी की जीभ मथनी बनी हुई थी और होंठ कड़ाही। मथनी के दबाव से कड़ाही टेढ़ी-मेढ़ी हुई जा रही थी। केदारनाथ तिलमिला गए। जैसे पत्नी ने उनके आदमी को ही ललकारा हो और कई पटखनियाँ दी हों। वह उठने की कोशिश करता कि अबकी बार बदला जरूर लूँगा कि तुरन्त धूल चाटने लगता। अपने घावों को छिपा वे बोले– “कहाँ है? लाओ, जरा देखूँ तो। मैं न ला सका, पर मेरा बेटा तो लाया न।” पत्नी जीत के भाव से भरी थी। उसमें उत्साह-ही-उत्साह था। वह उठी और मिठाई के डिब्बे को केदारनाथ के हाथ पर रखा जैसे कोई अजूबा रख रही हो। उसे विश्वास था कि इसे देखकर केदारनाथ की आँखें फटी-की-फटी रह जाएँगी। राजू के प्रति इनका भी मन बल्लियों उछलने लगेगा। पता नहीं क्यों, केदारनाथ को हराना उसे बहुत अच्छा लग रहा था। पर यह क्या? केदारनाथ ने जैसे ही उस डिब्बे पर की लिखावट को पढ़ा, उनके चेहरे का भाव बदल गया। चेहरा रक्तिम हो गया। नथुने फड़कने लगे। जबकि ऐसा लगता था कि वे खुद को दबाने का भरपूर प्रयास कर रहे थे। “क्यों?...क्या हुआ? देखो, खोलकर देखो, कितनी खुशबूदार मिठाई है। इस शहर की तो नहीं लगती। क्यों? एक निकाल कर चखो न।” ऐसा लगता था जैसे पत्नी ने शहर की सभी मिठाई की दूकानों की मिठाई खाई हो। वास्तव में वह केदारनाथ के आदमी का रेशा-रेशा उतारने पर आमादा थी क्योंकि इसी ने तो उसके नवजात अरमानों को असमय ही रौंद डाला था। “हाँ, यहाँ की नहीं है। बम्बई के ‘मोहन लाल मिठाईवाले’ के यहाँ की है।” केदारनाथ ने सीधा और छोटा-सा जवाब तो दे दिया पर उनका मस्तिष्क न जाने कितने प्रश्नों का सामना कर रहा था। “बम्बई की है। लगता है अपने किसी दोस्त से मँगवाया होगा। निकालकर चखो न। मैंने भी अभी नहीं चखी है।” पहले तो पत्नी चौंकी, फिर बेटे के बचाव और गर्व में बोल गई। वह अपने बेटे की काबिलियत पर प्रश्न नहीं उठा सकती थी। “नहीं, अभी नहीं। राजू आएगा तब चखेंगे। अच्छा, जरा एक कप चाय पिलाओ। बहुत थक गया हूँ।” केदारनाथ ने बात को खत्म करने के इरादे से कहा। वे अपने पैर के मोजे उतारकर खाट पर पसर गए। पत्नी को लगा, जैसे उसकी जीत की बाजी हाथ से सरक गई।...सरकी कहाँ? आखिर इन्होंने हार तो स्वीकार ली न।...पर, पटखनिया देकर हराने में जो मजा है, वह शरणागति में कहाँ!...कोई बात नहीं। राजू के आने पर ही सही। वह राजू के आने की बेसब्री से राह देखने लगी। राजू नौकरी पर जाने की तैयारी में था कि तभी केदारनाथ आ गए। अक्सर बाप-बेटे में मुलाकात नहीं होती। कभी-कभी तो सप्ताह तक बीत जाता है क्योंकि राजू की अधिकतर ब्रोकन ड्यूटी होती। वह पाँच बजे सवेरे निकलता तो रात के ग्यारह बजे लौटता। केदारनाथ अक्सर घर पर नहीं होते, और होते तो सो गए होते, क्योंकि उन्हें रात को राउण्ड पर जाना होता। केदारनाथ आर.पी.एफ. में सूबेदार हैं और उनका बेटा राजू रेलवे में लगेज क्लर्क। केदारनाथ आउट पोस्ट के इंचार्ज हैं। इसलिए उनकी ड्यूटी का कोई ठिकाना नहीं रहता। वे सोते, खाते या जीवन की दैनिक क्रिया से गुजर रहे होते हैं, उस समय भी ड्यूटी पर होते हैं। अधिकतर वे राउण्ड पर होते हैं। वे अपनी ड्यूटी बड़ी ईमानदारी से करते हैं। अपने स्टेशन के राउण्ड को तो वे घर पर सोकर भी पूरा कर लेते हैं, मगर दूसरे स्टेशनों का राउण्ड करते ही हैं क्योंकि उन्हें इस बात का डर सताया करता है कि कहीं राउण्ड के दौरान कोई गड़बड़ी हो गई तो। वे सिपाही से सूबेदार बने थे। इसलिए अपने सिपाहियों को अच्छी तरह जानते थे। उन्हें अपने सिपाहियों पर रत्तीभर भी विश्वास न था। राजू की पोस्टिंग दूसरे स्टेशन पर है। वह ट्रेन से अप-डाउन करता है क्योंकि उसे टिकट के पैसे तो खर्चने नहीं पड़ते। वह तो रेलवे परिवार का जन्मजात सदस्य है। वह ड्यूटी जाने की ही तैयारी कर रहा था। पिताजी को असमय अपने सामने पाकर उसका दिल धक्क से रह गया जैसे हृदय की गति में अचानक कोई गति-अवरोधक आ गया हो। वह पिताजी से आँख भी न मिला सका। केदारनाथ खाट पर बैठते हुए बोले, “राजू, मिठाई तो बड़ी अच्छी है। और ये तमंचे भी तो मँहगे हैं।...अभी तो पगार नहीं हुई होगी।” राजू समझ न सका कि क्या जवाब दे। राजू पिताजी के सामने न जाने क्यों खुद को हमेशा नर्वश पाता था। लगा जैसे उसके सिर पर मनों बोझ रख दिया गया हो, जिसके नीचे उसका मस्तिष्क साँस भी न ले पा रहा हो। असहाय-सा वह न जाने कितनी बार पिताजी से झूठ बोला था, मगर हर बार पकड़ा गया था। “...अच्छी कमाई हो जाती है, क्या?” वह पिताजी के आशय को समझना चाहता था, पर समझ न पा रहा था।...पिताजी को कौन-सा जवाब दे कि वे संतुष्ट हो जाएँ। “तुम मिठाई और तमंचे के पीछे क्यों पड़े हो? तुम्हें आम खाने से मतलब है कि पेड़ गिनने से? खुद तो कुछ करने से रहे, और यदि कोई कुछ करता है तो जल उठेंगे।” राजू के कहने से पहले पत्नी ने बाजी सँभालने का प्रयास किया। राजू ने झुकी निगाहों से ही माँ को देखा। “तुम...तुम चुप रहो। जब कुछ जानती नहीं, तो बीच में न कूदा करो।” केदारनाथ जैसे पत्नी से बदला ले रहे हों। पत्नी को झिड़कने के बाद वे राजू की ओर मुखातिब हुए। वे एक बाप की ही तरह राजू को पुचकारकर पूछ रहे थे– “बोलो। क्यों संकोच करते हो? हो जाती है न, अच्छी कमाई?” “नहीं, पिताजी। मैं घूस नहीं लेता। मेरी ड्यूटी भी ऐसी लगती है जिसमें अच्छी आमदनी नहीं। आमदनी वाली ड्यूटी तो परमानेंटों को मिलती है। ये तो सभी बाबू लोग ले रहे थे, उन्होंने ही जबरदस्ती मेरे थेले में डाल दी।” “...और यह मिठाई भी?” “यह बाबुओं ने नहीं डाली, लोडरों ने दी है। पिताजी, पान की जो टोकरियाँ आती है न। यह मिठाई का पैकेट उसमें से निकला है। पान की टोकरी में मिठाई नहीं भेजी जा सकती। यह तो धोखाधड़ी है।...लोडर इसे निकाल लेते हैं। यह वही मिठाई है।” राजू पिताजी को समझाना चाहता था कि वह निर्दोष है। इतना ही नहीं, उसने तथा लोडरों ने रेलवे को धोखाधड़ी से बचाया है। केदारनाथ समझ गए। पान के बड़े-बड़े व्यापारी अपनी पार्टियों को दीपावली की शुभकामना के रूप में मिठाइयाँ भेजते हैं। ये मिठाइयाँ अपनी पार्टी की एक पान की टोकरी में रख देते हैं, जिससे बिना अतिरिक्त खर्च के शुभकामना उन तक पहुँच जाए। पर शायद ही आज तक किसी पार्टी को वह शुभकामना मिल पाई हो। फिर भी आशावादी व्यापारी इस आस में अपनी शुभकामनाएँ भेजते ही रहते हैं कि ये कभी तो पहुँचेंगी। उन्हें याद हो आए वे दिन, जब वे ‘क’ स्टेशन पर थे। ऐसी न जाने कितनी मिठाइयाँ खाई थीं। परंतु घर पर कभी नहीं लाए। वे चोरी के माल में अपने बच्चों को शरीक नहीं करना चाहते थे।...उन्हें लगा कि वे कहाँ बहके जा रहे हैं। खुद को रोका और राजू को समझाने लगे– “ऐसा क्यों नहीं कहते कि चोरी की। क्या टोकरी की चेकिंग का तुमको अधिकार है?...आज छोटी की, कल बड़ी करोगे। पकड़े जाओगे। नौकरी तो छूटेगी ही सजा अलग से मिलेगी। और मेरा नाम...मुझे देखो। मेरे बैचवाले केवल पाँच ही नौकरी पर हैं और सभी डिसमिस हो गए। उनमें से केवल मैं ही सूबेदार हूँ। और सब तो सिपाही में ही घिसट रहे हैं। हाँ, एक अभी पिछले साल हवलदार बना है। जानते हो, मैं ही क्यों सूबेदार बना? ईमानदारी के बल पर।...यह पहली बार है इसलिए छोड़े दे रहा हूँ। आइन्दा रेलवे की एक भी वस्तु घर में आई तो ठीक न होगा।...अच्छा, जाओ। ड्यूटी पर जाओ। तुम्हारी गाड़ी छूट जाएगी।” राजू पढ़ने में ठीक-ठाक था। न तो बहुत अच्छा था और न बहुत खराब। पर केदारनाथ सोचते थे कि ज्यादा पढ़ने से क्या लाभ? एमे-बीए सभी तो रेलवे में क्लर्की के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। क्लर्की ही क्यों? अब तो सिपाहियों में भी बहुत से ऐसे हैं जो बीए हैं। दूर कौन जाए। उनके ऑफिस का काम करने वाला सिपाही भी तो बीए है। एमे-बीए करने के बाद भी जब इसी नौकरी के पीछे भागना है, फिर अभी से कोशिश क्यों न की जाए? दूसरे यह डर भी था कि कौन जाने तब लड़का अपने वश में रहेगा भी कि नहीं। इसलिए अपनी जान-पहचान, वर्दी-सैल्यूट का लाभ ले उसे कैजुअल लगेज क्लर्क में लगवा दिया। इस समय तो वे हमेशा इसी उधेड़-बून में रहते कि कैसे भी करके बेटा परमानेंट हो जाता। इसके लिए वे साहबों से याचना भी किया करते– “साहब, आपकी नजर पड़े तो मेरे बच्चे की भी जिंदगी बन जाए।” इसीलिए राजू के तमंचे और मिठाई लाने से वे बहुत परेशान हो गए।...समय कितना खराब हो गया है। इस मूरख को इतना भी पता नहीं कि अभी कैजुअल है।...बाबुओं ने तो खूब माल उड़ाया होगा। इतने भर से इसका भी नाम उन लोगों में शामिल हो गया।...खैर, कोई बात नहीं। स्टाफ के साथ तो रहना ही चाहिए न। स्टाफ से बैर लेना भी तो ठीक नहीं।...मगर स्टाफ का क्या भरोसा? खाएँगे खुद और फँसाएँगे इसको। किस-किस तरह से वे खुद बचे थे। दूसरों के बहकावे में आकर उन्होंने थोड़ा-सा मावा ही तो लिया था। मावे की क्या कीमत?...मगर स्टाफ वालों ने आसमान ही सिर पर उठा लिया था।...यदि इंस्पेक्टर साहब की मेहरबानी न होती, तो अब तक नौकरी पर होते क्या?...यदि नौकरी नहीं भी जाती तो कम-से-कम सस्पेंड तो होते ही। वे पसीने-पसीने हो गए। उन्हें चक्कर आने लगा। होंठ सूख गए।...नहीं। उन्होंने ठीक ही किया। ऐसा नहीं कि शांत जल की धारा में बहते हुए किनारे आ लगें। छपकोइया मारेंगे और डूबेंगे। केदारनाथ की हमेशा की चिन्ता नौकरी थी। चाहे वह अपनी हो या बेटे की। वे ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकते थे, जिससे नौकरी पर आँच आए। वे छुट्टी भी तभी लेते थे जब वह आसानी से मिल जाती थी। घर का चाहे कितना भी जरूरी काम क्यों न हो, यदि साहब छुट्टी देने की पोजीशन में न होते तो वे छुट्टी न लेते। घर का काम तो होता रहता है। वे नहीं रहेंगे तब भी घर का काम तो हो ही जाएगा। अगर साहब नाराज हो गए तो...वे साहब के नाराज होने की कल्पना मात्र से घबरा उठते थे। केदारनाथ ईमानदारी के कायल थे। वे घूस में भी ईमानदारी बरतते थे। परम्परा से जो रेट बँधा था वे उसी में संतुष्ट हो जाते थे। उन्हें किसी भी प्रकार की हाय-हाय न थी। वे उतना ही खाते थे जितना पचा सकें। वास्तव में पेट तो उनका छोटा न था, मगर पाचन-क्रिया कमजोर थी। इसी कारण वे अन्य सूबेदारों की तुलना में कुछ खास नहीं बना पाए। करना तो चाहते थे, मगर कर नहीं पाते थे। जब भी कुछ खास करने की सोचते, उसके खतरे से डर जाते। नौकरी सरकती नजर आती। इसलिए झट अपने कदम वापिस खींच लेते। फिर भी कुछ-न-कुछ तो कर ही लिए थे। मसलन, रेलवे के स्लीपर से खाट-कुर्सी-टेबल, रुई से गद्दे। रेलवे में कोयला जलाना चोरी नहीं समझा जाता। आखिर कोयला जलने के लिए ही है। इंजन में जले या रेलवे कर्मचारी के घर में। क्या फर्क पड़ता है। इसलिए कोयला तो घर में बराबर जलता था। केदारनाथ को कोयले पर का पका खाना बहुत स्वादिष्ट लगता था। केदारनाथ को खिटखिट जरा भी पसंद न थी। न ही वे किसी से बैर ले सकते थे। वे सिपाहियों तथा अन्य मातहतों से साफ-साफ कह दिया करते थे– “देखो भाई, तुम लोग चोरी करो या चमारी। रेलवे को बेच मारो या सागर में डुबो दो। मुझे इससे कोई मतलब नहीं। मगर, यदि मेरे रहते चोरी करोगे तो मैं छोड़ने वाला नहीं। रिपोर्ट जरूर करूँगा। हाँ, अगर मेरी गैरहाजिरी में करते हो, तो खुद के बचाव का रास्ता रक्खो। मैं किसी की मदद नहीं करने वाला।” जहाँ केदारनाथ नौकरी ही में रचे-पचे रहते, राजू हमेशा परेशान रहता। उसे लगता कि वह पिंजरे में बन्द है। सभी उसे कोंच-कोंचकर खुश होते हैं। जबकि वह पिंजरे के अंदर चारों ओर बचाव के लिए भागता, पंख फड़फड़ाता, मगर उसे तोड़ न पाता। इसमें कई बार वह घायल भी होता। राजू जब पहले-पहल नौकरी में आया था, उसकी खुशी का कोई ठिकाना न था। वह सोचता कि जब वह सफेद पैण्ट-शर्ट पर टाई तथा काला कोट पहनकर निकलेगा, तो कितना रुआब पड़ेगा। उसके आनन्द की सीमा न थी। पर उसकी यह खुशी पानी का बुलबुला साबित हुई। उसे लगा कि ये बाबू लोग रेलवे की सेवा के लिए नहीं लगाए गए, बल्कि इसे लूटने के लिए लगाए गए हैं। उसने देखा कि किस तरह से बाबुओं में अधिक-से-अधिक कमाने की होड़ लगी थी। हर दिन पार्टी होती। यह पार्टी वह बाबू देता जो उस दिन सबसे ज्यादा कमाई करता। उन लोगों के लिए रेलवे बिन मालिक की दुधारू गाय थी जिसे जो चाहे पकड़कर दुह ले। वही ज्यादा दूध पाने में सफल होता जो जितना ही दुहने की कला में अधिक प्रवीण होता। शुरू-शुरू में तो वह इन पार्टियों में शामिल होता रहा, मगर अब इन पार्टियों से उसे घिन आने लगी। उसे पार्टी और बाबू लोग ऐसे लगते जैसे गंदगी पर मक्खियाँ भिनभिना रही हों। उसे उबकाई आने लगती। उस दिन भी वह तमंचे तथा मिठाई नहीं ले रहा था, मगर पूरे स्टाफ के दबाव के आगे उसे झुकना पड़ा था। वैसे भी कहीं-न-कहीं उसके मन में यह भाव तो था ही कि जब वह इन वस्तुओं को घर ले जाएगा, घरवाले कितने खुश होंगे। उसकी आँखों के आगे किलकारी भरते भाई-बहन का चेहरा नाच उठा था। उसे तब अपनी स्थिति पर गर्व हो आया था। यह रेलवे स्टेशन ट्रांसिपमेंट प्वाइंट था। यहाँ बड़ी लाइन और छोटी लाइन दोनों थीं। यहाँ बड़ी गाड़ी का माल छोटी में और छोटी का बड़ी में लोड किया जाता था। राजू की नौकरी कभी अनलोडिंग में तो कभी लोडिंग में लगती थी। राजू चाहता था कि वह अपना काम लगन और ईमानदारी से करे, जिससे लोगों को सामान समय से और सुरक्षित मिल जाए। अन्य बाबू तथा लोडर भी यही चाहते थे, मगर अतिरिक्त पैसा कमाकर। उनका मानना था कि अतिरिक्त पैसे से कलम दुरुस्त चलती है तथा शरीर में ताकत तथा स्फूर्ति आती है। लोडर भी राजू की बात को हवा में उड़ा देते क्योंकि उसके अनुसार काम करने पर कमाई नहीं होती। वे लोग नौकरी कर रहे थे कमाई के लिए। इसीलिए उनकी निगाह हमेशा उन चीज-वस्तुओं पर अधिक रहती, जिसके मालिक के साथ रहने की संभावना होती। मसलन सूखी मछलियाँ, सीड्स, स्कूटर-मोटर साइकल अथवा लगेज टिकट के अन्य सामान। वे बाज की तरह अपने शिकार को पकड़ लेते या यूँ कहें कि शिकार खुद शिकारी के पास खिंचे चले आते, मुट्ठी गर्म करते और उनका माल राजू के ध्यान में आने से पहले ही चढ़ चुका होता। ऐसे में उसे लगता कि उसकी स्थिति लोडरों से भी गई-गुजरी है। मन में आता कि उन सामानों को उतरावा दे जो उसके आदेश के बिना चढ़ाए गए हैं। मगर उतरवाना संभव न था क्योंकि गार्ड को भी ऐसे सामानों को ले जाने में रुचि होती थी। कई बार मन में आया कि क्यों न उस कमाई में भागीदार हो जाए क्योंकि उसके काम पर दूसरे पैसे कमाते हैं। जो वह चाहता है वह तो होने से रहा।...जैसे भी हो वह इस कमाई में भागीदार नहीं बनेगा। दूसरों पर उसका क्या वश? खुद पर काबू रखे तो क्या कम है? लोडरों की बदमाशी के कारण ही उसकी ड्यूटी में तीन-चार बार ट्रेन लेट हो चुकी थी और उसे ‘मेमो’ भी मिल चुका था। पर कोई खास ऐक्शन नहीं लिया गया। हाँ, इतना जरूर हुआ कि अब उसकी ड्यूटी मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों पर नहीं लगती। राजू हर संभव प्रयास करता कि वह दूसरों की परवाह किए बगैर अपना काम करता जाएगा। मगर, क्या यह इतना आसान था? जब पूरा तालाब ही मगरमच्छों से भरा हो तो भला उनसे बचा जा सकता है क्या? एक दिन वह पकड़ में आ ही गया। वह जानता था कि वह ऐसी जगह है जहाँ सभी उसके दुश्मन हैं। सभी भेड़िए हैं और मुँह बाए खड़े हैं कि कब मौका मिले और मेमने को धर दबोचें। राजू नियमित ड्यूटी पर जाता। वह अपने स्टाफ के साथ चलने वाली लड़ाई को कभी केदारनाथ से न कहता। केदारनाथ भी बेटे से कम बात करते। वास्तव में बाप-बेटे में काम के अलावा कोई संवाद न था। पर केदारनाथ राजू के काम और व्यवहार के बारे में जानकारी हासिल करते रहते। यह जानकारी उन्हें आर.पी.एफ. के सिपाहियों-हवलदारों से मिलती। सभी राजू के काम और चाल-चलन की प्रशंसा करते। ऐसे समय केदारनाथ को लगता कि राजू के परमानेंट होने की मंजिल पास आती जा रही है। मगर राजू को काम करने में जरा भी मजा न आता। लगता जैसे वह जबरन बाँध दिया गया हो। वह उसी प्रकार काम किए जा रहा था जिस प्रकार अनायास जीवन गुजरता है। जीने वाले को यह भी पता नहीं होता कि वह क्यों जी रहा है? किस लिए जी रहा है? जीवन की गाड़ी जो सँभल-सँभलकर फासले तय कर रही थी, अचानक उसमें ब्रेक लग गया। राजू समझ भी न पाया कि यह ब्रेक कैसे लगा?...वह सामने बैठा था सब-इंस्पेक्टर के, जो उससे जवाब-सवाल करने आया था। वह समझ ही न पा रहा था कि उससे जवाब-तलब क्यों किया जा रहा है? उसने ऐसा क्या किया, जिसके लिए उसे जवाब देना पड़े?...फिर ऐसा क्या है जिसे वह समझ नहीं पा रहा?...कहीं वह स्टाफ वालों की चाल तो नहीं?...मगर वे ऐसा क्यों करेंगे? उसने किसी का क्या बिगाड़ा है? उसका मस्तिष्क अपनी तीव्रतम गति से कार्य कर रहा था। तभी सब-इंस्पेक्टर की आवाज उसके कानों से टकराई– “अरे, केदारनाथ का बेटा भी तो यहीं नौकरी करता है न।...क्या नाम है?...” राजू बोले इसके पहले ही खुद सब-इंस्पेक्टर बोला– “राजेन्द्र। हाँ, यही नाम है...कहीं तुम्हीं तो नहीं हो?” सब-इंस्पेक्टर अपनी याददाश्त पर गर्व महसूस कर रहा था। “हाँ, मैं ही केदारनाथजी का बेटा हूँ। नमस्ते।” राजू का डर न जाने इतने में कहाँ बिला गया। राजू समझ ही न सका कि उसका डररूपी पत्थर सब-इंस्पेक्टर के पहले वाक्यरूपी द्रव में कैसे और कब गल गया। “कहाँ तुम फँस गए? जरा सँभलकर नौकरी किया करो। नहीं तो कभी...अच्छा छोड़ो। तुम चिन्ता न करो।...मैं जवाब लिख देता हूँ। वैसे तो तुम्हारी साइन की जरूरत नहीं, फिर भी कर दो।...चिन्ता मत करना। कुछ भी नहीं होगा।” सब-इंस्पेक्टर से राजू को पता चला कि उसके द्वारा सील किए वैन से पार्सल उतारते समय एक पेटी टूट गई जिसमें से ईंटें निकलीं। बहुत जोर देने पर राजू को याद आया कि उसने छोटी गाड़ी से माल उतरवाकर सीधे बड़ी गाड़ी में लोड करा दिया था। उस दिन तो वे पार्सल उसके स्टेशन पर मुश्किल से डेढ़-दो घंटे रहे थे। चढ़ाते समय भी तो सभी पेटियाँ बराबर थीं क्योंकि उसने खुद सभी पेटियों को चेक कर अपने सामने ही लोड कराई थी। फिर उस पेटी में ईंटें कहाँ से आईं?...उसे खयाल आया, हो-न-हो बुकिंग स्टेशन पर ही ऐसा हुआ हो। अन्य बाबू लोग यही तो चाहते थे। अब तो राजू की ड्यूटी में चोरी का प्रमाण बढ़ने लगा। राजू हर संभव कोशिश करता कि वह अपने काम से जरा भी न चूके, फिर भी चोरी हो ही जाती। अब राजू को पूरा विश्वास हो गया था कि बाबू लोग उसे अपने रास्ते का काँटा समझते हैं। इसीलिए तो राजू जब पास से गुजर रहा होता तो आपस में बातें करते बाबू चुप हो जाते और तरह-तरह के इशारे करते। राजू भी अब उन लोगों के बीच नहीं जाता। स्टेशन जैसी भीड़ भरी जगह पर भी वह एकदम अकेला था। अक्सर राजू ड्यूटी पर जाते समय गार्ड के कंपार्टमेंट में बैठता। वह गार्ड से रसीदें लेकर छाँट रहा था क्योंकि गार्ड से सामानों का चार्ज उसे ही लेना था। अगले जंक्शन पर उसी के स्टेशन पर पोस्टेड सब-इंस्पेक्टर वर्गीस बैठे। वे राजू को पहचानते थे। दुआ-सलाम और केदारनाथ की हाल-चाल पूछने के बाद वे समझाने लगे कि चोरियाँ कौन करता है और कैसे करता है। इन्हीं बातों में राजू इतना डूबा कि उसे पता ही न चला कि उसका स्टेशन आ गया। वर्गीस अपने ऑफिस की ओर चले और राजू गार्ड से चार्ज लेने लगा। सभी पार्सल और सामान प्लेटफार्म पर उतारे जा चुके थे। गाड़ी का रैक यार्ड में खींचा जा चुका था। राजू पार्सलों और अन्य वस्तुओं को उनके स्टेशन के हिसाब से अलग-अलग रखवा रहा था। तभी उसे मारने, पीटने, चीखने और गालियों की आवाज सुनाई दी। उसने मुड़कर देखा तो दो सिपाही एक लोडर को रस्सी से बाँधे और मारते, पीटते, गरियाते चले आ रहे थे। सभी लोग आँखें फैलाए उसी ओर देख रहे थे। उन सिपाहियों के साथ सब-इंस्पेक्टर वर्गीस भी थे। उन लोगों के पास आ जाने पर राजू ने देखा कि लोडर के हाथ में एक गठरी है और वह रो रहा है।...अरे, यह तो उसके पास ही काम कर रहा था। अभी तो पाखाना जाने के लिए कहकर गया था।...अच्छा, यह बात है। इसने पाखाना जाने का बहाना किया था। कहीं वह खुद भी तो नहीं फँस जाएगा? लोडर ने कहीं उसे भी शामिल कर लिया तो!...नहीं नहीं। उसके कहने से क्या होता है? वर्गीस अंकल हैं। उसका कुछ भी नहीं होने वाला। पास आते ही वर्गीस ने कहा– “देखा न! अभी सुबह ही तुमको बता रहा था कि कौन चोरियाँ करते हैं।...तुम्हें पता है कि इसने कब और कैसे चुराया? ये देखो। ये बनारसी पान! जानते हो इसकी कीमत?...ढाई-तीन सौ से कम का नहीं है, मगर यह स्साला अभी सत्तर-पचहत्तर में बेच मारता और पीकर कहीं धुत् पड़ा रहता।” वर्गीस के आदेश पर उस लोडर ने ही उन पान की टोकरियों में से वह टोकरी निकाली जिसमें से उसने चुराया था। टोकरी सील की गई और लोडर का चालान हो गया। उस दिन से राजू लोडरों को जहरीला बिच्छू दिखाई देने लगा। अब लोडर और बाबू मिलकर इस बिच्छू के डंक को ही काट देना चाहते थे क्योंकि बिच्छू को मारना उनके लिए सरल न था। राजू की घेराबंदी का प्रयास शुरू हो गया। उन लोगों को लगा कि आज बिच्छू खुद उनके घेरे में आ फँसा है। काँटे का क्लर्क, जिसका काम पार्सलों की बुकिंग तथा अपने स्टेशन का माल चार्ज में लेना है, राजू से एक गठान चार्ज में लिया। वह गठान ढीली तथा एक ओर छेदवाली थी। काँचे वाले क्लर्क ने राजू के रजिस्टर में रिमार्क लगा दी कि गठान ढीली तथा एक ओर छेदवाली है। मगर राजू ने उस गठान को तौल कराया और क्लर्क से लिखवा लिया कि रसीद के बराबर इक्यावन किलो माल मिला। जब बाबुओं को लोडरों से पता चला कि राजू गार्ड के रजिस्टर में रिमार्क देना भूल गया है तब उन्होंने निर्णय किया कि क्यों न गठान को और ढीली तथा छेद को और बड़ा कर दिया जाए? व्यापारी को माल छुड़ाते समय वह गठान पचास किलो की ही मिली। लिहाजा उसने ओपन डिलिवरी की माँग की। पंचों के सामने ओपन डिलिवरी हुई जिसमें से एक शाल कम निकली। व्यापारी ने नुकसानी का दावा कर दिया। उस व्यापारी के लिए शाल की कोई अहमियत न थी, मगर बाबुओं के कहने पर उसने ऐसा किया था। बाबू और लोडर खुश थे कि अब राजू बचने वाला नहीं। नौकरी तो जाएगी ही सजा भी मिलेगी। स्साले, नौकरी करना कैजुअल में और दिमाग दिखाना साहबों का। राजू की खुशनसीबी कहिए या सावधानी, जहाँ वह गार्ड के रजिस्टर में रिमार्क देना भूल गया था वहीं उसने तार रजिस्टर में उस गठान के ढीली और उसमें छेद होने का तार दर्ज कर दिया था। अधिकतर बाबू लोग अपनी सुरक्षा के लिए तार रजिस्टर में तार की प्रतिलिपि दर्ज कर पहली कॉपी फाड़कर फेंक देते हैं। ओपन डिलिवरी के बाद काँटेवाले बाबू का ध्यान तार रजिस्टर पर गया। उसने देखा कि उस गठान का तार उसी दिन तथा गार्ड से चार्ज लेने के तुरंत बाद कर दिया गया है। जिसमें लिखा था– “रिसिव्ड फिफ्टी वन अगेंस्ट फिफ्टी वन। बट लूज एण्ड वन साइड होल” बाबू घबरा गया और झट से ‘फिफ्टी वन’ को ‘फिफ्टी’ कर दिया। एक को शून्य बना दिया। राजू के रजिस्टर में पहले ही सुधार कर चुका था। अब उसे तसल्ली हुई। पुलिस इन्क्वायरी हुई। राजू और काँटेवाले क्लर्क का स्टेटमेंट लिखा गया। दोनों जगह सुधार होने के कारण शक काँटेवाले क्लर्क पर हुआ और वह अरेस्ट कर लिया गया तथा नौकरी से सस्पंड कर दिया गया। अब तो खुल्लेआम पूरा स्टाफ राजू के खिलाफ हो गया। सभी कहते कि अगर राजू चाहता तो वह बाबू बच जाता। राजू का तो कुछ होनेवाला नहीं था। इस घटना के बाद राजू घर पर भी सुन्न-मुन्न रहता। केदारनाथ को इस घटना की जानकारी इन्क्वायरी इंस्पेक्टर से हुई। वह राजू की ईमानदारी की खूब प्रशंसा कर रहा था, जबकि इंस्पेक्टर के हर वाक्य केदारनाथ पर कहर बरसा रहे थे। वे अंदर-ही-अंदर राजू पर तिलमिला रहे थे। उस समय अगर राजू को पाते तो उसकी हड्डी-पसली एक कर देते। उन्होंने घर आते ही राजू को खूब लताड़ा। नौकरी इसी तरह की जाती है? उस बाबू ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था? पता है, यदि उसकी नौकरी गई तो उसके बीबी-बच्चों पर क्या बीतेगी? फिर कुछ शांत हो उसे समझाने लगे– “जरा समझदारी से काम लिया करो। अब बच्चे नहीं हो। अपने स्टाफ का विरोध करना अच्छी बात नहीं।...स्कूल और नौकरी में फर्क है।” राजू बहुत समझने की कोशिश करता मगर समझ ही न पाता। वह अभी तक यह जान ही न पाया था कि आखिर पिताजी चाहते क्या हैं।...क्या उसे वही करना है जो पिताजी चाहते हैं?...तो क्या वह यंत्रमानव है?...नहीं नहीं। वह यंत्रमानव नहीं है। वह मांस और हड्डियों से बना एक आदमी है। जिसमें खून दौड़ रहा है। जिसमें धड़कन है। जो अच्छे और बुरे को समझने की शक्ति रखता है। माँ समझ ही न पाती कि उसका बेटा राजू नौकरी पर क्यों नहीं जाता? पूछने पर वह उसे बता देता– “आजकल जगह खाली नहीं है।...जानती नहीं कि मैं कैजुअल हूँ।” केदारनाथ को पत्नी से पता चला कि राजू आजकल नौकरी पर नहीं जाता। सुनते ही वे पत्नी पर बरस पड़े। राजू को हाँक लगाई, मगर राजू घर पर नहीं था। सुबह केदारनाथ रात के राउण्ड से आए। उनका चेहरा तमतमाया था। आते ही दहाड़े– “राजू, इधर आओ।” राजू बिना किसी झिझक के पिताजी के सामने आकर खड़ा हो गया। “काम पर नहीं जाते?” उनकी आँखों से चिनगारी बरस रही थी। लगता था, वे उस चिनगारी से राजू को डराना चाहते थे। “नहीं।” राजू की आवाज में कहीं भी कोई कम्पन न था। पहले की तरह उसकी नजर भी जमीन की ओर न थी। उसने केदारनाथ की आँखों-में-आँखें डालकर जवाब दिया। केदारनाथ के क्रोध को जैसे हवा मिल गई। मगर राजू की नजरों में न जाने उन्हें क्या दिखा कि वे अंदर से काँप गए। फिर भी अपनी पूरी शक्ति जुटाकर बोले– “क्या कहा? तो घर में पड़े-पड़े खाट तोड़ोगे?...मैं ही जिंदगीभर तुम्हारा बोझा ढोऊँगा? क्या मुझे घोड़ा समझ लिए हो?” फिर नरम पड़कर पूछे– “क्या बात है? क्यों नहीं जाते? कुछ कहो भी तो...” “मैं उन चोरों के साथ काम नहीं कर सकता। वहाँ बिना चोरी किए नौकरी नहीं की जा सकती। वे लोग किसी-न-किसी तरह मुझे फँसाना चाहते हैं।...आपने ही तो कहा था न कि चोरी-घूस अब कभी लिए तो अच्छा न होगा।” राजू ने जैसे अपना निर्णय सुनाकर केदारनाथ के मुँह पर उन्हीं के हाथ का थप्पड़ मारा हो। सोते में जैसे किसी ने कान में सींक फिराया हो और उनका ही पंजा उनके गाल से जोरों से टकराया हो। केदारनाथ अवाक् रह गए। उनका पूरा शरीर झनझना उठा। चेहरे का तेज न जाने कहाँ गायब हो गया। उन्हें लगा जैसे उनके बेटे ने उनके द्वारा बनाए पोताड़े को उनके ही मुँह पर पोताड़ दिया हो और सूखने के बाद चूड़ी अथवा दावात से घिसकर चमकाने की कोशिश कर रहा हो। वे खुद को अपने बेटे के सामने नंगा पा रहे थे जिसे देखकर उनका ताली पीट-पीटकर गाते हुए हँस रहा है– गाँड़ खुल्ली गाँड़ खुल्ली भूसा भरी। बगिया में जइबऽ ते कोको धरी।। चकई ना देब हिलल करी। बढ़ई बोला देब ठोंकल करी।। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रेहन पर रग्घू

जाल