भूख

भूख आज कालीप्रसाद बहुत ख़ुश है। पता नहीं, किसका मुँह देखकर उठा है। सबेरे-सबेरे ही किसुनदेव पंडित न्यौता माँग गये हैं। घरजनवाँ एक जन। पर, गाँव में सभी लोग ब्राह्मण के रूप में न्यौता खाने नहीं जाते। वे इस प्रकार के भोजों में शामिल होने वालों को अपने से निम्न समझते हैं। प्रायः इस प्रकार के भोजों में शामिल होने वाले ग़रीब हैं। पर, ये लोग अक्सर कहा करते हैं– “अगर ब्राह्मण ही जज्ञ-प्रयोजन अथवा जनम-मरण पर खाने नहीं जाएगा, तो लोगों का उद्धार कैसे होगा!” काली के पिता कलकत्ता में नौकरी करते हैं। काली और शिवा ही अपने घर के सवाँग हैं। अतः इन दोनों में से ही कोई एक सामाजिक कार्यों में अपने पिता का प्रतिनिधित्व करता है। न्यौता खाने तो दोनों जाना चाहते हैं, पर एक ही जन की ‘अज्ञा’ होने के कारण एक को मन मारना पड़ता है। अतः दोनों में पारी बँधी है। काली, शिवा से दो बरस छोटा है। पिछली बार शिवा गया था, इसलिए अपनी पारी आने के कारण काली बहुत ख़ुश है। काली को लगता है कि आज वह गाँव के दूसरे लड़कों से सयाना हो गया है। इसलिए बड़े-बूढ़ों के साथ उसे भोज में जाना है। ऐसा आज ही नहीं, जब भी उसे किसी भोज में जाना होता है, लगता है। प्रायः बचपन में ऐसा होता है कि बच्चे, बड़े-बूढ़ों की बातें बड़े चाव से सुनते हैं। उम्र में अधिक दिखने का प्रयास करते हैं। उनकी हर कोशिश होती है कि लोग उन्हें सयाना समझें। वे अपनी उम्र के बच्चों के साथ किसी भी त्यौहार अथवा दूसरे कार्यक्रमों में खेलना पसंद नहीं करते, अपितु अपने से बड़ों के बीच ही दिखाई पड़ते हैं। वैसे तो हमेशा काली को पिताजी से शिकायत रहती है कि वे दूसरे लड़कों के बापों की तरह घर पर नहीं रहते। पर, आज वह अपने पिता की गैरहाजिरी से ख़ुश है। क्योंकि अपने पिता के रहने के कारण ही अन्य लड़के न्यौता खाने नहीं जा पाते। पिताजी के न रहने पर ही तो उसका नम्बर लगता है। किसुनदेव पंडित की बात अलग है। वे ‘यजमानी’ करते हैं। बेहद ख़ुशी के कारण काली दोपहर को भरपेट न खा सका। यदि अभी भरपेट खा लेगा, तो न्यौते में क्या खाएगा? उसे शिकायत है बड़े-बूढ़ों से। जो जल्दी-जल्दी दही-चिउड़ा सुड़क जाते हैं। यह नहीं देखते कि उनके साथ एक छोटा लड़का भी है। वह मन-ही-मन कहता– “थोड़ा और बड़ा हो जाने दो। फिर दिखा दूँगा कि कैसे न्यौता खाया जाता है।” अक्सर वह खाने में पिछड़ जाता है। बड़े-बूढ़े पत्तल से नीम की सींक निकालकर खरिका करते होते, तब कहीं उसका खाना समाप्त होता। फिर भी उसे जल्दबाजी तो करनी ही पड़ती। लगता था कि सभी न्यौतेबाज लोग ‘मेहरारू का नहान और मरद का खान’ वाली कहावत में विश्वास करते थे। जबकि काली इसके ठीक उल्टा था। खरिका करते-करते कोई कहता– “पातर डेहरी अन्ने के खानि। अरे भई, कौन है? पेट नहीं भरा तो कम-से-कम मुँह भी नहीं दूखा!” ऐसे समय उसे इतना गुस्सा आता कि मन करता, पत्तल उठाकर उस आदमी के मुँह पर दे मारे। काली सोच रहा था कि जैसे ही दही आएगी वह उसे चिउड़े में ही ले लेगा। चिउड़ा भिगोएगा नहीं। आजकल के चिउड़े में दम ही नहीं होता, और दही तो कहने के लिए होती है। पत्तल के बाहर बहती है। बड़ी मुश्किल से रोकना पड़ता है। माठा भी उससे गाढ़ा होता है। वह किसी को देखेगा नहीं और सबसे पहले शुरू हो जाएगा। माँ का कहा नहीं मानेगा। माँ भी क्या है। कहा करती है– “काली बेटा, नेवते में सबसे पहले मत खाना। दोस लगता है।” वह समझ नहीं पाता कि ऐसा क्यों है? पहले खाओ या बाद में, क्या फर्क पड़ता है। माँ ऐसी ही है। रामलीला में कहेगी कि राम मत बनना। होली में कहेगी कि ‘सम्मति’ में आग मत लगाना। ऐसा क्यों? राम तो भगवान हैं न। धर्म के अवतार हैं न। उन्होंने रावण जैसे पापी का वध किया था और अहिल्या जैसी नारी का उद्धार। होलिका तो राक्षसिन थी। उसका नाश करना तो अच्छा काम है। पर, माँ ऐसा करने से मना क्यों करती है? कैसी बात है कि जिसे हम आदर्श मानते हैं, उसके द्वारा किये गये कार्यों को करने से दोष लगता है। आजकल के नेवतों में अब दही-चिउड़ा मिलना बंद-सा हो गया है। अब किसी में भी वह शौक ही न रहा। मजबूरी में खिला रहे हैं। समाज में इज्जत जाने का डर जो है। जो भी हो, पूड़ी-सब्जी तो मिलेगी ही। वह भी खाये बहुत दिन हो गये। इतना सोचते ही उसे उनवल के बाबू साहब की माँ के ब्रह्मभोज में खाये खाने की याद आ गई। ऐसा आदमी चाहिए। ठीक ही तो लोग उन्हें राजा साहब कहते हैं। जैसे घर धन से भरा है वैसा ही बड़ा दिल पाया है। कितने सारे ब्राह्मणों को खिलाया था। ब्राह्मण ही क्या, जवारभर के नान्ह जाति से लेकर बनिये-बक्कालों तक को खिलाया था। पर, सरया के बाभनों को सबसे पहले खिलाया था। बड़े लोग जानते हैं कि किसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए। जैसे ही कौवाडिल के भाँट को देखा, पंगति से उठा दिया। खुद सरया के तिवारियों का गोड़ धोए। सबको पीढ़े पर बिठाया। फूलों की मालाएँ पहनाईं। टीका लगाया तथा एक-एक गिलास दिया और हाथ जोड़कर बोले– “आप बाभन देवता लोग मुझे मातृ-ऋण से मुक्त करें।” किसुनदेव पंडित ने सबसे पहले कौर उठाया और बाबू साहब मातृ-ऋण से मुक्त हो गये। खाने के बाद इलायची वाला पान मिला। वह भी एक नहीं, एक जोड़ा। बाबू साहब ने बाभनों से कहा– “आप सरया के बाभन लोग, जरा इस खटिया पर बैठ जाएँ। जिससे कोई दक्षिणा के बिना न रह जाए। नहीं तो विश्वामित्र की तरह दक्षिणा में क्या और कब माँग बैठें।” ऐसा सुन सब हँस पड़े थे और बाबू साहब की खातिरदारी और दरियादिली की प्रशंसा करने लगे थे। बाबू साहब के यहाँ ही काली को पहले-पहल बड़े-बुजुर्गों के बराबर दक्षिणा मिली थी। नहीं तो हर जगह उसे लड़का मानकर औरों से कम दक्षिणा दी जाती थी। ऐसे समय वह अपने छुटपन पर कुढ़ता। काश, वह भी बड़ा होता तो सबके बराबर दक्षिणा पाता। फिर भी उसे इस बात का गर्व था कि उसने बाभन के यहाँ जनम लिया है। वह पूजनीय है। वह लोगों का उद्धार कर सकता है। स्कूल में भी काली नेवते के खयाल में ही डूबता-उतराता रहा। इसीलिए आज उसे पंडीजी का सोटा भी खाना पड़ा। उसने उस सोटे से मार खाई थी जिसे उसने खुद ही छील-बनाकर उन्हें दिया था। हुआ यूँ था कि पंडीजी ने काली से कुछ सवाल पूछा था, पर ध्यान कहीं और होने के कारण वह जान ही न सका था कि उससे क्या पूछा गया है। उसके जवाब न देने पर पंडीजी ने मारते-मारते कहा था– “करे कलिया, मन मोर इहवाँ चित्त भुसउले?” उसे पंडीजी की मार का दुख नहीं था। दुख तो था उनके इस वाक्य का। उसे लगा था कि जैसे पंडीजी उसके मन की बात जान गये हैं। काली के लिए आज का दिन बीत ही नहीं रहा था। लगता था, जैसे समय ही ठहर गया हो। स्कूल से घर आने के बाद वह बार-बार दुआरे की ओर देखता कि कब किसुनदेव पंडित दिखें और सबको हाँक लगायें चलने को। कई बार ऐसा भी लगा कि कहीं ‘विजय’ हो तो नहीं गया! पर, तुरंत मन कहता– “नहीं, अभी नहीं हुआ। नहीं तो, अब तक किलकिलाहट हो जाती।” काली के पिता बृजमोहन–जो गाँव में बिरजू नाम से जाने जाते थे–कलकत्ता में किसी पेढ़ी में काम करते थे। जब भी आते हैं, गमकउवा तेल और साबुन लाते हैं। सभी के लिए कपड़े लाते हैं। पर, सबके लिए एक-एक और माँ के लिए दो लाते हैं। हाँ, चम्पा के लिए भी दो लाते हैं। इनके लिए तो रीबन, क्लिप तथा और भी कई चीजें लाते हैं। गाँव आने पर भी पिताजी घर पर रहते ही नहीं। गाँव के लोग कहते हैं– “बिरजू दिलेर इन्सान है। कमाता है, तो खर्च करना भी जानता है।” काली के पिता गाँव में जब तक रहते हैं, हर रोज कुछ-न-कुछ बाजार से जरूर लाते हैं। वह भी स्कूल जाता है, तो गमकने लगता है। लगता ही नहीं कि वही कालीप्रसाद है। माँ भी, जब तक पिताजी रहते हैं, तब तक अच्छे-अच्छे भोजन पकाती है। ठीक उसी तरह से जिस तरह से पहुना के आने पर पकता है। पिताजी भी तो मेहमान ही हैं। वे भी तो पहुना की तरह ही रहते हैं। वैसे ही कपड़े पहनकर, उन्हीं की तरह से मिठाई और फल लाते हैं। और एक दिन फिर– “ठीक से पढ़ना। अपनी माँ को हैरान मत करना, नहीं तो आने पर बड़ी पिटाई करूँगा।” कहकर चले जाते हैं। काली पिताजी से उसी तरह शरमाता है जिस तरह पहुना से। पहुना जब भी घर आते हैं, काली और शिवा ख़ुश हो जाते हैं जबकि माँ की जान निकल जाती है। पहुना के आने से घर का संतुलन ही बिगड़ जाता है। काली को माँ से हमेशा शिकायत रहती है कि वह पहुना के लिए अच्छा-अच्छा खाना बनाती है, जबकि उसके लिए कभी नहीं। हमेशा यही कहती है कि फलाँ त्यौहार को बनेगा। अच्छा खाना किसी-न-किसी त्यौहार को बनाया जाता है और भगवान को खिलाकर खाया जाता है। उसे याद है, माँ होली-दीवाली-नेवान को ही अच्छा खाना बनाती है और सबको खिलाती है। नहीं तो, अधिकतर दूसरे त्यौहारों को खाना प्रसाद के रूप में ही मिलता है जबकि पौनी-परजा को अच्छा खाना पूरी थाली भरकर देती है। माँ जब भी काली मैया अथवा दूसरे देवी-देवताओं की कड़ाही चढ़ाती है, तब दो सोहारी और लपसी दे देती है, जिसे वह हाथ में लेकर खाता है। और माँगने पर माँ का जवाब होता है– “यह परसाद है न। परसाद थोड़ा ही खाया जाता है। परसाद से पेट नहीं भरा जाता।” उस समय बैठा वह इस फिराक में रहता है कि शायद माँ एक सोहारी और दे दे। इसलिए बैठे-बैठे अँगुली चाटता है। पर माँ है कि देती ही नहीं। बड़ी कठोर है माँ। काली यह जानता है कि माँ उसकी बात को टालती ही है। पर उसे इस बात से आश्चर्य होता है जब माँ पहुना के जाते समय उन्हें एक ‘पियरी’ और कुछ रुपये बिदाई में देती है। वह समझ नहीं पाता कि ऐसे समय पैसा कहाँ से आ जाता है। जरूर ही माँ उसे नहीं मानती। यदि मानती तो क्या ‘बरफ’ और ‘मसलपट्टी’ के लिए पैसे न देती? काली को ध्यान आया कि वह कौन-से खयालों में खो बैठा। तभी किसुनदेव पंडित आते दिखे, जो लोगों से जल्दी चलने को कह रहे थे– “यहाँ से दू कोस जमीन चलनी है। सभी लोग जल्दी से तैयार हो जाएँ।” और काली को देखकर उससे बोले– “कालीपरसाद, सिवपरसाद से कह दो कि जल्दी आ जाए। हाँ, लोटा लेना न भूले।” काली को शिवा का बुलाया जाना बेहद खला। शिवा जाए या काली, किसुनदेव को इससे क्या? वह भी तो जनेउ वाला है और न जाने कितना नेवता खा चुका है। किसुनदेव का काम केवल ‘अज्ञा’ माँगना और ‘बिजय’ कराना है। यह निश्चित करना हमारा काम है कि मुझ में और शिवा में से कौन जाए। जब देखो तब शिवा! शिवा! वह पहले पैदा क्यों नहीं हुआ? उसे अपने छोटे होने पर बहुत दुख हुआ। पर, किया ही क्या जा सकता था! लिहाजा हथियार डाल तुरंत घर में माँ के पास पहुँचा। माँ बटुली रखिया रही थी। दादी माँ भुजिया कर रही थीं और चूल्हे में अरहर का पत्ता झोंक रही थीं। पूरा घर धुएँ और दुर्गंध से भर गया था, क्योंकि अरहर के पत्ते के साथ आदमी का सूखा गू चिपरी के रूप में आ गया था। दादी माँ की आँखें चूल्हे को बार-बार फूँकने के कारण लाल-लाल हो गई थीं, जिससे आँसुओं की धार निकल रही थी। लगता था, जैसे दादी माँ ने अपनी आँखों में भड़भाड़ का दूध डाल लिया हो। भुजिया धान कभी मशीन पर कुटाने नहीं जाता, क्योंकि अपवित्र हो जाता है। इसलिए माँ और दादी मिलकर ओखली अथवा ढेंके में कूटती हैं। पिछली बार कूटते समय दादी माँ की अँगुली ढेंके के नीचे आ गई थी और कट गई थी। माँ इसके लिए खुद को जिम्मवार ठहराती हुई कोसती थी। काली को जाने की हड़बड़ी थी। खोजने पर भी बड़का लोटा–जो उसके ननिहाल से मिला था–नहीं मिल रहा था। लोटा बड़ा रहने पर काफी आराम रहता है। बार-बार पानी माँगना अच्छा नहीं। बड़े लोटे में एक बार पानी भर लो, तो पीने के साथ-साथ हाथ भी धुल जाता है। साथ ही यदि मौका मिले तो दस-बीस पूरियाँ भी आसानी से भर लो। काली को याद है कि किस तरह किसुनदेव का बेटा अपने पैजामे में पचीस-एक पूरियाँ लाया था। वह ऐसा नहीं करेगा। बड़के लोटे में बीसेक पूरियाँ तो ऐसे ही समा जाएँगी। किसी को पता ही न चलेगा। जब माँ ने कहा– “वह छोटका लोटा ही लेते जाओ।” तब उसे बड़ा गुस्सा आया। घर में कोई सामान ठीक से रखा ही नहीं जाता। ऐसा नहीं कि हर सामान व्यवस्थित रखा जाए। अभी सभी चले जाएँगे, तो वह क्या करेगा? माँ को क्या हो गया है! क्यों नहीं जल्दी से लोटा खोजकर दे देती? अंगोछा भी नहीं मिल रहा। नहीं जानती कि वहाँ कपड़ा निकालकर खाना होता है? जब जानती है कि आज न्यौता खाने जाना है, तो अंगोछा और लोटा खोजकर रखना चाहिए। चम्पा काली की छोटी बहन है। वह घर में इधर-उधर अंगोछा और लोटा ढूँढती है। पर, वह रहे तब न मिले। शिवा, चम्पा को लालच देकर चुपके से अंगोछा और लोटा लेकर चला गया है। उसने चम्पा को वचन दिया है कि अब की बार वह उसके लिए पूरिया लाएगा। इसीलिए चम्पा ने खुद ही अंगोछा और लोटा शिवा को चुपके से दे दिया था। वह इधर-उधर हाथ-पैर मारने के बाद बोली– “माई रे, लगता है कि बड़के भइया अंगोछा और लोटा लेकर गये हैं। कहीं खुद ही तो नेवता खाने नहीं गये? मैंने चुपके से कुछ ले जाते देखा है।” काली को कतई विश्वास नहीं हो रहा था। वह खुद घर में अंगोछा और लोटा ढूँढने लगा। और न पाने पर खाली हाथ ही जाने लगा, जिससे गाँव वालों का साथ न छूट जाए। उसे जाते देख, माँ ने डाँटा– “कहाँ जात हवे रे, कलिया? रुकु। शिवा गया है। अब तुम नहीं जाओगे। जगहँसाई करानी है कि कैसे भिखमंगे लोग हैं, ‘अज्ञा’ एक का था और आए दो!” काली का मन नहीं मानता कि शिवा गया होगा। और गया है, तो क्या हुआ? पारी उसकी थी। इसलिए वह जाएगा ही। काली ने माँ से कहा– “मैं जाऊँगा। अबकी मेरी पारी थी।” और घर से निकल पड़ा। दरवाजा पार करने को हुआ कि माँ ने दौड़कर पकड़ लिया। भागते समय अगर वह दरवाजे से न टकराता, तो माँ उसे न पकड़ पाती। गुस्से में माँ ने दो-चार थप्पड़ भी लगाए। डाँटा-फटकारा। ‘कुछ पकाने’ का आश्वासन दिया। साथ ही सहन करने का पाठ पढ़ाया और कहा– “आने दो, शिवा को। अबकी उसकी खूब पिटाई करूँगी।” पर, पेट की आग में तो सारे ज्ञान और विचार स्वाहा हो जाते हैं। काली रोता रहा। सुबकता रहा।...इस संसार में कहीं भी न्याय नहीं। उसका इस संसार में कोई नहीं। माँ, शिवा को ज्यादा चाहती है, तभी तो पहुना के आने पर उसी को उनके साथ खाने पर बिठाती है। माँ को अपनी मजबूरी पर रोना आ रहा था। वह कैसी अभागिन है कि अपने लाड़लों को ढंग का खाना भी नहीं खिला सकती। घर में तिउराइन बनी बैठी है। तीज-त्यौहार पर अच्छा खाना पौनी-परजा को देती है, जिससे पटिदारों के खानों से उसका खाना हल्का न हो। पौनी-परजा ही किसी की इज्जत को फैलाते हैं। वे खुश रहें, तो घर-घर जाकर गुन गाते हैं।... मौका पाते ही अबकी काली निकला, तो नजर ही न चढ़ा। माँ बौखला उठी। चम्पा से पूरा गाँव खोजवाया, पर कहीं भी काली की परछाई तक न दिखी।...हो-न-हो कलमुँहा, नेवता खाने ही न गया हो। ये कपूत बरसों की सँजोई इज्जत को खाक में मिला देंगे। नहीं, वह ऐसा नहीं होने देगी। “आने दो। लौटकर तो आएगा न। ऐसी खबर लूँगी कि जिनगीभर याद रक्खेगा। एक वो हैं, जो अपने तो शहर में गुलछर्रे उड़ा रहे हैं और अपने इन दो मूसरों को मेरी छाती पर मूँग दरने के लिए छोड़ गये हैं।”–माँ चीखती-कुढ़ती रही। “बिरजू को क्यों गरियाती हो? उस बेचारे ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? उस मरकिनवना सिउवा को नहीं जाना था। वही है इस फजीहत की जड़। ई नाही होये पाई कि खेत खा गदहा और मारल जा जोलहा।”–दादी माँ ने माँ का विरोध किया। काली, पहले तो दौड़ा क्योंकि उसे विश्वास था कि गाँव वाले अभी बहुत दूर नहीं गये होंगे। इन्सान के मन की सबसे बड़ी ख़ूबी है कि वह आसानी से नकार में नहीं सोचता। दौड़ते-दौड़ते काली को हँफरी छूट गई, फिर भी गाँव वाले न मिले। मिलने की कौन कहे, उनकी आहट तक न सुनाई दी। वह सुस्ताना चाहता था, पर डर इस बात का था कि कहीं पिछड़ न जाए। काली इसी विश्वास से चलता जा रहा था कि पंगत उठने तक तो पहुँच ही जाएगा। ऐसा थोड़े है कि दरवाजे पहुँचे और तुरंत ही खाने पर उठा दिये गए। काली की हालत उस मुसाफिर जैसी थी, जो यह जानता है कि वह लेट हो गया है, फिर भी जल्द-से-जल्द स्टेशन पहुँचने की कोशिश करता है। वास्तव में, तो अब काली चल भी न पाता था, दौड़ने की कौन कहे। पूरे हुमास में तो वह पहले ही दौड़ चुका था। ऊपर से दिनभर की भूख और मार थी, जिसके कारण उसका पूरा जिस्म थकान और अशक्ति से भर गया था। पैर उठने का नाम ही न ले रहे थे। जबकि काली अपनी जान तेज चलने की कोशिश कर रहा था। इस अंधेरी रात में भी काली ऐसे चला जा रहा था, जैसे यह रास्ता और नहीं, बल्कि उसके घर का रास्ता हो। आज उसे भूत-प्रेत भी न दिखाई दे रहे थे। जबकि और समय होता, तो वह रात में दुआरे पर भी अकेला न जाता। आखिरकार, काली को अपने गाँव वाले न दिखे, तो न ही देखे। पर, वह घर दिख ही गया, जहाँ उसे जाना था। उस अंधेरे में भी उस घर पर रोशनी थी। भीड़-भाड़ थी। चहल-पहल थी। जैसे-जैसे काली उस घर के पास आता जाता, उसके दिल की धड़कन बढ़ती जाती। दिमाग़ में बवंडर तेज होने लगता। अब काली वहाँ खड़ा था,जहाँ से कुछ ही दूरी पर शिवा गले में माला पहने पान चबाते खाट पर बैठा पैर हिला रहा था। काली को लगा कि उसके मुँह में पान की गिलौरी नहीं, मांस का टुकड़ा है। और होठों पर पान की लाली नहीं, ख़ून की लाली है। पहले तो उसे शिवा पर क्रोध आया, फिर घृणा आई। अचानक शिवा को लगा कि यहाँ काली भी मौजूद है। आँखें पोंछकर देखा, तो सचमुच, वहाँ काली को ही खड़ा पाया। वह सिहर गया। फिर उसे याद आया कि वह काली से बड़ा है।...उसकी आँखों में अंगारे दहकने लगे। भौहें तन गईं। वह ऐसा दिख रहा था, मानो नरमुण्डों की माला पहने काली माँ मर्दाना रूप धर बैठी हों। पर, काली पर इसका कोई असर ही न पड़ा। उसे उबकाई आ रही थी क्योंकि शिवा समेत गाँव वाले उसे मैले के बिजबिजाते कीड़े लग रहे थे। उधर घर में अब भाई-पटिदारों की पंगति खाने पर जा चुकी थी और इधर दुआरे पर पौनी-परजा बिठाए जा रहे थे। काली ने एक झटके से जनेऊ तोड़कर शिवा की ओर फेंक दिया और दुआरे की पंगति में बैठ गया। • (समकालीन भारतीय साहित्य, अप्रैल-जून 1993)

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