रेहन पर रग्घू श्रीराम त्रिपाठी साहित्यकार अपने वातावरण, मतलब कि अपने समय की बात (वात) के आवरण को भेदते हुए अपनी बात का आवरण बुनता है। एक लेखक अपने दीर्घकालीन जीवन के वातावरण को किस तरह भेदते हुए एक नया वातावरण बुनता है, जानना हो तो ‘रेहन पर रग्घू’ पढ़ना चाहिए। काशीनाथ सिंह का लेखन उस साठोत्तर काल से शुरू हुआ, जिसे युवा आक्रोश और विद्रोह का काल कहा जाता है, परंतु इस उपन्यास में आक्रोश और विद्रोह का नामो-निशान तक नहीं है। इसका मतलब है कि काशीनाथ सिंह जीवन में युवा आक्रोश और विद्रोह की भूमिका को स्थायी नहीं, क्षणिक मानते हैं। वास्तविक जीवन तो टूटन-छीजन, समझौते आदि से निर्मित होता है। ज्ञानदत्त चौबे का जीवन आक्रोश और विद्रोह की ही परिणति है। इतिहास साक्षी है कि साठोत्तर कवियों ने या तो आत्महत्याएँ कीं, या आत्महत्या में नाकाम होने पर अपाहिज बनकर लोगों तथा “घर वालों की गालियाँ और दुत्कार” पायीं। “आज वही ज्ञानदत्त–बिना पैरों का ज्ञानदत्त–चौराहे पर पड़ा भीख माँगता है। मरने की ख्वाहिश ने उसे कहीं का न छोड़ा!” उसने मरने की कोशिश एक बार नहीं, दो-दो बार की थी, “जाने क्यों, उसमें जीवन से मोह पैदा हुआ ...
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